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जीने की राह सत्तर

“लुक एट माई लक!” गाइनो बार में बैठी अपनी किस्मत की कहानी दोस्तों को सुना रही थी। “आई बम्पड इनटू ए फारचून एक्सीडेंटली! हाहाहा!” वह जोरों से हंसी थी। “टू डेट्स मोर एंड आई विल गेट मिलियंस एंड मिलियंस!” उसने घोषणा की थी।

जमा दोस्तों को खुशी नहीं हुई थी बल्कि एक निराशा का झटका लगा था। यहां तो हर कोई पैसों, जागीरों और जायदादों का ग्राहक था। उन सब का एक ही उद्देश्य था – एन केन प्रकारेण माल झटका जाए और ऐशो आराम की जिंदगी बसर की जाए। वो हर सामाजिक या कानूनी पचड़ों से अलग थे। उनके उसूल और उद्देश्य बिलकुल भिन्न थे।

गाइनो भी उनमें से ही एक थी और अब सफलता का डंका बजा रही थी।

“मेरे वकील ने कहा है – बस दो डेटों का काम है मैडम! हमने केस जीत लेना है। अवस्थी इंटरनेशनल आप का होगा!” गाइनो बताने लगी थी। “लोगों की और कोर्ट कानून की जिम्मेदारी वकीलों के पास है!” गाइनो ने पलट कर मित्रों को देखा था।

“वो क्यों?” एक मित्र का प्रश्न आया था।

प्रश्न का उत्तर देने से पहले गाइनो ने पूरी घटना का जायजा लिया था। जब यहां से वो भारत को टारगेट मान कर निकली थी तो मन में हजारों शंकाएं थीं। और अनोखा सा एक डर था। भारत के लोगों ने ब्रिटिश को देश से खदेड़ कर बाहर निकाल दिया था – वह जानती थी। अतः भारत के लोगों के बारे उसके अलग अनुमान थे। वह मान कर चली थी कि भारत के लोग गोरे लोगों से नफरत अवश्य करते होंगे! क्योंकि गोरों ने उन्हें गुलाम बनाया था अतः वो लोग ..

और जब गाइनो के अपने ही सारे अनुमान गलत सिद्ध हुए थे तो वो हैरान थी।

भारत तो आज भी गोरों का गुलाम था – उसे महसूस हुआ था। और आज भी भारत में गोरों की भाषा का मान सम्मान ही नहीं था डिमांड भी थी। और .. और गोरों के साथ लोगों का व्यवहार भी मैत्रीपूर्ण था। गोरों को सौहार्द और सम्मान सभी कुछ मिलता था – वो भी बिन मांगे!

यहां तक कि वकील, पुलिस और कोर्ट कचहरी में भी उसे आदर मिला था और उसकी चाल कामयाब हो गई थी!

लोग छोटे छोटे लालचों के गुलाम थे। कोर्ट का फेवर भी कीमत चुकाने पर मिल जाता था। शोशल मीडिया मदद करता था और प्रेस भी सहारा लगा देता था। उसकी झूठी कहानी को एक सच्ची और संवेदनशील कहानी बनने में इन सब ने उसकी मदद की थी। लाख कोशिशों के बाद भी अमरीश अपनी बात कह न पाया था। सच्चा अच्छा और बेहद ईमानदार अमरीश झूठा मक्कार लालची और बेईमान सिद्ध हो गया था।

और अविकार ..? हाहाहा! अविकार .. बेबी ..! ए ब्लडी ब्यूटीफुल फूल! उसके हुस्न पर ही मर मिटा! जैसे उसने कभी औरत देखी ही नहीं थी – टूट कर पड़ा और होश हवास गंवा बैठा!

“निरा नादान निकला! माई गुड लक!” गाइनो ने प्रसन्न होकर स्वयं से कहा था।

“सब कुछ समेट लाना वहां से डार्लिंग!” रोबर्ट कह रहा था। “हम आते ही शादी कर लेंगे और ..”

“क्यों?” पलट कर गाइनो ने पूछा था। “शादी क्यों? तुम्ही से क्यों?” गाइनो का स्वर गंभीर था। “मैंने तो एल ए में जागीर खरीदनी है! गाइनो ग्रीन से ग्रीन को ब्रेंडिड नेम बनाना है! मैंने तो दुनिया पर राज करना है रोबर्ट! मैरिज इज ए स्टूपिड गेम! हाहाहा!”

रोबर्ट हैरान था। उसे तो लगा था कि गाइनो के साथ साथ उसकी भी लौटरी लग गई थी। लेकिन ..

ये कौन सी राह थी – जिस पर गाइनो चलना चाहती थी?

रोबर्ट चुप था!

मेजर कृपाल वर्मा

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