🙏अखण्ड भारत 🙏

दशकों बाद सुनहरी धूप, वादियों में खिलखिलाई है ।
जिगर वालों ने मिलकर भारत माता की पीर हटायी है।

पुरा भारतवर्ष हमारा, बांहे फैलाये बैठा है।
लग गले समाहित हो जा, ये नई उम्मिद जगाये बैठा है ।

जन्नत को नजदीक से अब देख सकेगा हर कोई, भारत माता ने यह पीड़ा दशकों से सर पे ढोई।

देश को खतरा कम है पकिस्तान और आतंकी से, खतरा तो है सदन मे कुछ भेड़ियो की नौटंकी से।

उम्मिद है की जन्नत मे रक्त-विहीन हर शाम होंगी, मिलिजुली सभी के घर गीता और कुरान होंगी।

बारूद सुलग चुका यह कह कर जो डरा रहे, वो अपनी खिसकी जमीं को यह बोल बोल बचा रहें ।

वतन को मेरा जां न्योछावर,हर जन्म मुझे ये तकदीर मिले।
सन्तान है जिस भारती की,उसे ना कभी पीर मिले ।

रचना:- विकास विक्रम

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