आज भी पंडित कमल किशोर लदे फदे रिक्शे में बैठ मंदिर से लौटे थे।
इंतजार की घड़ियां गिनती राजेश्वरी पंडित जी को यों आया देख खिल उठी थी। उसने मान ही लिया था कि राम चरन मंदिर में था और आज भी उसने करिश्मा कर दिखाया था। कैसा होगा ये राम चरन – राजेश्वरी अनुमान लगाने लगी थी।
आजू बाजू लटका सुमेद भी पूरे दृश्य को देखता रहा था। वह भी उत्सुक था कि जाने – ये राम चरन था क्या?
“लो! संभालो!” पंडित कमल किशोर ने नोटों की गड्डियां राजेश्वरी को थमाई थीं। उन्होंने मुड़ कर राजेश्वरी की आंखों में पढ़ा था।
राजेश्वरी की आंखों में भी घी के चिराग रोशन थे। उसने मान लिया था कि अब उन के गृहस्थ का सौभाग्य किसी राम चरन के रूप में मंदिर पहुंच गया था। अब अच्छे दिन लौटने को थे।
“रहेगा राम चरन – कुछ दिन?” राजेश्वरी का प्रश्न था।
“क्या पता!” पंडित कमल किशोर आहिस्ता से बोले थे तो राजेश्वरी को बुरा लगा था।
पंडित कमल किशोर ने अंगोछे से ललाट पर पहुंचा पसीना पोंछ दिया था।
राजेश्वरी पंडित कमल किशोर को भूल अपने दिवास्वप्न के साथ हो ली थी।
“सुमेद को अंग्रेजी स्कूल में डालना होगा!” उसने निर्णय किया था। “मंदिर में कोई नौकरी थी नहीं! मंदिर तो खम्मन सिंह ढोलू के दादों परदादों का था और कुंवर जी जब चाहें तब पंडित जी को जवाब दे सकते थे। अगर उन्हें पता चला कि राम चरन ..
डर गई थी राजेश्वरी!
पंडित जी को भी आज फिर से नींद आ कर न दे रही थी।
कारण राम चरन ही था। बार-बार पंडित जी को याद आ रहा था कि राम चरन ने कोई फोटो नहीं खिचवाया था। जब भी, जिसने भी उसका फोटो लेने की जिद की – वो साफ नाट गया था। पंडित जी के साथ भी लाख आग्रह करने पर उसने अपना कोई चित्र नहीं खिचवाया था। लेकिन क्यों?
राम चरन काम में ही व्यस्त रहा था। होंठों पर एक मधुर मुसकान धरे वह हर पल हर किसी के पास पहुंच रहा था। अनुदान उसी ने कराया था। उसी ने आए पर्यटकों को मंदिर दिखाया था। उसी ने ..
“कौन था ये राम चरन?” पंडित जी ने स्वयं से प्रश्न पूछा था लेकिन प्रश्न का कोई उत्तर उन्हें न आता था। “कल ही पूछ लेता हूँ कि ये था कौन? क्यों .. क्यों रहने लगा था मंदिर में?”
एकाएक पंडित जी को कुंवर साहब याद हो आए थे।
बिना कुंवर साहब की इजाजत के वो मंदिर में यों किसी को नहीं रख सकते थे। राम चरन को रखने से पहले उन्हें बताना चाहिए था – वो मान गए थे। लेकिन .. लेकिन बात ही कुछ ऐसी बनी कि तथागत राम चरन भिखारी बन कर आया था और कालू का आग्रह मान कर उसे उन्होंने शरण दे दी थी। उनका तब कोई लोभ लालच न था। लेकिन अब ..?
“नहीं-नहीं!” वह करवट ले कर सर हिलाने लगे थे। “अपने शक राजेश्वरी को नहीं बताएंगे!” उनका मानना था।
पंडित जी जानते थे कि तनिक सी भी भनक लगने पर राजेश्वरी ने बात को हवा में उड़ा देना था। परिणाम कुछ भी निकल सकता था और सुमेद? वह भी तो राजेश्वरी का ही बेटा था। अगर तनिक सा शक भी हो गया सुमेद को तो ..
“बेकार की जिद कर रहे हो कमल किशोर!” उनका अंतर बोला था। “अरे भाई! हर आदमी के अपने अलग उसूल होते हैं। होगी राम चरन की भी कोई मजबूरी! तुम्हें तो घाटा नहीं दे रहा? एक पाई भी नहीं चुराई उसने! कहां मिलते हैं ऐसे इंसान आज कल? डरो मत! आने दो वक्त। बता देना कुंवर साहब को कोई कहानी।”
पंडित कमल किशोर को थोड़ा होश लौटा था। वह राम चरन जैसे आए सौभाग्य को अब लौटाना न चाहते थे।
ये पहला मौका था – उनके जीवन का जब वो किसी षड्यंत्र में चुपके से शामिल हो गए थे।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

