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राम चरन भाग एक सौ अट्ठाईस

Ram charan

“गुड माॅर्निंग!” जनरल फ्रामरोज का फोन था।

“गुड माॅर्निंग सर!” राम चरन संभल गया था। “इतनी जल्दी! खैरियत तो है?”

“खुशखबरी है।” जनरल फ्रामरोज ने सूचना दी थी। “सात नम्बर आ जाओ!” उनका आग्रह था। “नाश्ता साथ-साथ करेंगे और गपशप भी हो जाएगी।”

“आता हूँ।” कह कर राम चरन ने फोन काट दिया था।

राम चरन का माथा ठनका था।

राम चरन ने तो अंधे कुंए में हाथ डाला था लेकिन यहां से भी जिंदा आवाजें आ रही थीं। क्या ये भी कोई ढोलू शिव का खजाना था? क्या खुशखबरी हो सकती थी भला – जनरल फ्रामरोज के पास?

“चल आज तुझे कैबरे दिखाता हूँ!” अचानक ही बलूच सामने आ खड़ा हुआ था। “विस्की है – स्नैक्स हैं!” बलूच ने दाना डाला था – उसे याद है। खिड़की खुली थी और सलमा से सांप सा लिपटा नारंग नजर आया था। धांय-धांय – उसकी पिस्तौल धधक उठी थी। “अब चल!” बलूच उसे हाथ पकड़ कर उठा लाया था। आज भी पिस्तौल और बचे तीन कारतूस उसी के पास थे।

“चलता हूँ।” कुछ सोच विचार कर राम चरन ने निर्णय लिया था।

जनरल फ्रामरोज और रोजी दोनों ही सात नम्बर में मिले थे। रानी कहीं नजर नहीं आई थी। राम चरन तनिक उदास हो गया था।

“रानी ने शादी कर ली।” रोजी ने सूचना दी थी। “मेरा तो अब बिलकुल मन नहीं लगता।” वह बता रही थी। “संतान अकेली नहीं – दो चार होनी चाहिए।” रोजी हंसी थी। “हम से ये गलती हुई।”

“मुझे भी तो देखो!” राम चरन ने मन में कहा था। “चार बेटे लेकिन मेरा कोई नहीं।” वह तनिक सा गमगीन हुआ था। “संघमित्रा ..?” तभी उसने रोशनी देख ली थी। “इस बार कोई गलती नहीं।” उसने मन ही मन शपथ उठाई थी।

“क्या बात है? कुछ भी नहीं खाया?” रोजी ने राम चरन से पूछा था।

“भाई मेरी तो आदत है!” जनरल फ्रामरोज बोले थे। “मैं डट कर नाश्ता करता हूँ।” वो बता रहे थे। “आई एम ए हैप्पी गो लक्की मैन।” वो हंसे थे। “मैंने केवल और केवल गुडविल कमाई है – अपनी जिंदगी में।” वह बताने लगे थे। “और यही कारण है कि आज मेरे पास मेरे कुलीक, सैनिक और सहायक दौड़े चले आए हैं।” जनरल फ्रामरोज ने राम चरन को सीधा आंखों में देखा था। “एक फॉरमिडेबल फोर्स होगी – ढोलुओं के पास!” वह सूचना दे रहे थे। “आप के पास वफादार, ईमानदार और कर्मठ लोगों का एक काफिला होगा, सर।” जनरल फ्रामरोज खुशखबरी दे रहे थे। “सिक्योरिटी में सारे एक्स सर्विस मैन भर्ती किए हैं। बाकी महिलाएं, युवक युवतियां और उनके सगे संबंधी सभी को जगह दी है। सभी आपके लॉयल और ..”

“कोई आर एस एस या वो हिन्दू राष्ट्रवादी .. बीमारी ..?” राम चरन ने तनिक हिम्मत करते हुए पूछा था।

“काहे का हिन्दू राष्ट्र?” जनरल फ्रामरोज ने बुरा मुंह बनाया था। “गप्पन के छप्पन मारते हैं ये लोग। हिन्दू क्या खा कर हिन्दू राष्ट्र बनाएगा? हाहाहा! उनसे जो बन गया है वो नहीं संभलता।” उन्होंने राम चरन को खुश किया था। “बेचारे एक्स आर्मी के लोग लावारिस घूम रहे हैं।” उनकी शिकायत थी। “ट्रेन्ड आदमी हैं। आप देखना कि ये लोग ..”

“तख्ता पलट ..?” अचानक राम चरन के दिमाग ने सूचना दी थी। “हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सेनाएं मुझे मिल गई तो – विश्व विजय!” वह तनिक मुसकुराया था। “गैट इनटू दी इंडियन आर्मी!” राम चरन ने इरादा बना लिया था। “लोहा गरम है।” उसके दिमाग ने कहा था। “जनरल फ्रामरोज की गुडविल ..?” राम चरन की आंखों के सामने अनेकानेक चिराग रौशन हुए थे।

टेबुल से नाश्ता खा कर उठते हुए उसने रोजी की आंखों को पढ़ा था!

“इतना लजीज नाश्ता मैंने जिंदगी में पहली बार खाया है, मैडम!” राम चरन ने विनम्र आवाज में कहा था।

“लेकिन मुझसे भी तो पूछ लिया होता सर?” जनरल फ्रामरोज ने जोर का ठहाका लगाया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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