“कहते हो तो मैं आनंद बाबू की खोज खबर लेने निकल जाऊं?” रोते बिसूरते राम लाल को देख कल्लू भीतर से पसीज आया था। “यों अधीर होने से तो खेल बिगड़ जाएगा।” कल्लू ने चेतावनी दी थी।
राम लाल चुप था। छोटी-छोटी सुबकियों में अभी भी उबल रहा था। आनंद बाबू की जुदाई उससे सही नहीं जा रही थी। खाली-खाली आश्रम खाने को आता था। होटल तो खाली हो गया था। लोगों का भी धीरज टूट गया था।
“तनिक और इंतजार कर लेते हैं।” राम लाल ने आंखें पोंछते हुए कहा था। “हो सकता है कल्लू कि …?”
“तो फिर मैं मठ से एक नया मोढ़ा पकड़ लाता हूँ।” कल्लू ने राय दी थी। “सूनी सार से तो मरखना बैल ही चोखा।” कल्लू तनिक मुसकुराया था। “कुछ तो दिखेगा लोगों को।”
“लेकिन कल्लू …?” राम लाल कुछ निर्णय न कर पा रहा था।
“गुरु! एक न एक दिन तो लोगों को बताना ही होगा कि आनंद बाबू – माने कि स्वामी अनेकानंद हैं तो हैं कहां?” कल्लू का प्रश्न था।
“कहां हैं?” राम लाल ने कल्लू से ही प्रति प्रश्न किया था।
“बता दें कि स्वामी अनेकानंद की सिद्धि पूर्ण नहीं हुई। पिछले जन्म के किसी पाप कर्म ने उन्हें डुबो दिया। अब वो प्रकट नहीं होंगे। इस जन्म में चार धाम की यात्रा गुप्त रह कर नंगे पैरों पूरी करेंगे।” कल्लू तनिक सा मुसकुराया था। “लोग स्वामी अनेकानंद पर तरस खाएंगे। उन्हें और हमें लोग माफ कर देंगे।”
“फिर …?”
“एक नया मोढ़ा मैं अभी ले आता हूँ। आश्रम में डोलेगा फिरेगा तो लोगों का विश्वास बना रहेगा।”
“और अगर आनंद बाबू आ गए तो?”
“सोने में सुहागा गुरु। दोनों को ही रख लेंगे। आगे की राह भी आसान हो जाएगी। इस नए को भी कुछ सिखा पढ़ा लेना। ताकि फिर कभी ऐसा वक्त आया तो हम खाली हाथ न होंगे।”
कल्लू ने पते की बात की थी। राम लाल को कहीं दूर एक आशा दीप जल गया दिखा था। उसे दिखा था – स्वामी अनेकानंद के बाद एक और अनेक स्वामी। एक परम्परागत स्वामियों का समूह। बिलकुल मठ की तरह। वह मान गया था। उसने कल्लू को कह दिया था कि एक नया मोढ़ा पकड़ लाए मठ जा कर।
कल्लू को आज मग्गू ने शाम के खाने पर घर बुलाया था।
कल्लू के पसीने छूट गए थे। वह जानता था कि मग्गू कहीं बेखबर न बैठा था। उसे पता था कि मग्गू को उसे सीधे-सीधे सवालों के सही-सही जवाब देने होंगे। वह मानता था कि मग्गू एक बड़ा ही विचित्र जीव था। वह अनपढ़ तो था लेकिन पढ़े लिखों के भी कान काटता था।
“क्या हुआ?” मग्गू का सवाल आया था। “होटल के ऊपर के दोनों फ्लोर खाली पड़े हैं। बैठ गया धंधा?” उसने कल्लू को आंखों में घूरा था।
“न … न … नहीं।” कल्लू की जुबान लड़खड़ाई थी। “वो क्या है कि … यार …”
“भाग गया स्वामी?” मग्गू की आवाज कठोर थी।
“न न! भागा नहीं।” कल्लू सोच में पड़ा था। वह मग्गू से झूठ न बोलना चाहता था।
“फ्रॉड था?” मग्गू ने फिर से सवाल किया था।
“न न … फ्रॉड नहीं … दर असल स्वामी जी की मां का देहांत हो गया है। इस लिए …”
“तो विपासना पर नहीं बैठा?” मग्गू एक के बाद दूसरा सवाल पूछता ही जा रहा था।
“वो … वो सब तो पब्लिक को बताने का है।” कल्लू ने लजाते हुए कहा था। “लौटेगा …” कल्लू ने मग्गू को आश्वस्त किया था।
फिर दोनों दोस्तों ने जम कर पी थी।
लेकिन कमाल ये हुआ था कि आज कल्लू को पेट भर पीने के बाद भी नशा न हुआ था।
कल्लू का दिमाग राम लाल की डूबती नाव को कैसे बचाए – इसी उलझन में उससे झगड़ता रहा था।
