रात ढलने को थी। राम चरन अभी भी गर्भ गृह में बैठा था। पूरी ढूंढ खखोर के बाद उसे एक ही बात वाजिब लगी थी। संघमित्रा और कहीं नहीं – यू एस में थी। सुमेद भी शायद वहीं था और उसके दोनों परिवार भी यू एस में ही थे।
“जुनैद!” राम चरन ने हिम्मत बटोर कर यू एस में अपने काउंटर पार्ट को फोन मिलाया था। वो जानता था कि वो दोनों जो भी बात करेंगे साथ के साथ डिलीट होती जाएगी। “वॉट इज माई स्टेटस इन द यू एस?” राम चरन ने पूछा था। उसे याद था कि कभी वो यू एस का चहेता जनरल था।
“मिसिंग ..!” जुनैद ने चैक करके बताया था। “बिलीव्ड टू बी किल्ड।” उसने वाक्य पूरा किया था। “अस्पताल से गायब होने के बाद किसी को कुछ पता नहीं कि ..”
“गुड!” राम चरन तनिक मुसकुराया था।
“आ रहे हैं यू एस?” जुनैद का प्रश्न था।
“तुम्हें कैसे पता?”
“आप की वो यहां है न!” जुनैद कह कर हंसा था। “मुझे तो कभी से इंतजार था आप का!”
“पाजी ..!” बड़े स्नेह से राम चरन ने जुनैद को गरिया दिया था। कभी सर्विस में दोनों साथ-साथ थे। बड़ा प्यार था दोनों का। “मिला दोगे न?” राम चरन ने भी सीधा प्रश्न पूछ लिया था।
“है तो मुश्किल!” जुनैद ने स्पष्ट कहा था। “पुरुषों से नहीं मिलती।” उसने सबब बताया था। “यू एस में बवाल काटा हुआ है इस संघमित्रा ने। लाइक सम न्यू रिवॉल्यूशन की तरह ..”
“मेरे लिए ..?” राम चरन का आखिरी आग्रह था।
“सब कुछ – जो भी पॉसिबल होगा करूंगा।” जुनैद का वायदा था।
सात दिन के लिए मंदिर मरम्मत की खातिर बंद रहेगा – बोर्ड बन कर तैयार हो गया था और राम चरन के यू एस जाने के बाद मंदिर के द्वार पर टंग जाना था। सुंदरी को पता था कि एक बड़े सौदे को खरीदने के लिए राम चरन को तत्काल यू एस जाना था, वरना तो सौदा हाथ से निकल जाना था। जनरल फ्रामरोज को राम चरन ने डिटेल में सौदे का ब्योरा दिया था। तीन एकड़ जमीन मिल रही थी – इन वाइलडरनैस। वहां कंपनी ने चैरिटी होम बनाना था।
जनरल फ्रामरोज ने स्वयं आ कर राम चरन को हवाई जहाज से विदा किया था।
राम चरन हवाई जहाज के साथ-साथ खुद भी हवा में उड़ने लगा था। उसे संघमित्रा की आग्रही आंखें बार-बार बुला रही थीं। वह मानने को तैयार ही न था कि संघमित्रा कोई ब्रह्मचारिणी थी। वह हरगिज नहीं मानता था कि संघमित्रा उसे स्वीकार न करेगी। ब्रह्मचारिणी होना शायद संघमित्रा के लिए कोई मजबूरी रही होगी। वरना इतनी हसीन औरत दिल की हसरतों से कैसे दूर रह पाती – समझ ही न आ रहा था। एक औरत की आकांक्षा एक पुरुष ही तो होता है – उसका पुरुष – उसके बच्चे, उसका सुखी साम्राज्य – उसके लिए तो यही सब कुछ होता है।
सुंदरी कितनी सुखी थी। पुरुष था – उसका था। बच्चे थे उसके थे और एक सुखी संसार था – उसका। सुंदरी पैर पसार कर मौज में सोती थी। उसे क्या पता था कि अब राम चरन उसका चहेता पति अब उसका नहीं रहा था।
“ये हम पर इतना मेहरबान क्यों है रोज?” रोजी से रहा न गया था तो पूछा था। “जान न पहचान – ये हम पर मेहरबान। क्यों भाई?”
“इसलिए डार्लिंग कि सरकार और समाज की समझ में नहीं आता कि एक रिटायर्ड जनरल कितनी बड़ी ऐसेट होता है। लेकिन ये तो जानता है। करोड़ों का काम कौड़ियों में कराएगा।” तनिक हंसे थे जनरल फ्रामरोज। “हमें कोई नहीं पूछता। हम जैसे ईमानदारों से डर लगता है पैसे वालों को।”
“पर पापा ..! ये आदमी तो ..?” रानी भी कुछ कहना चाहती थी।
“छांव बांटने वाले पेड़ पर शक क्यों करती हो बेटी?” जनरल फ्रामरोज ने राम चरन का पक्ष लिया था। “किसी की भलाई करने में क्या बुराई है?” जनरल साहब ने अपने ही जीने की टेक को दोहराया था।
सेना के लोगों के सोच में सच्चाई होती है – और सिविलियंन्स का सोच उसी अच्छाई सच्चाई को कैश करता रहता है।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

