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राम चरन भाग तैंतीस

Ram Charan

राम चरन लौट आया था। पंडित कमल किशोर का जैसे जी लौट आया था – उन्हें लगा था।

आज वो बुरी तरह डरे हुए थे। गर्भ गृह में कुंवर साहब की आंख से बचा कर रक्खा राम चरन अब सुंदरी की आंखों में समा गया था। पंडित जी इस तरह की इश्क अइयाशी से परहेज करते थे। लेकिन पहली बार भी तो सुंदरी का इश्क ही हुआ था। कॉलेज में ही उसने महेंद्र से दोस्ती लगाई थी और फिर ..

दोनों राज घरानों के थे। शादी क्या हुई थी – इंद्र भी शरमा गए थे। मैसूर वालों ने तो कमाल ही कर दिया था! कुंवर साहब ने भी कोई कोर कसर न छोड़ी थी। वर वधु को लोग देखते तो देखते ही रह जाते! लेकिन महेंद्र का वो एयर क्रेश तो था ही हृदय विदारक। सुंदरी तो बेहोश हो गई थी। तीन दिन के बाद होश आया था इसे।

“उस होश के बाद का ये नया जोश ..?” पंडित जी तनिक मुसकुराए थे। “विचित्र ही माया है प्रभु की!” उन्होंने ढोलू शिव की प्रतिमा को देख लंबी उच्छवास छोड़ी थी।

अचानक पंडित कमल किशोर को याद आया था कि आज राजेश्वरी अपनी उस नई डिजाइनर मित्र के साथ ढोलू शिव के दर्शन करने आ रही थी। राम चरन से दोनों का यों मिलना उन्हें अखरा था लेकिन ..

“है कौन ये राम चरन?” अचानक पंडित कमल किशोर के मन में रोष चढ़ आया था। “आज पूछ ही लेता हूँ इसे कि ..” उन्होंने हिम्मत बटोरी थी। “नहीं-नहीं!” वह कांप उठे थे। “कुछ गलत होहा गया तो – राजेश्वरी ..”

राम चरन कपड़े बदल कर ढोलू शिव की सेवा में उपस्थित हुआ था।

लेकिन आज पंडित कमल किशोर राम चरन के उस कामदेव जैसे रूप स्वरूप को देख दहला गए थे। मात्र इसलिए कि आज राजेश्वरी अपनी मित्र के साथ दर्शन करने आ रही थी और राम चरन से ..

“क्या हो?” पंडित कमल किशोर को पसीने आ गए थे। “आग और फूस जैसा रिश्ता है नर नारी का!” वह तो मानते थे। राम चरन आज उन्हें अपने घर की बात जैसा लगा था। वह कोई था – कुछ तो था! पंडित जी गहरे सोच में जा डूबे थे।

मंदिर श्रद्धालुओं की भीड़ से लबालब भर गया था।

राम चरन श्रद्धालुओं की सहायता में लगा था। लेकिन पंडित कमल किशोर की निगाहें मंदिर के प्रवेश के द्वार पर ही जा चिपकी थीं। बार-बार उन्हें सजी वजी राजेश्वरी अपनी फैशन डिजाइनर मित्र के साथ आती दिख जाती और फिर गायब हो जाती। वह मरते-मरते जी जाते। राजेश्वरी उस दिन आई ही न थी – न जाने क्यों?

“आज तो बहुत-बहुत माल पहुंचा है!” राम चरन पंडित जी को विदा करते वक्त बोला था।

“प्रभु की कृपा है!” पंडित जी ने विनम्र भाव से कहा था। “बच गए! बाल-बाल बचे हैं, आज!” उन्होंने ढोलू शिव को धन्यवाद कहा था। “लेकिन .. लेकिन राजेश्वरी ..?” पंडित जी कुछ सोच न पा रहे थे।

“राजेश्वरी से कह दो – राम चरन भाग गया!” पंडित जी अब कुटिल चाल चलने पर उतर आए थे। “औरत और परछाईं कब साथ छोड़ जाए – कुछ पता नहीं होता!” पंडित जी ने गुरु ज्ञान की बातें स्वयं से की थीं – चुपचाप!

“सुंदरी के बारे में भी सोच लो!” पंडित जी का मन आंदोलित था। “कहीं ले उड़ी राम चरन को ..?” उन्हें आज शक हो गया था।

लेकिन शक का कोई इलाज नहीं होता – ये पंडित जी भी जानते थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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