नए मोढ़ा को देखते ही राम लाल की आंतें फुंक गई थीं। उसने कल्लू को मुड़ कर संदिग्ध निगाहों से देखा था। क्या कूड़ा उठा लाया – राम लाल कल्लू को फटकारना चाहता था।
नया साधु छोटे कद का था। बदन गठीला था। उसके दोनों कान टूटे हुए थे। एक बाजू दूसरे से छोटा था। रंग सांवला था। नाक नक्श भी गड़बड़झाला थे। आदमी की कोई नई किस्म ही था।
“क्या नाम है?” राम लाल ने अन्यमनस्क उसे पूछा था।
“हंसराज।” साधु ने उत्तर दिया था।
ठेठ देसी आदमी था। राम लाल को किसी भी सूरत में उसे आनंद बाबू का स्थान देना ठीक न लगा था। लोगों पर कोई अच्छा इंप्रेशन न पड़ेगा – राम लाल मान रहा था।
“संस्कृत आती है इसे।” कल्लू ने राम लाल का मन पढ़ लिया था तो बोला था।
राम लाल भी तनिक चौंका था। उसे संस्कृत बोलता घनानंद याद हो आया था। वह मान गया था कि संस्कृत बोलने के बाद पब्लिक किसी भी ऐरे गैरे को महान मान लेती है। संस्कृत भाषा की खूबी यही थी। हालांकि लोग संस्कृत समझते नहीं थे लेकिन संस्कृत श्लोक सुनना जरूर पसंद करते थे। लोग मानते थे कि संस्कृत एक श्रेष्ठ भाषा है और जो संस्कृत में लिखा है वह सच है, शुभ है और सभी को स्वीकार्य है।
“साधु होने से पहले क्या काम करते थे?” राम लाल ने अगला प्रश्न पूछा था।
“पहलवानी करता था।” नए साधु ने सीधा उत्तर दिया था।
“तभी कान टूटे हैं?” राम लाल का प्रश्न था।
“जी हां। और यह हाथ भी टूट गया था। फिर पहलवानी छूट गई थी। कोई काम मिला नहीं तो साधु हो गया।” उसने अपनी मजबूरी का सीधे-सीधे बयान किया था।
राम लाल को एक बारगी उसका ये सीधा स्वभाव पसंद आ गया था। आदमी छल छिद्र वाला नहीं था। लेकिन लगता तो व्यापारी जैसा था। राम लाल को डर था कि कहीं वह तंत्र विद्या को बेच बैठा तो पब्लिक में उसकी शाख खत्म हो जाएगी।
हंस राज आनंद बाबू का बिलकुल उल्टा विकल्प था।
“क्या नाम दोगे इसे!” राम लाल ने कल्लू से पूछा था।
“स्वामी हंसानंद।” कल्लू ने तुरंत उत्तर दिया था।
राम लाल ने स्वामी हंसानंद नाम को कई बार जुबान पर घुमा कर देखा था। उसे कुछ जमा नहीं था। इस बार राम लाल कोई नया प्रयोग करना चाहता था।
“अगर हम इन्हें स्वामी राज हंस के नाम से बुलाएं तो?” राम लाल ने कल्लू के सामने प्रश्न रख दिया था।
“बेहतर! बहुत बेहतर गुरु।” कल्लू बेहद प्रसन्न हुआ था। “फर्राटेदार चलेगा।” उसने खुशी से उछलते हुए कहा था। “स्वामी राज हंस तो जमेगा गुरु।” कल्लू मान गया था।
राम लाल ने अब फिर से हंस राज को पढ़ा था।
“क्या लोगे?” राम लाल का प्रश्न था।
“क्या दोगे?” हंस राज ने उसी सीधे स्वभाव में पूछा था।
“साधु हो …?”
“पेट तो साधु का भी होता है। आज कल लोग देते कुछ नहीं हैं जनाब।” हंस राज ने अपना हुआ अनुभव बताया था। “अब मांगने में भी शर्म आने लगी है।” उसने साफ-साफ कहा था।
“रख लो गुरु।” कल्लू ने सिफारिश की थी। “जो दोगे, ले लेगा।”
बात बन गई थी। स्वामी राज हंस को राम लाल ने आए गए पर रख लिया था।
लेकिन आज भी राम लाल को स्वामी अनेकानंद के लौट आने का इंतजार था। आनंद बाबू जैसा और कोई मिलना तो शायद संभव ही न था।
लेकिन उम्मीद आदमी के लिए जीने का एक अनमोल आधार होती है – राम लाल ये अनुभव से जानता था।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

