तोचीगढ़ से बंबई आ कर वो स्वामी अनेकानंद बना। लगा – उसका पुनर्जन्म हुआ। लेकिन आज वो फिर तोचीगढ़ लौट रहा था। लग रहा था जैसे वो अपने पूर्व जन्म से मिलने जा रहा था जहां अब उसकी बीमार मां उसके इंतजार में आखिरी सांसें गिन रही थीं। और उसका छोटा भाई बिल्लू उसके आने के इंतजार की घड़ियां गिन रहा था। और वह – वह उनका आनंद तोचीगढ़ लौट रहा था – सशरीर।
आनंद रोमांचित था। आनंद प्रसन्न था। आनंद अचानक ही अपने विगत से बतियाने लगा था। उसका प्रिय अनुज बिल्लू उसकी टांगो से लिपटा खड़ा था।
“बिल्लू को तो मैं बैरिस्टर बनाऊंगा मां।” अचानक ही आनंद अपनी आवाजें सुनने लगा था।
क्या बना होगा बिल्लू – आनंद ने स्वयं से प्रश्न पूछा था। कोई क्या बनेगा – कोई नहीं जानता, आनंद अब जानता था। वह तो बंबई कोई छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में गया था, लेकिन बन गया स्वामी अनेकानंद। धनीमानी, विद्वान-व्यापारी सभी उसके चरण छूने लगे। और वह उन सबका भाग्य विधाता बन गया।
यह तो कभी उसके सपनों में भी नहीं आया था। वह तो कदम की चिड़िया से पूछ बैठा था – अपना प्रश्न। पल्लू के कुल पांच रुपये भी कदम को दे दिए थे। और कदम की चिड़िया ने उसे प्रसन्न कर दिया था। लेकिन जब लात खा कर लौटा था तो …?
“लेकिन आज तो बहुत कुछ ले कर लौट रहा हूँ।” अचानक आनंद को पांच हजार की नोटों की गड्डी धरी दिख गई। “आज तो …” रुका था आनंद। “क्या हो …?” उसने स्वयं से पूछ लिया था।
सकपका गया था आनंद। वो जानता था कि वो कुछ नहीं था, वह कोई नहीं था। वह तो राम लाल का गढ़ा झूठा स्वामी अनेकानंद था। और वो भी अब नहीं था। गांव चल कर तो वह आनंद ही था। लेकिन … लेकिन …
अचानक ही आनंद की आंखों के सामने एक माया रचित संसार डोलने लगा था।
बर्फी अपने बंगले में डोलती फिर रही थी। वह भी पेड़ों के साथ अंग्रेजी में बतिया रहा था। तभी राम लाल ने चाय पीने के लिए पुकारा था। बर्फी जा चुकी थी। विधवा बर्फी ने गांव छोड़ा था। दौड़ लगाई थी। बंबई में आ कर बस गई थी। राम लाल को लात मार कर निकाल दिया था उसने।
और राम लाल …? आज तो राम लाल तो कमाल का लाल था।
जन कल्याण आश्रम को ही लें तो अरबों में था। नया बनता आश्रम तो स्वर्ग जैसा होगा। वह सब राम लाल का था। और राम लाल कौन था? कोई नहीं था पर था एक हस्ती। उसने अपनी अक्ल लगा कर एक स्वामी अनेकानंद को गढ़ा था और अब …
“लेकिन तुम तो अभी भी कदम की चिड़िया हो प्यारे। हाहाहा।” खुल कर हंसा था आनंद। “कब तक रक्खेगा राम लाल कौन जाने?” आनंद ने निष्कर्ष निकाला था।
सहसा आनंद को विभूति याद आई थी। बीमार पड़ा मोहन मकीन सामने आ खड़ा हुआ था। बेहोश हुए अमेरिकन खरब पति को कुछ सुधबुध ही न थी – न तन की , न मन की। अकेली बेटी विकल थी। कब ठीक होगा मोहन मकीन – राम जाने, कह कर फिर हंसा था आनंद और अब उसे याद आया था मग्गू – माधव मोची। और उसका दिया आशीर्वाद। सी एम और पी एम दोनों एक साथ बनेगा का जय घोष आनंद को गुदगुदा गया था। कल्लू का समर्थन और अवाम में हुई चर्चाएं सब कुछ न जाने कैसे चल पड़ा था।
“सब कुछ यूं ही चल पड़ता है।” आनंद ने मान लिया था। “चलाने वाला तो कोई और ही है।” उसने चलती ट्रेन की आवाजें सुनी थीं। “इसी तरह चलती है जिंदगी।” आनंद फिर से हंसा था।
“खट-खट-खट।” कूपे का दरवाजा खड़का था। शायद कोई था। दूसरा पेरिंजर आ गया होगा, आनंद ने अनुमान लगाया था।
आनंद उठा था। उसने सावधानी से दरवाजा खोला था।
“मे आई कम इन?” लड़की की आवाज थी। आनंद को उसका चेहरा भी दिखा था।
अकेली लड़की उस अकेले के साथ उस कूपे के एकांत में भला कैसे और क्यों सफर करना चाहती थी?
