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राम चरन भाग उन्नीस

Ram Charan

पंडित जी को शाम को मंदिर से विदा करने के बाद राम चरन अकेला ही मालिक होता था।

मन प्राण में एक आह्लाद भर आता था। एक बेजोड़ कामयाबी जैसी भावना उसके भीतर भरती ही चली जाती थी। उसे लगता था – ढोलू शिव की शरण में पहुंचा वह हर ओर से सुरक्षित था। ढोलू शिव भी उसे शांत भाव से देखते रहते थे। वह भी उनके साथ कोई संवाद न बोलता था। उनके बीच का अबोला – जैसे एक अदृश्य विभाजन रेखा थी। वो दोनों अपने-अपने पक्ष जानते थे।

बावली की ओर राम चरन ने देखा था तो उसे नहाने का एक निमंत्रण मिल गया था।

सहसा राम चरन को अथाह, असीमित और अलौकिक सागर विस्तार दिखाई दे गए थे। उसे याद आ गया था – एक बेहद ऊंचे डेक से सागर में छलांग लगाना कितना साहसिक कार्य लगता था। और वो तैराकी की प्रतियोगिताएं – जब उसका नाम ले लेकर पुकारा जाता था – प्रथम स्थान पर रहे .. इनाम जीता .. इन्होंने! अपना ही पुराना कीर्तिमान तोड़ा – कमाल कर दिया और उसके बाद ..

राम चरन ने कपड़े खोले थे और बावली में छलांग लगा दी थी।

घंटों तैराकी करने के बाद राम चरन का मन खिल उठा था। पानी के साथ उसका अलग से प्यार था। पानी ही जिंदगानी था – राम चरन जानता था।

“ये क्या हो सकता है?” राम चरन ने मंदिर के भीतर जाते जीने को शकिया निगाहों से देखा था। “कुछ तो होगा जरूर!” वह बुदबुदाया था। “चलते हैं! देखते हैं!” कहते-कहते वह नीचे जाती जीने की सीढ़ियां उतर गया था।

भीतर जाती गुफा का दरवाजा बंद था। दरवाजे पर ताला पड़ा था। लेकिन जैसे ही उसने ताले को छूआ था वह टूट कर जमीन पर जा गिरा था। शायद सदियों से .. या न जाने कब से पड़ा था वो ताला! और अब गल गया था। और आश्चर्य ये था कि कभी किसी ने उसे छूआ तक न था।

“लेकिन क्यों?” राम चरन खड़ा-खड़ा सोच में पड़ गया था। “क्या है अंदर?” उसने स्वयं से पूछा था।

आहिस्ता-आहिस्ता राम चरन ने दरवाजा खोला था। अंदर अंधकार भरा था। वह कुछ कदम अंदर गया था और रुक गया था। शायद डर गया था – राम चरन, उसे लगा था कि ढोलू शिव के गले में लिपटे सर्प जिंदा हो गए हैं और उसकी ओर चले आ रहे हैं। फिर कुछ अजब-गजब आवाजें भी वह सुनने लगा था। उसके भीतर एक भय हर पल भरता जा रहा था! उसे पसीने आने लगे थे। दरवाजा बंद कर वह लौट आया था।

राम चरन ढोलू शिव की प्रतिमा के सामने खड़ा था।

प्रतिमा शांत थी। प्रतिमा के गले से लिपटे सांप भी शांत थे। कोई किसी भी प्रकार की हलचल वहां न थी। राम चरन का मन हुआ था कि ढोलू शिव के साथ आज संवाद करे। लेकिन कैसे? कैसे पूछे ढोलू शिव से कि क्यों होती है उनकी पूजा? ये इतने पागल लोग हर रोज चले आते हैं और .. और पूर्ण समर्पण भाव से अभ्यर्थना करते हैं .. अर्चना करते हैं .. दान देते हैं .. प्रसाद चढ़ाते हैं क्यों? किसलिए ..

“तुम क्यों डर गए थे?” ढोलू शिव का ही प्रश्न आया था। “कितने कायर हो तुम!” लगा था ढोलू शिव उसपर हंसे थे। “इतने सारे लोग पागल तो नहीं हो सकते – जो मेरी पूजा करते हैं?” ढोलू शिव का अकाट्य उत्तर था।

परास्त हुआ राम चरन मैदान छोड़ मंदिर से बाहर आ गया था।

अचानक राम चरन का दिमाग घूमा था और उस गुफा में जाती सुरंग पर जा टिका था! जंग खाया ताला क्यों टूटा था – राम चरन जैसे बंधन मुक्त हो गया था। उसे लगा था कि उसने एक अनमोल खजाना खोज लिया है – जो वो चाहता था, उसे वह बाई चांस ही मिल गया है। पंडित कमल किशोर को तो उस सुरंग, गुफा या गर्भ गृह से कुछ लेना देना ही न था। उसे तो धन माल ही चाहिए था। और यही था राम चरन की पहली फतह का पहला कदम!

अब राम चरन को न ढोलू शिव का डर था और न पंडित कमल किशोर का!

“मूर्ति पूजा कोरा पाखंड है!” राम चरन ने स्पष्ट स्वर में ढोलू शिव की मूर्ति को सुना कर कहा था।

राम चरन खूब हंसा था। वह हंसता ही रहा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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