कालू परेशान था। जिस आदमी को उसने ग्राहक माना था वह तो फटे हाल कोई भिखारी था। घंटों से कालू के घर के खाने की ठेली के सामने खड़ा था – अवाक।
“शायद बहुत भूखा है।” कालू ने तनिक पसीजते हुए सोचा था। “पैसे नहीं होंगे।” इसलिए उसने मान लिया था कि ..
बीच में कई ग्राहक आए थे और घर का खाना खा कर चले गए थे। कालू की थाली मशहूर हो चुकी थी। एक सब्जी, दाल, चटनी, सलाद और रायता मिस्सी रोटी के साथ कुल तीस रुपये में बेचता था कालू। लोग चटकारे ले-लेकर घर का खाना खाते कालू को बहुत अच्छे लगते थे। लेकिन .. ये जो मनहूस .. फटे हाल खड़ा था – भिखारी था या कोई चलता फिरता ..
“खाना खाएगा?” अचानक कालू ने उसे पूछा था। “चल आ! ले ले थाली।” कालू का स्वर मीठा था।
वह आदमी हौले-हौले चला था और खाने की थाली ले कर वहीं ओट में जा बैठा था। खाना खा कर न जाने कब उसने थाली रक्खी थी और झूठी थालियों के लगे ढेर को धोने में जुट गया था। कालू ने भी उसे काम करते देख लिया था।
अचानक ही कालू का मन खिल उठा था। कब से उसे तलाश थी किसी ऐसे ही आदमी की जो झूठन धोता रहे। काम छोड़ कर वह खुद न कर पाता था और जब शाम होती थी तो झूठी थालियां धोते-धोते उसकी शामत आ जाती थी।
सूरज ढल गया था। शाम आन पहुंची थी। कालू मगन था। सारी थालियां धुली मंजी शीशे सी चमक रही थीं। वह आदमी भी चुपचाप सामने खड़ा था।
“ले! अब तू भी खाना खा ले!” कालू ने लाढ़ से उसे घर का खाना परोसा था।
भूखा था – वह आदमी। बहुत भूखा था और कालू को लगा था जैसे उसने जीवन में पहली बार कोई पुण्य का काम किया था। भूखे को भोजन खिलाने से बड़ा और कौन काम था – उसने मान लिया था।
“क्या नाम है?” कालू ने मुसकुराते हुए उस आदमी से पूछा था।
“राम चरण!” उस आदमी ने संक्षेप में उत्तर दिया था।
“कहां रहते हो?” कालू का अगला प्रश्न था।
वह आदमी चुपचाप ही खड़ा रहा था। कालू ने उसकी रोती धोती आंखें पढ़ी थीं। उसके हुलिए को अब की बार ध्यान से देखा था। न जाने कब से नहाया तक नहीं था वह आदमी। कपड़े फटे पुराने थे। दाड़ी बढ़ी हुई थी। सर के बाल अस्त व्यस्त थे। पैर भी नंगे थे।
“चलो! पास में मंदिर है। वहां छोड़ देता हूँ। पुजारी जी से प्रार्थना करेंगे तो शरण मिल जाएगी।” कालू ने उसे आश्वासन दिया था।
छोटे फासले पर कुतुब मीनार से थोड़ा हट कर एक प्राचीन शिव मंदिर था। ढोलू सराय वाले बहुत मानते थे – इस मंदिर को। साल में एक बार मेला लगता था तो बहुत लोग आते थे ढोलू शिव के दर्शन के लिए। कहते हैं – मन की हर मुराद ढोलू शिव पूरी करते हैं।
“ये राम चरण है पंडित जी। अनाथ है। आश्रय चाहिए।” कालू ने उसकी सिफारिश की थी और चला गया था। पंडित कमल किशोर राम चरण को इससे पहले कि निगाहें भर कर देख लेते उसने उनके पैर छूए थे और उनके चरणों में लंबा लेट गया था।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