“कम इन।” कह कर आनंद ने दरवाजा खोल दिया था।
गोरी चिट्टी एक लड़की कूपे में घुस आई थी।
उसने कमर पर लदा बड़ा बैग उतारा था और सीट पर दे मारा था। पैरों में सस्ते स्लीपर पहने थे और हाथ पैर नंगे थे। सुनहरी बाल कंधों तक पहुंच रहे थे। आंखें बड़ी-बड़ी थीं। कुल मिला कर खूबसूरत लड़की थी। आनंद उसे खोजा निगाहों से देखता रहा था। उसने भी आनंद को बड़ी ही चतुराई से निरखा परखा था। फिर वह आनंद के ठीक सामने सीट पर बैठी थी और बड़े बैग से एक छोटा बटुआ निकाल बीड़ी सुलगाई थी।
आनंद हैरान रह गया था। लड़की निश्चित रूप से विदेशी थी। लेकिन उसका यों देसी बीड़ी पीना आनंद को अटपटा लगा था।
“इत्ती सारी बीड़ी?” आनंद ने बीड़ियों के पुलंदे को देख आश्चर्य से पूछा था।
“आई एम सॉरी, सो सॉरी।” वह लड़की हंसी थी। “माई मिस्टेक।” उसने स्वयं को कोसा था। “लो। पिओ।” उसने आनंद को बीड़ी ऑफर की थी।
“नो थेंक्स।” आनंद ने जान मान कर अंग्रेजी में कहा था। “आई डॉन्ट स्मोक।”
“क्यों?” लड़की मुसकुराई थी। “इन इंडिया …?”
“पीते हैं लोग।” आनंद ने माना था। “लेकिन …” उसने लड़की को फिर से निगाहों में समेटा था।
लड़की चुप थी। उसने आनंद को शकिया निगाहों से देखा था।
“आई ए साइको।” लड़की ने तनिक सकुचाते हुए उत्तर दिया था। “मैं इंडिया इलाज के लिए आई हूँ।” उसने सूचना दी थी।
“क्यों? विदेश में तो …”
“मेरी इस बीमारी का इलाज नहीं है। लेकिन कहते हैं इंडिया में इलाज है। बंबई में कोई स्वामी अनेकानंद है। फेथ हीलिंग करता है। लेकिन वहां इतनी भीड़ है कि मेरा नम्बर ही नहीं लगा। पैसे वालों का नम्बर पहले लगता है।” वह बताती रही थी।
“पैसा …?” आनंद चौंका था। “फेथ हीलिंग है तो फिर पैसा?” उसने पूछ लिया था।
“अरे सर। मोटा काटते हैं ये लोग।” लड़की दुखी थी।
सहसा आनंद का तीसरा नेत्र खुला था। उसे राम लाल की करतूतें दिख गई थीं। उसे समझ आ गया था कि राम लाल खूब धन बटोर रहा था।
“पांच हजार देकर चलता किया?” आनंद का अंतर बोल पड़ा था। “ऊंट के मुंह में जीरा।” आनंद मुसकुराया था। “चीट।” आनंद की दांती भिंच आई थी।
दुनिया में ठगी चलती है – आनंद को समझ आने लगा था। कमाता कोई है तो खाता कोई है। अच्छा सच्चा आदमी तो गुजर बसर भी कठिनाई से कर पाता है। लेकिन चालाक लोग सारा माल मथाल समेट लेते हैं। पूरी उम्र लगा कर मां ने क्या कमाया? और अब वो भी क्या कमा पाया? जबकि मोहन मकीन खरब पति है। और कालांतर में राम लाल भी …
“तकलीफ क्या है?” अचानक आनंद ने लड़की से पूछा था।
“क्रोध!” वह बोली थी। “मुझे क्रोध इतना आता है कि मैं पागल हो जाती हूँ। अटैक कर देती हूँ।” कहते-कहते लड़की का चेहरा आरक्त हो आया था।
“तुम्हारा नाम क्या है?” आनंद ने शालीनता से पूछा था।
“शैली।” लड़की ने उत्तर दिया था।
आनंद ने गौर से शैली की आंखों को पढ़ा था। शैली के मस्तिष्क पर लिखा पढ़ा था। उसके हाव भाव बांचे थे। आनंद की समझ में सारा खेल आ गया था।
शैली ने अपना बड़ा बैग खोला था। वह बैग में कुछ टटोल रही थी।
“पीना छोड़ दो शैली।” आनंद ने बड़े सौम्य ढंग से कहा था।
बैग से शराब की बोतल बाहर खींचता शैली का हाथ रुक गया था।
आनंद ने महसूस किया था कि अब उसके अंदर स्वामी अनेकानंद फॉर्म हो चुका था और फर्म हो गया था।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

