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Laal Gulaab

ON THE OCCASION OF -INTERNATIONAL WOMEN'S DAY !! 

वह मिल गया और गया …!!

कहानी – तीसरी किश्त :-

"तु…म , अ…आ…..प ….?" मैं उछल पड़ी हूँ . 

अचानक मधुर आ कर मेरे सामने बैठ गया है – एक साकार हुए सपने की तरह ….एक सुविचार के मानिंद ….या कहें – मांगी मुराद बन कर …!! मैं अनवरत मधुर के बारे ही सोचती रही हूँ . और उसे ही पुकारती रही हूँ ! मैं बहुत-बहुत ….अकेली जो …हो गई हूँ ! घर से मेरा नाता टूट-सा गया है !

"क्यों ….? मुझे आना नहीं चाहिए था ….!" मधुर हंसा है . 

हँसता मधुर मुझे बेहद भाता है . उस के हाव-भाव भी बहुत मोहक हैं . उस की आवाज़ मेरे लिए एक अभिमन्त्रण है ! 'कोई पुकारता-सा' लगता है ! 'बुलाता-सा' कोई अपना !!

"न …नहीं ! वो बात नहीं है ….!! ब-हु-त  …दिन हुए …." अब मेरी जुबान अटक गई है . 

"बहुत दिन ….? हाँ ! इन बहुत सारे दिनों में ….मैं बहुत सारे संग्राम लड़ चूका हूँ …., शमा !"

"मतलब….?" मैंने आँखें उठा कर मधुर को सीधा देखा है, इस बार .

"मतलब कि मैं बाघी हूँ !अपना घर छोड़ आया हूँ ….! शादी के उन के प्रस्ताव को ठुकरा कर मैने ….जो अपराध किया है ….उस की सजा ……"

मैं चुप हूँ . प्रसन्न भी हूँ . मधुर अपनी शादी के प्रस्ताव को ठुकरा कर जो लौटा है- मेरी ही तरह  ! हम दोनों एकाकार हुए लगे हैं . हम …दो नहीं …..एक ….एक – से   हैं …! बराबर हैं . अब मधुर मुझे ही देख रहा है ….लगातार ! 

"चाय नहीं पिलाओगी ….?" मधुर की मांग है . 

"क …क्यों , नहीं ….? च..चाय …! दो ..कप …और ……"

"और कुछ नहीं !" मधुर ने मुझे रोक दिया है .

लो, मैं फिर से चुप हो गई हूँ !

"मेरा सौदा तय हो चुका था . " मधुर बोला है . तनिक खुश लगा है . "लड़की वाले …पैसे वाली पार्टी हैं . पोलिटीसियन …भी हैं …और व्यापारी भी ! मुझे शादी के बाद उन्ही के यहाँ काम करना था ! 'नौकरी में क्या धरा है' – उन का कहना है . 'उन के पास क्या नहीं है ' – उन की धौंस है . और 'मुझे क्या चाहिए , मैं मांग लूं ' – उन का आग्रह है !" मधुर चुप हो गया है . वह कुछ सोचने लगा है .

मैं भी अचानक अपने परिवार के बारे सोचने बैठ जाती हूँ . उन के पास कुछ नहीं है . एक अदद बेटी है , बस ! शादी में छोटा-मोटा मान-सम्मान तो करेंगे ….पर दान-दहेज़ के नाम पर ….? सुखबीर जैसा खोटा  सिक्का ही खरीदने की औकात है , उन की !

"लड़की नाइन्थ तक पढ़ी है . गोल-मटोल ….अच्छी ….तंदुरुस्त है !" मधुर बता रहा है . "उन के यहाँ लड़कियों से नौकरी कराने का रिवाज़ नहीं है . लड़की सुख देगी …..गृहस्थ बसाएगी …., इस की गारंटी है , उन की !" वह हंसा है . "घर वाले  बहुत प्रसन्न हैं . इतना अच्छा रिश्ता मिलता कहाँ है – उन का कहना है !"

लगा है – दो पाटों के बीच आए – हम दोनों ….अपनी-अपनी नजात भोग रहे हैं ….एक रिहाई की प्रार्थना कर रहे हैं ….समाज से , परिवार से , परिवेश से ….और …और …हाँ ! पैसे से ….!! ये पैसा ही मुझे …हर हत्या का मूल कारण लगा है !

"भई , अपने खर्चे के लिए तो कम ही लेता हूँ !" मधुर ने जैसे शांति भंग कर दी हो ! उस का स्वर मुझे एक विद्रोही का स्वर लगा है .  उस ने जैसे पैसे को ही लात मारी हो, ऐसा प्रतीत हुआ है  ! "फिर मुझे तो ससुराल में पड़े रहने का शौक नहीं है . मैं आजीवन क्या करूंगा …? वेस्ट …ऑफ़ टैलेंट ….! मेरे पास हुनर है …, शमा ! मैं तो चाहूंगा कि …." उद्विग्न हो आया है , मधुर ! 

हम चाय पी रहे हैं . मधुर बड़े ही करीने से चाय की चुस्कियां ले रहा है ! अच्छा लगता है …यों उस का चाय पीना ! सुखबीर ने जब सुडक-सुडक कर चाय पी थी ….तो मेरा मुंह कड़वा हो गया था ! मैनर्स में मधुर मार नहीं खाता !!

"मैंने फ़्लैट ले लिया है , रेंट….  पर !" मधुर ने मुझे सूचना दी है . "देखोगी ….?" उस ने आग्रह किया है . 

"क्यों ,नहीं  …., क्यों नहीं ….?" मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं है !

"ऑफिस …के बाद ….मिलते हैं !" मधुर ने तय किया है और चला गया है !

अब …..अब ….? अब ….क्या ….? एक कप चाय …और ….! मैंने जोरों से पुकारा है ! जैसे मैं इनाम पा जाना चाहती हूँ – एक कप चाय और पी कर …! क्यों कि मैं जीत गई हूँ ….एक जंग …!! और अब मैं जश्न मना रही हूँ ….!

इस चाय का तो जायका ही अलग है ! मन की उड़ान भी और है ! तन के पुलक …तन्हाई की कैद से अलग जो हो गए हैं …! मेरा जैसे विस्तार हो रहा है ….में बढ़ रही हूँ …..और बेल की तरह मैं फैलती ही चली जा रही हूँ ! मधुर मेरे मन-प्राण में आ बसा है ….अब मैं अकेली नहीं हूँ – मुझे एक एहसास हुआ है ! 'मिलेगा मधुर ' मैंने अपने आप को आश्वस्त कर लिया है !

शाम है कितनी दूर ….?

जैसे इश्वर से आज मेरी पहली मुलाक़ात हुई हो, मुझे लगा है ! मैं जो उसे अब तक पुकारती आ रही थी …..वह मिला और गया ….!!

………………..

श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !! .

  

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