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राम चरन भाग एक सौ उनचास

Ram charan

राम चरन घोड़े बेच कर सो रहा था।

“क्या हुआ?” सुंदरी उसे झिंझोड़ कर जगा रही थी। “कित्ते बार कहा है कि ..” वह राम चरन के काम को कोस रही थी। “उठो-उठो! नौ बज गए।”

राम चरन ने आंखें खोली थीं। सुंदरी सामने थी लेकिन उसे दिखाई न दे रही थी। वह अब किसी भी औरत को पहचान न रहा था। उसके दिमाग में तो ऐशियाटिक अंपायर का नक्शा ही उतर आया था। वह तो मान ही गया था कि वो कोई मुनीर खान जलाल .. या कोई .. और कोई

“छुट्टी मारो।” सुंदरी राय दे रही थी। “श्याम चरन का बर्थ डे मनाते हैं – साथ-साथ!” उसने अगला प्रोग्राम बताया था।

राम चरन को श्याम चरन का चेहरा याद आते ही अपना बचपन याद हो आया था।

अब्बा के परिवार में वो सत्रह बच्चे थे। वो उन में से पंद्रहवां था। अब्बा को तो उनमें से किसी का नाम तक याद न था। अम्मा ही थी जो उन सब की लल्लो चप्पो करती रहती थीं। अब्बा का सब कुछ हिन्दुस्तान में ही छूट गया था। पाकिस्तान में आ कर कुछ भी नहीं मिला था। बस यूं ही एक घर था – एक रह गुजर जैसों जैसा ठिकाना था। जो कुछ किया उसने खुद ही किया। एक यतीम मुहाजिर से लेकर अब तक .. ऐशियाटिक अंपायर तक का सपना ..?

राम चरन देख रहा था कि ऐशियाटिक अंपायर की प्रचंड सेनाएं पाकिस्तान को कुचल रही थीं। सारे मुहाजिर कैदियों को रिहा कर उसने सेना में भरती करा दिया था। पाकिस्तानी सेना ने सरेंडर कर दिया था। और तब – और तब उसका परम मित्र बलूच बांहें पसारे उसकी ओर भागा चला आ रहा था।

“धांय-धांय-धांय!” मुनीर खान जलाल ने शेष तीन गोलियां एक-एक कर बलूच पर दाग दी थीं। बलूच उसके सामने ओंधे मुंह जमीन पर आ गिरा था और उसके शरीर से खून बह रहा था। “यू ब्लाडी ट्रेटर ..!” मुनीर खान जलाल ने ललकारा था बलूच को। “लैट मी किक यू बास्टर्ड!” उसने एक जोर की किक मारी थी बलूच में।

“अरे ये क्या किया?” सुंदरी चौंकी थी और उछल पड़ी थी। “क्यों दे मारा पैर पलंग में?” वह पूछ रही थी।

“पागल हो गया हूँ यार!” राम चरन ने अपने आप को संभाल लिया था।

सात नम्बर से फोन था। राम चरन को याद हो आया था कि जनरल फ्रामरोज गोआ से लौट आए होंगे।

“कॉफी पीने नहीं आ रहे?” रोजी फोन पर पूछ रही थी।

अचानक ही राम चरन का दिल दिमाग सजग हो उठा था। वह तपाक से ढोलुओं को जमीन पर छोड़ अपने आसमानों पर जा बैठा था। ऐशियाटिक अंपायर अब था भी कितनी दूर?

“क्यों नहीं, क्यों नहीं।” राम चरन ने हंस कर रोजी से कहा था। “आप की कॉफी की सुगंध तो कब की पहुंच गई है मेरे पास।” उसने रोजी की प्रशंसा की थी। “बाई गॉड ..” वह कहता ही रहा था।

रोजी का मन भी आने वाले सुख संसार में जा बसा था।

रिटायर होने पर तो लगा था कि धन का अकाल पड़ गया था। लेकिन कमाल तो देखो कि अब उस अकाल का एक अंपायर बन गया था। राम चरन .. ए जीनियस राम चरन ..

“जनरल फ्रामरोज इज ए बून इन डिसगाइज।” राम चरन का मन प्रसन्नता से बल्लियों कूद रहा था। “जिंदगी में पहली बार एक वफादार आदमी मिला।” राम चरन मान रहा था। “वरना तो उसे सलमा से लेकर नारंग और फिर बलूच तक सारे बे गैरत याद हो आए थे।

सात नम्बर में एक विचित्र प्रकार का सुकून चुपचाप आ बैठा था।

“मुझे एक छोटा सा शक है, सर।” कॉफी पीते-पीते रोजी ने कहा था। “अगर .. इन केस .. वी फेल .. तो?”

जनरल फ्रामरोज ने भी इस बार राम चरन को प्रश्नवाचक निगाहों से देखा था।

“तो ..?” मुसकुराया था राम चरन। “डोंट वरी मैम।” उसने दृढ़ विश्वास के साथ कहा था। “वो दिन – वी विल फ्लाई टू दी फार ऑफ आईलैंड इन ऐटलांटिक।” राम चरन ने बताया था। “ए प्लेन विल बी रैडी एट ऑल दि टाइम टू टेक अस देयर।” उसने आश्वासन दिया था।

“कौन है वहां?” रोजी ने फिर से पूछा था।

“माई गर्ल फ्रेंड – शगुफ्ता।” राम चरन ने लजाते हुए कहा था। “शी इज ए ..”

“यू .. नॉटी बॉय।” रोजी ने आंखें मटकाते हुए जनरल फ्रामरोज को देखा था।

जनरल फ्रामरोज का चेहरा खिल गया था। उसने जैसे आखिरी जंग जीत ली हो – ऐसा लगा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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