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खानदान 111

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” मुझे तलाक चाहिये! अभी और इसी वक्त!”।

रमेश ने इस कदर नाटक रचा.. कि सुनीता का दिमाग़ गर्म होता ही चला गया था.. और गर्म दिमाग़ पर काबू न पाते हुए, सुनीता बौखला कर चिल्ला उठी थी.. और चिल्लाते हुए.. तलाक की माँग कर बैठी थी। रमेश और सुनीता के बीच हो रहे झगड़े के सीधे प्रसारण के मज़े सुनीता के कमरे के नीचे खड़े होकर दर्शनाजी और रमा ने खूब लिये थे। रमेश और सुनीता के झगड़े की आवाज़ें दूर-दूर तक जा रहीं थीं.. लेकिन दोनों का बीच बचाव करने और दोनों के झगड़े को रोकने कोई भी घर का सदस्य नहीं आया था। उस दिन बात इसी झगड़े को लेकर ख़त्म हो गई थी.. पर सुनीता का दिमाग़ अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ था.. और बेचैन मन को लेकर सुनीता ने एकबार अपना सामान चैक कर लेना ठीक समझा था।

” मेरा कड़ा!.. अरे! मेरा दूसरा सोने का कड़ा कहाँ है..!!”।

सुनीता दहेज में दिया हुआ.. अपने पिता का सोने का कड़ा न पाकर एक बार फ़िर से घबरा गई थी.. घबराहट में सुनीता ने हर जगह छान मारी थी.. पर अपना दूसरा पिता का दिया हुआ.. कड़ा ढूंढ पाने में असमर्थ हो चुकी थी।

सुनीता के दिमाग़ में शक तो था..  कि घर से सोने का कड़ा आख़िर जाएगा कहाँ.. पहले भी..???

लेकिन सुनीता ने नाम लेना ठीक न समझा था। फ़िर एक दो दिन बीतने के बाद रमेश के हाथों में थैला भरकर सामान था..  रमेश घर में ख़ुश होकर मिठाई-विठाई सभी चीज़ों से लद कर आया था। अब हैरानी की बात तो थी ही.. घर में तो रमेश को इतने पैसे मिलते नहीं थे.. रमेश का चेहरा गड़बड़ की तरफ़ ही इशारा कर रहा था। सुनीता से रमेश के हाव-भाव देखे न गए थे.. और सुनीता क्रोध में चिल्ला उठी थी..

” मेरा सोने का कड़ा कहाँ है..!!! बिकवा दिया न तेरे भाई ने गाड़ी का पंक्चर ठीक कराने के लिए!!”

अब चीखने -चिल्लाने का कोई भी फ़ायदा नहीं था सुनीता! क्यों नहीं मान ली थी, तुमनें अपने माँ-बापू की बात.. जब वो बार-बार तुमसे कहे जा रहे थे.. कि अपने काम पर ध्यान दो! जो भी बात अपने ख़ुद के नियंत्रण में नहीं होती..  उसे परमात्मा पर छोड़ कर आगे बढ़ जाना चाहिये। नहीं तो सुनीता की तरह हरजना भुगतना पड़ता है। थोड़ा सा भी खेल को अक्ल से अगर सुनीता खेलती.. तो इतनी मोटी कीमत अदा नहीं करनी पड़ती।

सब बातें होती हैं.. कहने की.. जो कुछ भाग्य में नहीं होता.. वो हाथ से छूट जाता है। सुनीता कहीं भी ग़लत नहीं थी.. केवल ईश्वर के हाथों की कठपुतली थी वो। अपनी हर चाल पर मात खाती हुई, सुनीता फ़िर भी इसी रमेश के साथ आगे बढ़ रही थी.. हे! ईश्वर सुनीता की मदद करो!

आइये हम और आप भी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं.. कि सुनीता अपने बिखरे हुए घोंसले को दोबारा से बनाने में कामयाब हो पाए। सुनीता के लिये प्रार्थना करते हुए.. जुड़े रहें हरेक खानदान के साथ।

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