वक्त का पहिया घूमता ही चला गया.. मैं बचपन से बडी हो गई.. और आज अपने जीवन से सीख लेते हुए.. एक मोड़ पर आ खड़ी हुई हूँ.. अकेली नहीं खड़ी हूँ.. मेरी परछाई यानी के अपने दो बच्चों के साथ हूँ। पीछे मुड़कर देखना अच्छा लगता है.. अपने परिवार में राजसी ठाठ में बचपन बिताया था.. मैने। माँ और पिताजी ने कभी किसी भी चीज़ का अभाव महसूस ही नहीं होने दिया था। माँ-बाप के राज़ में जमकर मस्ती करी, और ख़ूब ही मस्त बचपन बिताया।
स्कूल का जीवन भी अपने-आप में बढ़िया रहा.. ” टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड महसूस किया करती थी.. मैं अपने-आप को उन दिनों!”।
सारी दुनिया मेरी ही मुट्ठी में है.. ऐसा ही कुछ समझने लगी थी.. स्कूल ख़त्म हुआ.. और एक नई दुनिया यानी के कॉलेज के बिंदास जीवन से मेरा परिचय हो गया। स्कूल के माहौल के बाद यहाँ कॉलेज की मस्त ज़िंदगी लगी थी.. मुझे! न ही कोई रोक-टोक थी, और न ही कोई पूछने वाला था। कॉलेज लाइफ में एक नया काम भी सीख ही लिया था.. क्लास गोल कर सहेलियों के साथ पिक्चर देखना.. और घर जाकर पिक्चर का जिक्र न करते हुए.. यह कहना.. क्या करें क्लास लेट तक थी, इसलिये मैं भी लेट हो गई।
कॉलेज भी पूरा हो गया.. मेरी करीबी सहेली को प्लेसमेंट एजेंसी द्वारा किसी कंपनी में नौकरी भी मिल गई थी.. मुझसे भी बोली,” चल तू भी मेरे संग! दोनों मिलकर काम करेंगे! उधर इंटरनेट वगरैह भी है.. सीखने को मिलेगा!”।
उन दिनों कंप्यूटर हुआ या इंटरनेट नई चीज़ हुआ करती थी.. नौकरी के लिये मैं राज़ी नहीं हुई थी.. घर में माहौल उन दिनों लड़कियों से नौकरी कराने वाला नहीं हुआ करता था.. और माहौल की भी कोई बात नहीं है.. मैं ख़ुद भी किसी नौकरी करने के पक्ष में नहीं थी। खैर! कोई बात नहीं.. समय रहते बाबूजी ने मेरा ब्याह तय कर दिया था.. वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने के बाद ही मुझे यह अहसास हुआ.. कि लड़की हो या फ़िर लड़का उसका अपने पैरों पर खड़े होना कितना ज़रूरी है.. आज एकबार फ़िर नियति ने वही बात मेरे संग दोहराई है.. वही सब सवाल लिए मैं आज एक बार फ़िर उसी मोड़ पर अपनी परछाई के संग आ खड़ी हुईं हूँ।
नई पीढ़ी का और नई सोच का फ़र्क आ गया है! हर सवाल का जवाब और परिणाम सब वही हैं.. पर पता नहीं क्यों आज जवाब ठीक से देते नहीं बन रहा है..!!

