” यो के कर राख्या से! जमा ये दो टायर पंक्चर हो रे सें.. किसकी हरकत से यो!”।
रमेश शाम के वक्त एकबार फ़िर रंजना से मिलने के लिये सज-धज कर तैयार होकर निकला था.. गाड़ी को देखते ही जनाब आग बबूला हो उठे थे.. और होते भी क्यों नहीं.. एक तो मैडम राह देख रहीं थीं, और दूसरा ये टायर पंक्चर का तमाशा खड़ा मिला था। चीखता- चिल्लाता रमेश सीधा अपनी माँ के कमरे में दाखिल हुआ था.. रमेश ने गाड़ी के टायर पंक्चर होने को ख़बर अपनी माँ को दे थी, लेकिन पूरी तरह से माँ-बेटों में अभी इस मामले को लेकर पंचायत नहीं बैठी थी.. अब पहले से ही लेट रमेश दर्शनाजी को ख़बर देते ही.. जैसे-तैसे टायर बदल गाड़ी लेकर रंजना को हाज़िरी लगाने रवाना हो गया था।
इधर दर्शनाजी के कानों में गाड़ी पंक्चर की बात तो पड़ ही गई थी, बस यही बात लिये दर्शनाजी अब बाहर घर के गार्डन में जा बैठीं थीं, रमा और सुनीता भी सासू-माँ के संग ही बैठ गए थे। अब यहाँ सुनीता को यह नहीं पता था.. कि सासू-माँ को गाड़ी को लेकर कोई भी जानकारी है.. नहीं जानती थी.. कि रमेश पहले ही माँ के आगे गाड़ी पंक्चर का रोना रो कर जा चुका है।
” या गड्डी की बात मेरे समझ में कोनी आई.. घर का आदमी तो या काम करे कोनी.. बाहर वाले में इतनी हिम्मत कड़े ते आ गई!”।
दर्शनाजी ने अपने मन में चल रही गाड़ी की बात को लेकर दोनों बहुओं के आगे कहा था। सुनीता और रमा दोनों बात सुनकर एकदम चुप-चाप बैठी रहीं थीं, और कुछ देर बाद रमा को सासू-माँ के पास बैठा छोड़कर सुनीता वहाँ से चली गई थी.. सुनीता को दर्शनाजी की बात सुनकर न ही कोई घबराहट हुई थी.. न ही पकड़े जाने का ख़तरा महसूस हुआ था। और सुनीता निश्चित होकर अपने कमरे में ऊपर चली गई थी।
” जिसने टायर पंक्चर किया है.. पैसे वही देगा!”।
थोड़ी सी देर बाद ही सुनीता को दर्शनाजी के तेवर बदले-बदले नज़र आए थे। सुनीता दर्शनाजी के बात करने के अंदाज़ से ही भाँप गई थी.. कि हो न हो.. सासू-माँ को गाड़ी को लेकर कुछ अंदाज़ा हो गया है।
सुनीता की सोच एकदम सही निकली थी.. सुनीता की सोच का नज़ारा उसको अगले दिन सुबह देखने को मिला था.. नीचे बैठक में सुनीता के ख़िलाफ़ सारी पंचायत जुड़ी हुई थी.. और सुनीता को देखते ही रमा के मुहँ से निकल भी गया था,” टायर तो घर के ही किसी ने पंक्चर किये हैं.. बाहर वाले की हिम्मत नहीं है.. गाड़ी को हाथ लगा जाए!”।
यहाँ पर रमा का इशारा तो सुनीता की तरफ़ ही था.. पर कुछ सोच कर रमा ने साफ़ शब्दों में सुनीता का नाम नहीं लिया था।
अब गवाही तो सुनीता की ओर ही इशारा कर रही थी.. कि गाड़ी के पहिये सुनीता ने ही पंक्चर किये थे। पर क्या सबके सामने सुनीता अपनी की हुई ग़लती को कबूल करेगी.. या फ़िर ये गाड़ी के पहिये मुद्दा बनकर एक और नाटक को जन्म दे देंगें। आने वाले दिलचस्प नाटक को जानने के लिये पढ़ते रहें खानदान।

