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राम चरन भाग एक सौ पंद्रह

Ram charan

आज पहला नवंबर था। मुनीर खान जलाल को याद था कि आज बलूच ने टेकओवर करना था। पाकिस्तान में घी के चिराग जलेंगे या कि बुझेंगे, वह अनुमान नहीं लगा पा रहा था। उसे इतना अवश्य याद था कि उन दोनों के बीच अब सलमा और सोलंकी की लाशें धरी थीं। अगर वह पाकिस्तान लौटा तो बलूच ने उसे हर हाल में मिटा देना था।

“जिधर से जिंदगी बुला रही है – उधर ही चलो मुनीर।” एक सहज विचार आया था मुनीर के जेहन में। “क्या पता – किस्मत का दिया क्या मिले?” उसका अंतर भी बोल पड़ा था।

ग्यारह बजे सभा का आरंभ हुआ था। पूरी इस्लामिक दुनिया की प्रसिद्ध जमात का उलेमा सभा में आ जुड़ा था। मुनीर असंपृक्त भाव से सभा में शामिल हुआ था। निर्णय लेना तो अभी तक बाकी था।

“ईसाइयों ने औटोमन एम्पायर खत्म होने के बाद इस्लाम को उठने ही नहीं दिया।” विचारक नईमुद्दीन बयान कर रहे थे। “लेकिन अब वक्त इस्लाम का लौट आया है। ईसाइयों का जोश, होश और सारा हौसला पस्त है। बूढ़े लोग हैं। संतानों के नाम पर इनके घरों में कुत्ते बिल्ली बैठे होते हैं। हाहाहा।” वह जोरों से हंसे थे तो सारी सभा हंस पड़ी थी। “मैं सच कह रहा हूँ दोस्तों। ईसाई अय्याशियों में सब कुछ गंवा बैठे हैं। तनिक सा नवाब दवाब आने पर ये अब घुटने टिका देंगे।” उन्होंने ऐलान किया था।

“बाकी कोई और धर्म बचा कहां है?” मौलवी फतह अली बोले थे। “उस पार बौद्ध तो समाप्त हुए और चीन में तो कोई धर्म है ही नहीं। बचा है – भारत। थोड़े बहुत हिन्दू हैं ..”

“लेकिन हिन्दुओं में स्पार्क है, मौलाना। हिन्दुओं को कमतर मत तौलना।” विचारक नईमुद्दीन ने चेतावनी दी थी। “अचंभा तो ये है दोस्तों कि बार-बार लुटने के बाद भी आज हिन्दुस्तान सबसे ज्यादा अमीर है। आज का हिन्दुस्तान वो हिन्दुस्तान नहीं है।”

“हमें भी फिक्र है हिन्दुस्तान की।” शेख साहब बीच में बोले थे। “लेकिन उसका उत्तर भी हमारे पास पहुंच गया है!” वो तनिक मुसकुराए थे। उन्होंने असंपृक्त बैठे मुनीर खान जलाल को अँखिया कर देखा था। “और ये हैं हमारे पास हिन्दुस्तान फतह करने वाले हलाले जुर्रत!” सभी ने शांत बैठे मुनीर खान जलाल को हसरत भरी निगाह से देखा था।

एक साथ बैठे सारे लोगों की आंखों में मुनीर खान जलाल – हलाले जुर्रत का अक्स समा गया था।

मुनीर खान जलाल ने भी किस्मत के किए फैसले के सामने अपना सर झुका लिया था।

शाम की दावत में गिने चुने लोग शामिल हुए थे। वही लोग थे जिन्हें इस्लाम के उर्स की परवाह थी। सभी लोग मुनीर खान जलाल को एक मिले नायाब तौहफे की तरह छू-छू कर देख रहे थे। सभी को मुनीर खान जलाल के जंगी अनुभवों का ज्ञान था। सभी जानते थे कि पाकिस्तान का एक मात्र उद्देश्य दिल्ली पर कब्जा करना था। और भारत में इस्लामिक स्टेट कायम करना था।

“मैं तो बहुत घूमा हूँ हिन्दुस्तान में जलाल साहब।” नूरी शाह अपना अनुभव मुनीर खान जलाल को सुना रहे थे। “अभी भी सारा हिन्दुस्तान इस्लाम की जागीर जैसा ही लगता है।” वह बता रहा था। “हर गांव, हर शहर और हर नुक्कड़ इस्लाम की छाप लिए खड़ा है। वहां तो जाने भर की देर है, जनाब। सब कुछ हमारा महफूज धरा हमें मिलेगा।” वह हंसा था। “यू विल लाइक इट एंड विल हैव इट।” उसने मुनीर खान जलाल को गारंटी दी थी।

“गढ़ है हमारा हिन्दुस्तान।” सलीम ने भी सलाह दी थी। “आप एक बार आवाज देंगे तो हम सब हाजिर हो जाएंगे।” सलीम मुनीर खान जलाल से हाथ मिला रहा था।

मुनीर खान को मीटिंग में बहुत आनंद आया था। उसका मन कुछ-कुछ मान गया था। लेकिन उसका सोच फिर से हिन्दुस्तान पर ही जा गढ़ा था। इस बार का आक्रमण कुछ अलग ही होना था। उसे जंच गया था और वह भी मान गया था कि विभक्त हुआ भारत जंग कभी की हार चुका था।

“वोटों के लिए सब हमारे सामने लेटे हुए हैं जनाब।” आम सदस्यों की राय थी। “आप को खुली सपोर्ट मिलेगी।” सभी लोगों की एक राय थी।

“लेकिन ये जंग लड़ी कैसे जाएगी?” मुनीर खान जलाल को तो अभी तक कोई ताना बाना ही न दिखा था। “हवाई महल हैं।” उसने मान लिया था। “ये बेल कभी मढ़े न चढ़ेगी।” उसका अपना अनुमान था। “भारत लड़ता है – वह तो जानता था।” इकहत्तर की लड़ाई का एक-एक सीन उसे याद था।

लेकिन लड़ने में कोई हर्ज नहीं था – उसने अपने आप को मना लिया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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