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जीने की राह सत्तावन

“ये पागल ही है स्वामी जी!” शंकर मुझे अविकार के बारे में बताने लगा था। “कीर्तन में जब सब आनंद विभोर होकर झूमने लगते हैं ये लट्ठा बना बैठा रहता है।” शंकर ने मुझे पलट कर देखा है। “भगा दो इसे आश्रम से!” उसने अपनी राय दी है। “कहीं कुछ कर बैठा तो ..”

“कहां जाएगा?”

“कहीं भी जाए! कोई तो इसका अपना होगा ही।”

“कभी कभी अपनों के बीच में जी लेना भी असंभव हो जाता है शंकर!” मैंने एक सच को शंकर के सामने रख दिया है।

शंकर चुप है। हाथ का काम निकाल कर वह लौट गया है। मैं अकेला रह गया हूँ। लेकिन सच में मैं अकेला हूँ नहीं! अविकार अंजाने में ही मेरे पास आकर बैठ गया है। परास्त हुआ अविकार पागलखाने से भाग कर यहां चला आया है। लेकिन आश्रम के परिवेश से अभी तक जुड़ नहीं पाया है। शायद .. शायद क्यों वो तो प्रभु को जानता ही नहीं।

“तुम भी तो प्रभु को नहीं जानते थे, पीतू!” मैं हंस पड़ा हूँ। ये सच है। मुझे गुलनार से आगे और कुछ सूझता कब था। जैसे कि अविकार को गाइनो ग्रीन से आगे किसी और दुनिया का अता पता मालूम नहीं है।

मेरे पास आ बैठा है अविकार! अब कैसे कराऊं अविकार का परिचय अपने प्रभु से – मैं समझ नहीं पा रहा हूँ।

“प्रणाम स्वामी जी!” अनायास मैंने वेद वाक्य सुना है जो वंशी बाबू के मुखारविंद से प्रस्फुटित हुआ था – उस दिन जब पीतू मरणासन्न था। वेद वाक्य को सुनते ही पीतू मर गया था और स्वामी पीतांबर दास का जन्म हो गया था।

मैं अचानक ही अविकार के जर्जर और टूटे फूटे शरीर में प्रवेश पा गया हूँ।

अविकार की आहत आत्मा से मेरा परिचय हुआ है। विकारों, दोषों ओर कुसंगतियों की मनों मिट्टी के नीचे दबी अविकार की आत्मा आंसुओं से रो पड़ी है। कैसे पहुँचूं प्रभु तक – उसने टेर लगाई है। ये देखो मेरे घाव! मेरी नस नस में जहर भरा है, ईर्षा, नफरत, काम और क्रोध ने मेरी काया को सुखा दिया है। प्रभु की बात तो छोड़ो मैं तो प्रेमिल पलों के लिए भी तरस गई हूँ। ये आदमी अब आदमी नहीं रहा है।

“यू बीस्ट!” अचानक ही संगमरमरी शरीर को खाते चबाते अविकार को उलाहना देती है गाइनो। “ईट मी अप डार्लिंग!” गाइनो का आग्रह अविकार को पागल कर देता है।

“अमृत की एक बूंद पिलाना तक असंभव है।” मैंने भी अनुमान लगाया है। “हां, विष तो पीएगा और पीता ही रहेगा! ऐसा कौन सा वेद वाक्य है जो ..”

“आइए भक्त राज!” अविकार आया है तो मैंने उसे नए नाम से पुकारा है।

कई पलों तक वो कुछ नहीं बोला है। वह मेरी हंसी को नाप रहा है। वह मेरी प्रसन्नता को तौल रहा है। वह मरे कहे संबोधन भक्त राज को अस्वीकार नहीं कर पाया है। एक कड़वी दवा की तरह वह भक्त राज के संबोधन को चबाता रहा है। फिर उसने बड़ी ही सावधानी से भक्त राज के संबोधन को अपने गले के नीचे उतारा है।

ठीक उसी तरह जैसे मैंने भी स्वामी जी के संबोधन को मान लिया था!

“मेरा पेट ठीक नहीं है स्वामी जी!” अविकार ने चरण स्पर्श करते हुए कहा है।

“चंद्र प्रभा का पानी पेट भर कर पिया करो!” मैं बता रहा हूँ। “पशुओं को कभी पानी पीते देखा है?” मैंने पूछा है। “घुटने टिका कर, मुंह गाढ़ कर पानी पीते ही जाओ .. पीते ही जाओ ..” मैं हंस रहा हूँ। “और फिर सुबह शाम हो सके तो दोपहर को भी नदी में घुस कर स्नान करो! लंबे पलों तक पानी में पड़े रहो! तैरना आता हो तो तैरो – और ..”

“इससे क्या होगा स्वामी जी?”

“तुम्हारे सारे संताप हर लेगी चंद्र प्रभा!” मैंने दृढ़ विश्वास के साथ कहा है।

किसी भी दवा से बड़ा होता है विश्वास!

और आज पहली बार मैंने अविकार की आंखों में एक नए ज्योति पुंज को प्रवेश करते देख लिया है। लगा है – आज उसे एक नया रास्ता दिखाई दे गया है।

जीने की राहें इसी तरह बनती बिगड़ती रहती हैं।

मेजर कृपाल वर्मा

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