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मुझे तो महारानी चाहिए थी !!

bhartiya naari

हिन्दू राष्ट्र – उपन्यास अंश ;-

कादिर ने अपनी मुराद पा ली थी ! 

नीलोफर तो उसे मिल गई थी और अब सूबेदारी भी मिल ही जानी थी ! लेकिन मैं था कि अभी तक मजधार में ही खड़ा था . न जाने क्यों मुझे एक घोर निराशा घेरे खड़ी थी ? कादिर की शादी देख कर मैं सकते में आ गया था . शादी तो मेरी होनी ही थी …पर कादिर जैसी शादी …..?

न चाहते हुए भी केसर की धाणी मेरी आँखों के सामने आ खड़ी हुई थी ! हंस रही थी और मुझे याद दिला रही थी …भेड़ों के रेवडों  की …ऊंटों के काफिलों की ….और हाँ , रेगिस्तान में उस बे-पनाह उड़ते रेत की … जब कठिनाई से ही मैं …उस सरोवर को देख पाया था …जहाँ मैं और केसर मिल कर बैठे थे ! हमने अपने अमर प्रेम का यहीं तो इजहार किया था ….? और ….और हाँ ….

“ग-वा-र ….हो !” मैं अब केसर के बोल सुनने लगा था . पहले की तरह आज भी मैं उसी का था ! “लो ! आगए …तुम्हारे ऊँट , लेने ….!” वह मुस्कराई थी . “जावो ….!!” अब वह क्रोधित थी . “जावो, जावो …..” उस ने मुझे टहोका था . ” बे-का-र …का ….आदमी !!” उस ने अंत में कहा था . 

लेकिन अब मैं बेकार का आदमी न था ! मैं अब ….हाँ,हाँ ! मैं अब हिन्दू राष्ट्र का मनोनीत सम्राट था ! और केसर ….? भेड़ चराने वाली वो लड़की ….जब नीलोफर से मिलेगी ….जब अशरफ बेगम उसे देखेंगीं ….तो ….? मेरा तो मन ही बैठा जा रहा था ! मैं चाह कर भी केसर के लिए कोई खड़ा होने का स्थान न खोज पा रहा था !! 

जिस केसर को मैं अपनी जान,मान ….और आन मान बैठा था ….वाही केसर आज मेरी सब से कमजोर कड़ी सिद्ध हो रही थी . जिस केसर को मैं अपनी परामर्शदाता मान कर चल रहा था …वह केसर तो नीलोफर से ही मुकाबला हार गई थी …? और फिर उसी तरह बाल बखेरे ….हाथ में सोटा  लिए …. अनाप-सनाप बोलती केसर ….मात्र किसी चुड़ैल …या …किसी डाईन  के ही चरित्र को जी पा रही थी ! जब कि मुझे दरकार थी …..एक बे-जोड़ हुश्न वाली महारानी की ….? 

“शादी नहीं करता …..?” मैं निर्णय करने पर उतर आया था . “फिर कभी  …..कोई राज घराना ….. या कोई …..?” 

“अरे, भी ! कल तो चलना है ?” शेख शामी की आवाज़ ने मेरा सोच तोड़ दिया था . “मैं और तुम कल चल रहे हैं !” वो मुस्करा रहे थे . “कादिर,नीलोफर और अशरफ बाद में आएँगे !” उन्होंने सूचना दी थी . “शायद कोई उधर ….बिहार से भी आए ….?” उन का अनुमान था . 

मैं दहला गया था ! ना जाने क्या होने वाला था ….? ना जाने …अब मेरी किस्मत … मुझे कहाँ ले कर जा रही थी ….? गुरु जी से भी क्या मदद मिलती …? वो तो सब जानते थे ! और वो मुझे कभी कोई गलत राय देते भी नहीं , ये तो मैं जानता था ! शायद केसर से ही मेरी शादी होना तय था ….? मैंने भी मान लिया था कि ….

शेख शामी के साथ फिटन पर बैठा मैं उदास था ! 

