गुलनार उस दिन बहुत खुश थी।
उसने आज फिर अपनी अंतर वीथी से नोट निकाले थे और मुझे दे दिए थे। मैंने कई पलों तक गुलनार की आंखों को पढ़ा था। उन में कोई उदासी नहीं थी लेकिन उल्लास था – न जाने कैसा उल्लास!
परिवार आज भोजपुर छोड़ कर अमरपुर जा रहा था। फिर गुलनार का वो उल्लास ..? तब भी मेरी समझ में कुछ नहीं आया था। हां नोटों का मेरी मुट्ठी में आना मेरे लिए किसी वरदान से कम न था। पव्वे की सुध में मैं भटक रहा था। प्यासा था और बनवारी से जा कर मैं सारे पैसे के पव्वे खरीद लाया था। और जब परिवार अमरपुर के लिए रवाना हुआ था तो मैंने पव्वे गाड़ी में लदे सामान के साथ छुपा दिए थे ओर गाड़ी में अदद एक आइटम की तरह मैं चिपक कर बैठ गया था।
बाकी पूरा परिवार गाड़ी में सामने बैठा था – साथ-साथ!
मैं अपने पव्वों के साथ बेहद खुश था। पता नहीं अगली दुकान कब तक चलनी थी और अमरपुर जाकर न जाने क्या होना जाना था। लेकिन मैं अपने पव्वों के साथ स्वस्थ था, व्यस्त था और मस्त था।
चंद्रप्रभा पूरे उफान पर थी। बरसात का मौसम था और चारों ओर जलोजथा ही दिखाई देता था। भीगे-भीगे मौसम में अगर पेट में पव्वा पड़ा हो तो आनंद ही और किस्म का आता है। बाहर की झूमती हरियाली का रंग भीतर भरने लगता है और आदमी का रोम-रोम आनंदित हो उठता है।
“चलो नाव में बैठो!” मुझे मंझले बेटे ने आदेश दिया था। “ये गाड़ी दूसरी नाव पर चढ़ेगी!” उसने बताया था।
मैं नाव के किनारे पर बैठा कभी-कभी चंद्रप्रभा के बहते जल में हाथ डाल कर आनंद ले लेता था। तभी बबलू मेरे पास आकर बैठ गया था। हमारे सामने दो बेटों के साथ गुलनार बैठी थी। नाव में खूब सवारियां भरी थीं। चहल-पहल थी। पानी पर तैरती नाव मुझे कागज की नाव जैसी लगी थी तो मैं तनिक डर गया था कि कहीं ..
“पव्वा! भीतर से आवाज आई थी तो मैंने अंटी में छुपा पव्वा निकाला था और बबलू की आंख बचा कर पेट में डाल लिया था।
अब मेरे लिए तो आसमान, जहान, नदी और मकान सब एक समान थे।
अब मेरी निगाहें गुलनार पर जा टिकी थीं। गुलनार के हुस्न का तो मैं कायल था ही। अचानक ही हमारे प्रेम संसार और प्रेमालाप हरे हो गए थे। दो प्रेमी युगल अब कूद-कूद कर चंद्रप्रभा में नहा रहे थे, गा रहे थे और कसमें खा रहे थे कि वो कभी बिछड़ेंगे नहीं। हम .. हम तो हमेशा हमेशा अमर रहेंगे और प्रेम गीत गाते रहेंगे – मैं गुलनार को बताता रहा था।
नाव पानी पर आहिस्ता-आहिस्ता रेंग रही थी। मल्लाह लंबे-लंबे डांट लिए नाव को खेने में व्यस्त थे। हर कोई दूसरे किनारे को देख रहा था लेकिन मेरी निगाहें न जाने क्यों मझ धार में जाकर ठहर गई थीं। बहता पानी मुझे अपना ही कोई एक सहोदर लगा था। लगा था जल से मेरा जन्म जन्मांतर का कोई नाता था। मेरा कुछ था जो पानी के पेट में जाकर बैठ गया था और मुझे अब उसे पानी से वसूल करना था।
“ये पव्वे की शरारत है!” मैंने स्वयं से कहा था और कई पलों तक मुसकुराता रहा था।
कारण – पास बैठा बबलू हालांकि मेरा बड़ा बेटा था और उसे मैंने जान से भी ज्यादा प्यार किया था। लेकिन हमारे बीच अब कुछ ऐसा न था जो जिंदा था। जैसे कि पव्वा पेट में जाते ही मुझसे भिड़ जाता था और मेरा हर हुक्म बजा लाता था। लेकिन बबलू ..?
और तभी बबलू ने मुझे पलट कर देखा था।
और तभी गुलनार भी मुसकुराई थी। मैं भी मुसकुराया था कि गुलनार ने आज बहुत दिनों के बाद मुझे एक तवज्जोह दी है। मेरी उम्मीद बंध गई थी कि गुलनार अमरपुर में मुझे एक मौका और देगी और फिर से पीतू की कचौड़ियां खा कर अमर पुर के लोग धन्य हो जाएंगे!
मैं अब हवा में ही कचौड़ियां बनाने लगा था।
लेकिन तभी बबलू ने मेरे दोनों पैर पकड़े थे। मैं तब तक कुछ समझ पाता तब तक उसने मुझे जोर से उठा लिया था। मैंने गुलनार को देखा था। वह हंस रही थी। और फिर अगले ही पल बबलू ने मुझे चंद्रप्रभा के अथाह जल में फेंक दिया था। यह मझ धार था – वही मझ धार जिसे मैंने रह-रह कर देखा था।
गड़प! मैं पानी में जा डूबा था और नाव चली जा रही थी – मुझे मझ धार में छोड़ कर। अब सामने शून्य था – ये जीने की कोई राह न थी!
मेजर कृपाल वर्मा

