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राम चरन भाग पांच

Ram Charan

पंडित कमल किशोर गहरी नींद में सोते-सोते अचानक उठ कर बैठ गए थे।

“रात में सब उठा ले जाएगा पापा!” वो अचानक सुमेद की आवाजें सुनने लगे थे। घोर अंधकार को चीरती सुमेद की प्रखर आवाजें एक चेतावनी की तरह चली आ रही थीं। जागते रहो – कोई कहीं आवाज देता लग रहा था।

“ढोलू शिव अगर बाजार में बिके तो ..”

“तो जेल जाओगे कमल किशोर! बड़ी बदनामी होगी! इतनी फजीहत कि .. शायद राजेश्वरी जान देदे और सुमेद ..?”

मंदिर की चाबी राम चरन को सोंप कर वो खुश-खुश क्यों चले आए थे? स्वयं के सर्वनाश की नींव डाल वह उन नोटों की गड्डियों को छूते ही पागल क्यों बन गए थे? कालू तो काठ का उल्लू है। अपने गले का सांप मेरे गले में डाल गया! उसका भी तो घर है। क्यों नहीं ले गया अपने घर?

राजेश्वरी जैसे आज पहली बार विवाहित जीवन में सुख की नींद सोई थी।

हाथों में आई नोटों की गड्डी पर जैसे राम चरन का वजूद बना था। एक आशा जो आज अचानक उसके मन प्राण में कौंध गई थी – धनवान होने की आशा आज उसे पल्लवित होती लगी थी। सुख स्वप्न उसे झूला झुला रहे थे। वैभव उसके आसपास आ खड़ा हुआ था।

पंडित कमल किशोर ने गहरी उच्छवास छोड़ी थी। लेकिन राजेश्वरी आज पूर्णतया तनाव मुक्त लगी थी।

“नींद नहीं आ रही क्या?” राजेश्वरी ने पलंग पर बैठे पंडित कमल किशोर से पूछा था।

“नहीं!” पंडित जी का स्वर गुरु गंभीर था।

“लेकिन क्यों?”

“राम चरन! अगर सब ले उड़ा तो ..?”

राजेश्वरी के सुख स्वप्न पल छिन में छिन्न भिन्न हो गए थे।

वह जो सोचे जा रही थी – क्या वो गलत था? अगर राम चरन सब ले जाएगा तो? वह भी उठ कर पंडित कमल किशोर की बगल में आ बैठी थी। अब उसकी आंखों में भी नींद का नामो निशान न था। सुमेद में अक्ल थी – दोनों सोचे जा रहे थे। ये नई पीढ़ी के बच्चे बहुत शार्प थे। लेकिन पंडित कमल किशोर – वेद पाठी और प्रखर विद्वान के दिमाग में इतनी सी बात न आई थी कि ..

“अब क्या होगा?” राजेश्वरी ने घबराते हुए पूछा था।

“जेल!” पंडित कमल किशोर की जुबान अटक गई थी। “कहो तो .. जाऊं मंदिर?”

“अब जा कर क्या करोगे? जो होना होगा – वो तो हो चुका होगा!”

उन दोनों के दिमाग पर अजीब सा मातम छा गया था।

“चोर तो लगता नहीं राजे!” कठिनाई से कह पाए थे पंडित जी।

“तो उठाईगीरा होगा! चलता फिरता कोई बिगड़ा बदमाश! आज कल तो शिनाख्त ..”

पसीने छूट रहे थे पंडित कमल किशोर के। हाथ पैर कांपने लगे थे। बदन निढाल हो चुका था। अंधकार अभी भी गहरा होता चला जा रहा था।

“पुलिस ..?” पंडित जी हिम्मत बटोर कर बोले थे।

“पागल मत बनो! चोर को छोड़ तुम्हें पकड़ लेगी पुलिस! जो भी थोड़े बहुत दाम-दमड़े हैं – सब के सब स्वाहा हो जाएंगे।

“तो ..?”

“ढोलू शिव का ही स्मरण करते हैं। होने दो सवेरा। नींद तो अब वैसे भी नहीं आएगी।”

वो दोनों गहन दुविधा में जागते रहे थे – रात भर!

लेकिन सूरज था कि आज निकलने का नाम ही न ले रहा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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