
धृतराष्ट्र
तीसरी किश्त ;-
“आप की खातिर …जनता के लिए …और देश के लिए मैंने अपने समस्त सुखों का बलिदान कर दिया है …!” सुवर्णा की आवाज़ अब रुलाई में टूटने को थी. “मैंने कौनसा बलिदान नहीं किया है ….?’ उस ने प्रश्न पूछा था.
“मक्कार है …झूठी है ….!” संग्राम का हिया बोला था. “इतना अच्छा पति मिला था, इसे ! लात मार कर भगा दिया !! माया-मोह में अंधी हुई ये औरत ….” उन का मन खट्टा चूक हो आया था. “संतान सारी बिगड़ गई। ..” वो कसक आये थे. “बड़ा लड़का तो …बिलकुल ही निकम्मा निकला ! बाहयात ने शादी ही नहीं की. विदेशी कंपनी में नौकरी ले कर …इंग्लॅण्ड चला गया …और न जाने क्या ‘ग-गे ‘ हो गया ..था . वो आज भी समझ नहीं पाते कि …उस ने ऐसा क्यों क़िया ? स्कूल तो टॉप का था ….पैसा भी खूब लगा …! फिर शिक्षा क्या मिली ? और वो दो लड़कियां भी न जाने कहाँ-कहाँ घूमती-फिरती हैं …? धन तो सब ने कमा लिया है. सब के पास अनाप-सनाप संपत्ति है. और सब के सब ….”
“पर तुम्हें तो सब पागल बताते हैं …अनपढ़ मानते हैं , हजूर !” वक्त ने चुटकी ली थी.
“हम हैं – अनपढ़ , मानते हैं ! पर हमने तो अपने माँ-बाप को तीर्थ माना ! वो कौनसे पंडित थे ? लेकिन थे तो हमारे माता-पिता ! हमने समाज को ….देश को …जनता को …कभी पीठ नहीं दी ! लेकिन ….इसे देखो, अभीष्ट को …? लात मार कर सत्ता से अलग कर दिया , हमें ! और अब ..जनता और देश को …..”
“कहता है ….देश की अगली प्रधान मंत्री ….लच्छी – उस की माँ होगी !” सुवर्णा ने उन का सोच तोड़ाथा. “माई ,फुट ..!” सुवर्णा गर्जी थी. “इस तरह की मक्कार और ….”
लच्छी को लेकर फिर एक बार वो अपने आप से आ उलझे थे.
‘महिला संगठन’ का निर्माण कर लच्छी ने दिल्ली में खूब गहरी जड़ें जमा ली थीं. महिलाओं को आरक्षण चाहिए, महिलाओं को बराबरी चाहिए …महिलाओं को संपत्ति में हिस्सेदारी चाहिए – और न जाने क्या-क्या ढोंग रच कर लच्छी ने सारे औरत समाज को बिगाड़ दिया था. औरतें अब आँख बंद कर लच्छी का अनुसरण करती थीं. विश्व-स्तर पर महिलाओं का ये संगठन – चर्चा में था. और साथ चर्चा में थी – लच्छी ! लच्छी का कोई विकल्प ….?
“मैं हूँ न ….?” अचानक उन्होंने प्रदीप की आवाज़ सुनी थी. बहुत दिनों के बाद लौटी थी – ये आवाज़ ! प्रदीप एक हौनहार नौजवान था. पार्टी की जान था-वो ! कितना प्रतिभावान बच्चा था – वह आज भी उसे भूले नहीं हैं.
“लच्छी की मच्छी बना कर मैं …..” प्रदीप कहता रहा था. “आप का शिष्य हूँ. देखना नेता जी ……”
“पागल हो ! सब ले मरेगा, प्रदीप !!” लच्छी का विरोध था. “काहेका शिष्य ? हमारे बीच में फाँक डाल रहा है। किनारे करो, इसे !!” लच्छी ने हुक्म जैसा दागा था.
आज तक प्रदीप का नाम लेवा … पानी देवा पैदा नहीं हुआ !
सजल हो आईं थीं संग्राम की आँखें। आज अगर प्रदीप होता तो ….शायद उन का इतना अपमान न होता !
“तुमने भी तो अपनो के हित में ….गैरों के गले काटे थे.” वक्त फिर से बोल पड़ा था. “संग्राम ! तुम्हें याद है जब तुमने चुन-चुन कर सारे ‘करातो’ को टिकिट बांटी थी ….पुलिस की भर्ती मैं ‘करात’ भरे थे ….तमाम महत्वपूर्ण ओहदों पर तुम्हारे ‘करात’ …रिश्तेदार ….भाई-बंधु ..और यारे-प्यारे आसीन थे. सब लूट रहे थे …खा रहे थे …और तुम ….?”
“मोद मना रहे थे !” संग्राम ने स्वीकारा था. “हाँ ! अमर पाल की अमर लीलाओं में मेरा मन इतना फंसा था कि …न दीन याद रहा ..न दुनियां ! परियां थीं …उन के पंख थे …उन की दुनियां थी – जहाँ सुख था , आदर था , मान-पान सब तो था ! कोमल-कोमल उन पलों से जब मीठा-मीठा रस टपकता था तो मैं अपने उन दिनों को याद करता जब – माँ हाथ झाड़ देती और भूखा ही सोना पड़ता ! एक तरह का प्रतिकार जैसा ही चुका रहा था – मैं , ज़माने से ! मैं चाह कर दरिद्रों को नहीं छूता था। मैं चाह कर गरीबों से नहीं मिलता था. मैं चाहता था कि लोग मिटें,मरें ,संघर्ष करें और मुझ से प्राण-दान मांगे -आ,आ कर ! मुझे आनंद आने लगा था …सत्ता का आनंद …परियों का प्रेम ….और मदिरा का मद मुझे उठाए-उठाए डोलता था ! मेरे पैर तब ज़मीन पर न थे ….मैं तब आपे में न था !!
संग्राम तब बादशाह थे !!!
क्रमशः :-
फिर क्या हुआ ? अगले अंक में ….
