काफी दिन के बाद लौटी थी एक दिन – गाइनो ग्रीन!
“भूल गए?” आते ही उसने प्रश्न किया था। “लेकिन हम नहीं भूल पाए – सो चले आए!” वह खिलखिला कर हंसी थी। उसका चेहरा मोहरा दमक रहा था। उसके सफेद दांत बड़े ही मोहक लगे थे मुझे।
मुझे वो रात फिर से याद हो आई थी जिसे मैं हर रात भुलाने का प्रयत्न करता रहा था।
“चलते हैं!” प्रस्ताव था गाइनो का।
“लेकिन कहां?” मैंने यूं ही पूछ लिया था।
“लेट्स फ्रीक इन द वुड्स!” उसने तपाक से कहा था।
“मतलब ..?” मैंने आश्चर्य से पूछा था।
“मतलब ये जनाब कि हम दोनों जंगल की खाक छानेंगे!” वह हंसे जा रही थी। “हम दोनों जंगल में कहीं गहरे में जा घुसेंगे और फिर खोजेंगे जीने के सहारे, वो तौर तरीके जब हम जंगल के दोस्त होंगे और जी रहे होंगे निफराम! मैं और तुम अविकार अकेले!” गाइनो ने अपना हाथ अपने हाथों में भर लिया था। “मैं तुम्हें भुला न पाई – सो चली आई!” उसने फिर मुझे याद दिलाया था। “वी आर द नेचुरल लवर्स!” उसने अपनी गहरी नीली आंखों में मुझे समेटते हुए कहा था।
हम दोनों कमरों पर पिट्ठू लादे और हाथों में छड़ियां संभाले जंगल में जा घुसे थे।
“सच में स्वामी जी बड़ा ही आनंद था उस अनोखी यात्रा का!” अविकार ने मुसकुराते हुए बताया था। “अनाम से वो परिचय, पेड़ों के साथ बोले संवाद और जंगल की पवित्र हवा का स्वाद मैं आज तक नहीं भूला हूँ!” अविकार बताता जा रहा था। “रात के अंधकार में गुपचुप हम दोनों ने एक छोटी सी बहती जलधारा के निकट अपनी सेज सजाई थी। गाइनो हर काम में दक्ष थी। बड़ी ही चतुराई से उसने एक छोटा गोल टेंट तैयार किया था और हम दोनों उसमें घुस गए थे। हमने छोटा छोटा डिनर किया था और फिर मोमबत्ती बुझा कर हम एक दूसरे की बांहों में बांहें डाले सो रहे थे। दोनों के शरीरों की गर्मी का वो अभूतपूर्व सुख और वो ..”
“डर नहीं लगा था?” मैंने अविकार से पूछा था। “जंगली जानवर शेर चीते और बघेर भेड़ियों से जंगल तो भरे पड़े हैं?”
“गाइनो ने ही बताया था मुझे स्वामी जी कि जंगली जानवर कभी आदमी पर हमला नहीं करते।” वह बताने लगा था। “और सच में ही हम सुरक्षित थे। सुबह का सूरज निकला था तो हमने ओस में भीगे वनांतर को छू छू कर आनंद लिया था और गीली घास पर बैठ कर नाश्ता किया था। फिर गाइनो ने बांस को छील कर भाला बनाया था और हमने मछलियों का शिकार किया था। निर्मल पानी की धारा में किलोलें करती मछलियां जैसे ही दिख जाती थीं गाइनो भाले से अचूक वार करती थी और मछली में भाला छिद जाता था। फर उसने आग जलाई थी और मछलियों को बांसों में बींध कर सेंकने के लिए ऊपर टांग दिया था। अब हम दोनों उसे निर्मल जल धारा में निर्वसन हुए नहा रहे थे।” अविकार रुका था। उसने मुझे आंखों में घूरा था। “सच कहता हूँ स्वामी जी गाइनो का वो संगमरमर का बना शरीर निर्मल पानी में भीगा भीगा मुझे इतना भा गया था कि मैं पागल हो गया था और उसके बाद से ही ..”
“क्या छोड़ कर चली गई थी?” मैंने पूछा था।
“नहीं! इस बार वो मेरे साथ ही रहने लगी थी। हमारी दोस्ती जग जाहिर हो गई थी। अविनाश अंकल को भी भनक लग गई थी पर वो कुछ बोले नहीं थे। हां! जब कोर्ट में मैं अवस्थी इंटरनेशनल को गाइनो के नाम लिखने गया था तब उनका वकील आया था। उसने ही बताया था कि मैं मालिक तो था लेकिन बिना उनकी सहमति के मैं फर्म को न तो बेच सकता था और न किसी और के नाम कर सकता था। मम्मी पापा की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। मैं ही था उनका अकेला वारिस लेकिन ..”
माइनो को एक बहुत बड़ा झटका लगा था।
“इसी ने मारा है तुम्हारे मम्मी पापा को!” गाइनो ने मुझे समझाया था। “ये घाघ है! सब कुछ डकार कर रहेगा, अवि!” वह कहती रही थी।
“अब क्या हो?” मैं पूछ रहा था।
“कोई तरीका, कोई चाल या कोई कानून हमें तलाशना होगा जब हम ..” वह रुकी थी। “तुम पागल हो जाओ अवि!” गाइनो बता रही थी। “फिर तो मैं इसे देख लूंगी! यही एक जीने की अकेली राह बची है, अवि!” उसका निर्णय था।