लेकिन शेख शामी मुझे बड़े ही चुस्त-दुरुस्त लगे थे . उन की आँखों में एक अलग ही चमक थी . बड़ा वक्त गुज़र गया था जब उन्होंने मुझे शोरे के व्यापार के बारे पूछा था ! हालाँकि शोरे में मैंने जम कर माल कमाया था …और फिर से अपने गोदाम भर लिए थे ! पर शेख शामी न जाने क्यों सब भूले बैठे थे …? 

“अब तो हमें भी लश्कर तैयार करना होगा , हेमू !” एक लम्बे सोच के बाद ही शेख साहब बोले थे . “देखा है , तुमने …जो लश्कर बिहार से आया है ….?” उन्होंने मुझे पूछा था . 

“हाँ,हाँ ! देखा है !!” मैं चहका था . “बरदारी में अब खूब रौनक हो गई है !” मैंने बे-मन बताया था . 

“अब हमें ….अपना भी लश्कर बनाना होगा ….!” वो मुझे बता रहे थे . “इस से पहले कि कादिर सूबेदार बने ….मैं चाहता हूँ कि ….तुम और कादिर मिल कर ….एक बेहतर लश्कर तैयार करो ! एक ऐसा लश्कर …..जो ….” शेख शामी की निगाहों के सामने अब घोड़े दौड़ रहे थे  …और वो भारत-विजय पर निकल पड़े थे ! “सिकंदर लोधी से मैंने तय कर लिया है कि ….बंगाल ….” उन्होंने मुड  कर मेरी आँखों में झांका था . “तुम दोनों समर्थ हो ! और मुझे यकीन है कि ….तुम ….” उन का इशारा बंगाल के लिए होने वाली जंग की और था . 

“दिल्ली में रहा कर तो …..” मैं यों ही बोल पड़ा था . 

“मैं जानता हूँ ! ये काम दिल्ली से अलग रह कर ही ….होना है !” उन का कहना था . ” होश्यारी के साथ ….तुम दोनों ….” शेख शामी अब किसी चिंता में थे . 

“बिहार ही चले जांयगे …..?” मैंने सुझाव दिया था . 

“हाँ, वहीँ ठीक रहेगा …..! और फिर बिहार से  बंगाल ….. ?” वो अब मुस्कराए थे . “दोनों …बंगाल तक हाथ मारो !” ये उन का आग्रह था . “एक बार पैर टिका नहीं कि  ….. दिल्ली !” हंस पड़े थे , शेख शामी . 

दिल्ली पर ना जाने कितनी-कितनी निगाहें टिकीं थीं …..मैं तो अनुमान तक न लगा पा रहा था …..!! 

कल्लू की सराय अब मेरे लिए नई न थी।

हॉं! कल्लू जब मुझसे मिलने आया था तो उसने यूं ही के तौर पर मुझे बताया था कि सराय में पैर रखने तक की जगह न थी। शेख शामी के लिए तो लिहाज था और मेरा सत्कार था जो हमें जगह मिल गई थी। बाहर के लोग शोरा की फिराक में दर-दर डोल रहे थे। किसी भी कीमत पर शोरा खरीद रहे थे। कल्लू कह रहा था – कहीं तोपें बन रही हैं जनाब। बारूद बनाने के लिए शोरा जरूरी है। अब पैसा कित्ता भी मांग लो!

“मुझे मिला दो न?” मैंने जब कल्लू से आग्रह किया था तो वह मान गया था।

और उस रात मैंने अपना सारा शोरा बेच डाला था और अगली खेप में मैंने अरबी घोड़े मंगाने का प्रस्ताव भी पकड़ा दिया था। शेख शामी बेहद प्रसन्न हुए थे!

शेख शामी का जोरदार स्वागत हुआ था!

लोगों को पता चल गया था कि हमारा व्यवहार अब दिल्ली तक था और शेख शामी सिकंदर लोधी के खास थे। लोग ये भी समझ रहे थे कि मैं दिल्ली में रहकर खूब कमा रहा था और अवश्य ही कोई ऊंचा ओहदा पाने को था। लेकिन ये केवल कयास थे जो लोग सोच रहे थे – वो था नहीं!

