
भोर का तारा

युग पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !
उपन्यास अंश :-
नींद का नाम न था- मेरी आँखों में। लाख कोशिशों के बाद भी न आँखें सोना चाहती थीं …और न ही दिमाग ! एक अजीव-सा कोलाहल भीतर भरा था. एक खलबली थी ….विचारों की खलबली …भावनाओं का मेला …इच्छाओं का समुद्र …और ख़ुशी का जय-घोष जो मुझे उठाए-उठाए डोल रहा था. मैं अब अकेला न था…..पर था निपट अकेला ! जो मुझे जानते थे – पहचानते थे ….वो वास्तव में ही किसी और नरेंद्र मोदी को जानते थे.
मैं जानता था ….’नरेंद्र दामोदर मोदी’ को. सिर्फ मैं जानता था – उसे !!
इस नरेंद्र मोदी को – जिस की आज १६ मई २०१४ को जंगी जीत हुई थी ….जिसे जनता ने बहुमत दिया था ….दुलार दिया था …आशीर्वाद दिया था …! इसे जनता जानती थी, मैं भी नहीं।
आँखें आनेवाले स्वर्णिम विहान को निहारने के लिए खुली खड़ी थीं. इच्छित पल …मेरा चिर इच्छित पल …वास्तव में ही घटने को था ! पौ फटने को थी ….मैं जानता था कि …ज़रूर-ज़रूर ही पौ फटेगी ! पर – एक-एक पल – पानी की एक-एक बूँद की तरह …वक्त की काया से टपक रहा था – टप -टप-टप ….!
मेरा दिमाग कुछ धुन-बुन रहा था. क्या होगा … ? कैसा होगा …? अनेकानेक भाव आ-जा रहे थे. बहुत कुछ था जो अभी तक अनुत्तरित था. जनता से किए वायदे ….मुझे जवानी याद थे. उन का हल भी मुझे आत्ता था. लेकिन उनका फल ….? फल का दिखाई देना अभी दूर था …बहुत दूर ! जबकि मेरी पूरी उम्र की साधना -मीठे फल चखने के लिए ही तो थी.
अचानक ही की साधना का खेल ….स्वयं ही आ कर मुझ से चिपक जाता है तो अचानक ही दिमाग – मेरी कसी मुट्ठी से भाग – बाद नगर पहुँच जाता है. एक शिद्दत के साथ यादें चली आती हैं। एक पुरजोर आंधी की तरह …मेरा विगत मेरे सामने – उठ बैठता है ! क्या करू …? कैसे रोकूं ..?
उम्र ही क्या थी तब …! यही कोई बारह-तेरह साल ..! लेकिन उस छोटी उम्र में …उस खेलने-खाने की उम्र में …उस दुधमुही उम्र के आँचल में – जो घटा -वह तो अविश्मरणीय था. मैं अब अपनी उड़ान की तैयारियों में जुटा था. बाद नगर , गाँधी नगर से करीब १५० किलोमीटर दूर था. बाद नगर अपने आप में सम्पूर्ण था. उस नगर को अपना अकेलापन खूब भाता था. दुनियादारी की खबर-सुध उसे नहीं थी. दुनियाँ में कहाँ क्या हो रहा था – बाद नगर को न इस की परवाह थी …न ज्ञान !
ये बाद नगर तो अपने अज्ञान के अभिमान में चूर था.
लेकिन मैं बे-खबर न था ..! मैं अपनी उड़ान की तैयारियों में जुटा था. बाद नगर के साथ , मैं न था ! मैं कभी भी ….किसी भी दिन बाद नगर से नाता तोड़ भाग जाने की सोच रहा था.
हाँ, हाँ-हाँ …! वक्त के बहेलिए को मेरी अपनी गुप्त उड़ानों और एकल इरादों का पता चल गया था. न जाने कैसे …सब हवा पर व्यक्त हो जाता है …! मैं भी हैरान था …और आज भी हैरान हूँ कि …वक्त को ये भनक लगी तो लगी कैसे ….?
“क्या ….?” मैं उछल पड़ा था. “शादी ….?” मैंने जोर दे कर पूछा था. “मेरी शादी …होगी …..?” मैं डर गया था.
मेरे प्रश्नों और प्रति-प्रश्नों को सुन कर यही वक्त का बहेलिया तब मुझ पर जोरों से हँसा था.
बाबू जी ने स्वयं ही मुझे बताया था कि वो मेरी शादी करने जा रहे थे.
चौक रहे हैं,आप …? पर ये सच है – जीवन और मृत्यु की तरह ! मेरी शादी का आया प्रस्ताव सच था …सही था …शास्वत था।
ये तब के ज़माने थे – आज के नहीं …!
बच्चों का भविष्य बनाना तब माँ-बाप की जिम्मेदारी होती थी. बच्चों से उन के निजी मामलों में उन की राय लेना ज़रूरी नहीं था. बच्चों के लिए माँ-बाप की हर आज्ञा -शिरोधार्य होती थी. बाप के सामने बेटे का बोलना – अपराध जैसा ही कुछ होता था. आज्ञाकारी बेटों का होना …बेटों का होना था …! सर झुका कर …विनम्र भाव से – बाप का सब कुछ कहा स्वीकारना – एक चलन था.
और माँ-बाप की सेवा करना भी बेटों का परम-धर्म था …..!
और माँ-बाप का फर्ज़ था – बच्चों की वक्त पर शादी कर देना …!
इस के अलावा ….या कहूँ कि इस से आगे …उन्हें कुछ न आता था – और न ही उन का कोई सोच इस से आगे जाता था …! लेकिन उन का प्रतिवाद नहीं किया जा सकता था …!! उन्हें ..सर्वज्ञ ….सक्षम …और सम्पूर्ण मान कर ही जिया जाता था ….!
समाज के नियम – कानून तब बेहद पेचीदा थे ….जड़ थे ….अकाटय थे …और उन का उलंघन करना अपराध था – सामाजिक अवहेलना थी ….
क्रमशः –
