इस बार की छुट्टीयों में मायके में मन तो खूब लगा.. पर मन का मायका कहीं और ही जा बसा था। वो लम्बी सी सड़क पर चलते हुए.. आपसे मिलने जाना आज भी मेरी यादों में बस गया है। फ़िर बहुत इंतेज़ार के बाद आपका आना भूल नहीं पा रही हूँ मैं! अकेले बैठकर आज घर नहीं.. मुझे आपका स्थान रह-रह कर याद आता है.. और आप भी बहुत याद आते हैं। माँ तो साथ छोड़कर चलीं ही गईं.. लेकिन आज मेरा सारा मायका आपसे ही है।
बच्चा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए… पर अपने माता-पिता की अँगुली वो एक नन्हा सा बालक ही बनकर जीवन के हर मोड़ पर थामना चाहता है। इस बार मुझे आपकी अँगुली का स्पर्श न पाकर कुछ अच्छा सा न लगा था, पर आपकी अँगुली जल्द ही थामने की उम्मीद से मुड़ चली थी.. मैं।
हर दिन और हर पल परमात्मा से यही एक बात जो आपने कहने के लिये बिल्कुल भी न बोली थी.. हर रोज़ कह दिया करती हूँ.. मैं।
” बस! बहुत हुआ.. जल्दी भेज दो पिताजी को घर वापिस! है! परमेश्वर मेरे सच्चे और नेक पिता के साथ आपका यह फैसला कुछ समझ न आया है। पर आप तो परम पिता हैँ.. अब आप ही कोई उपाए निकालो!”।
वैसे तो आपसे विदा लेने के बाद आप मेरी यादों में ही रहते हैं.. पर इस बार मुझे तुम बहुत याद आए.. पिताजी!