नई हवेली में शेख शामी साहब को ठहराया गया था। वहीं कादिर, नीलोफर और अशरफ ने आ कर रहना था। आगंतुकों का बंदोबस्त गुरुलाल गढी पर था। इसका पूरा का पूरा जिम्मा गुरुजी का था। मेरे रहने की व्यवस्था गुरुलाल गढी पर ही थी। मैं शाम को गुरुजी के चरणों में हाजिर हुआ था। चरण स्पर्श के बाद उन्होंने मुझे बाँहों में लेकर खूब प्यार किया था!

मेरी शादी क्या थी – कोई बड़ा महोत्सव था – जैसे!

बहुत सारे लोग जमा हुए थे। मैं शायद बहुत कम लोगों को जानता था पर लोग मुझे जानते थे। सब जानते थे कि मैं दिल्ली में रह रहा था – और शायद किसी बहुत ऊंचे ओहदे पर तैनात था!

शगुन देने केसर की ढाणी से जैसे एक पूरा टिड्डी दल उठ कर चला आया था। ऊंटों पर सवार .. लम्बी लम्बी मूंछों वाले लोग सरों पर लाल लाल पगड़ियां बांधे पूरे दृश्य पर छा गये थे! पूरी गुरुलाल गढी को उन्होंने नाक तक भर दिया था।

रस्म गुरु जी की देखरेख में संपन्न हुई थी!

एक शोर था, एक सूचना थी, एक आश्चर्य था – कि जैसा शगुन केसर की ढांणी से आया था – अब तक कहीं किसी के यहां न आया था! जो सोना सौगात में मिला था – वो तो ..!

“बेहद अमीर हैं ये लोग!” शेख शामी ने भी माना था।

कादिर की आंखों में भी अचरज भरा था। वह उन लोगों को देख कर उत्सुक हो उठा था। उसे जम न रहा था कि ये लोग – देहात के लोग – इतने धनी थे? लेकिन अशरफ को यह कोई आश्चर्य न लगा था। उन का कहना था – खानदानी लोग हैं! इनके यहां तो धन की गंगाएं बहती हैं!

“मुबारक हो भाई जान!” नीलोफर ने मुझे खोज लिया था। “आपका खजाना तो आ गया!” उस ने हंस कर कहा था। “अब फौज और आनी है!” उसने व्यंग किया था। “जुड़ गई सल्तनत!” वो जोरों से हंसी थी।

तभी मुझे बाबा सा ने बुला लिया था!

“पधारो कुंवर सा!” बड़े ही प्रेम से बाबा सा ने मुझे अपने निकट बिठाया था। “प्रसन्न तो हो ..?” उनका इशारा हुए धमाके की ओर था। “परमात्मा ने तुम्हें बड़ा बनने का वचन दिया है!” बाबा सा कह रहे थे। “हम आपके पीछे खड़े हैं! लेकिन बेटे कभी भी आवाज दे कर देख लेना! जान हथेली पर लिए हम साथ खड़े मिलेंगे और केसर ..?” बाबा सा ने मुझे गौर से देखा था।

मैं भी अब बाबा सा को देखने लगा था – क्या डील डौल था! कितने पुरुषार्थी लग रहे थे? उनकी लम्बी-लम्बी सफेद मूंछों से आज भी वीर रस अपक रहा था!

“हां! और केसर – बड़ी मर्दानी छोरी है कुंवर सा! साथ लड़ेगी – केकयी की तरह!” उन का कहना था।

फिर एक बार मैंने केसर के बारे सोचा था! लड़ाकी तो थी केसर, मैं यह जानता था! लेकिन केसर का रंगरूप .. हाव-भाव .. चाल-चलगत और तमीज तहजीब ..! मुझे तो महारानी चाहिये थी?

और अब नीलोफर का हुस्न मुझे खाए जा रहा था!

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