अकेले बैठे अविकार को आज न जाने क्यों गंगू बहुत याद आ रहा था।
“अगर तू सफल हो जाए अविकार तो मुझे भी इस नरक से बाहर निकाल लेना।” गंगू की याचक आवाजें अविकार सुनने लगा था। “भाग जा! जैसे तैसे – कैसे भी हो दोस्त, भाग जा! वरना तो मेरी तरह तुझे भी ये ..”
गंगू गाइनो के लिए बहुत सारे अपशब्द बोल जाता था तो भी अविकार उसे रोकता नहीं था। शोभा को भी गरियाता था गंगू, औरत को माया बताता था और पागल बनाने की पुड़िया कहता था। अविकार भी अब महसूसता था कि शायद गाइनो के वो प्रेम प्रसंग मात्र एक छलावा था। मात्र उसे फसाने के लिए गाइनो ने वो सब किया था – जो .. जो सहज नहीं था!
स्मृति पटल पर तमाम अंकित यादें जिंदा होकर अविकार के पास आ बैठी थीं।
“यू आर माई लव अवि!” गाइनो की मधुर आवाज उसे खूब सुहाती थी। “मैं कहां से चली थी – प्रेम दीवानी और कहां पहुंची?” गाइनो खुल कर हंसती थी। “हमारा मिलन तो होना था अवि वरना तो ..”
“मैंने तो प्यार-ग्यार के बारे कभी सोचा ही नहीं था!” अविकार ने सच उगला था। “मैं तो .. मैं तो .. लड़कियों से बहुत डरता था! शर्मीला था। सरोज मौसी तो आम कहा करती थीं – कभी तो आंख उठा कर देख लिया कर बेटे!”
“लेकिन अब तो तुम ..?” गाइनो ने शरारत भरी निगाहों से अविकार को घूरा था। वह हंसी थी। उसने अविकार को याद दिलाया था कि जिस तरह वो गाइनो के मक्खन जैसे नरम शरीर को खा डालता था!
और सच में ही गाइनो उसके किए उन प्रेम के जख्मों को सहलाती सहती थी।
शायद ये सब लंदन में मिले उन संस्कारों की देन थी जो सेंट निकोलस से उसे मिले थे।
आश्रम के इस जीवन से कितना भिन्न था वो सेंट निकोलस का जीवन!
खाने नहाने तक के तौर तरीके थे वहां! हर मौके के लिए ड्रेस भी अलग थी और जूते तक भिन्न प्रकार के होते थे। समय की तलवार तो हर पल ही सर पर लटकी रहती थी। लेट होने पर तो कयामत टूट पड़ती थी। तुम्हें एक सफल कोरपोरेट बनना है – यह बार बार बताया जाता था। बताया जाता था कि वक्त की ही कीमत है। वक्त जाया करना गुनाह है। जो आदमी समय का आदर न करे वह कहीं नहीं पहुंच सकता!
लेकिन यहां? आश्रम के तो अलग ही सत्य हैं!
अपने अपने लिए उतना ही लेना है जितना दरकार है। आप ने सब कुछ अपने लिए नहीं समेटना! प्रकृति ने सब कुछ दिया है, सब के लिए दिया है और मुफ्त दिया है! हवा है, पानी है, रोशनी है और खुला खिला सारा संसार है। सुख लो, स्वस्थ रहो, चिंता मुक्त होकर चलो और होने दो जो भी हो रहा है। वह तो होगा – वह जो पूर्व निर्धारित है ..
“जैसे कि गाइनो से हुआ मेरा मिलन!” सोच कर अविकार हंस जाता है। “और अब न जाने वह कहां होगी, क्या खेल खेल रही होगी? अगर उसने ढूंढ निकाला उसे तो गजब हो जाएगा!” अविकार अचानक ही सहम गया था। उसे लगा था जैसे वह गुनहगार था गाइनो का और अगर पकड़ा गया तो ..?
“क्या वंशी बाबू और स्वामी जी उसकी मदद करेंगे?” अचानक ही अविकार के मन में प्रश्न उठा था। “शायद .. शायद ही ..” वह कोई निर्णय नहीं कर पाया था। “और अमरीश अंकल?” आज पहली बार उसे अमरीश अंकल का ध्यान आया था। “कितने अच्छे हैं अमरीश अंकल लेकिन ..”
अविकार को लगा जैसे लालच का भूत आश्रम के बाहर ही कहीं बसता था और आदमी को देखते ही पकड़ लेता था।
“पापा क्या ले गए?” अचानक अविकार सोचने लगा था। “अमरीश अंकल भी क्या लेकर जाएंगे?” उसके प्रश्न थे। “और गाइनो ..?” वह अचानक इस प्रश्न पर आकर ठहर गया था। “कोई भी गुल खिला सकती है गाइनो!” अविकार ने मान लिया था।
गाइनो की जीने की राह कहां से जाती है – उसे ही नहीं किसी को भी पता नहीं था!
मेजर कृपाल वर्मा

