लोगों की तलाशी में कुछ न मिला था। लेकिन हार तो चोरी हुआ था – यह आम प्रश्न था।
सामान की तलाशी आरंभ हुई थी। किसी के पास कोई खास माल असबाब तो था नहीं। वही कुछ पहनने के कपड़े और साबुन तेल, झोलों, पन्नियों और अलमारी-तिखालों में संजो कर रक्खा था। कहीं कोई ताला कूची था ही नहीं। जो सब था – सब के सामने था।
मंजू मुस्तैदी से काम में लगी थी। एक एक आइटम को उसकी टीम झाड़ झाड़ कर और कुरेद कुरेद कर देख रही थी। शक था कि हीरों का हार जरूर ही यहीं कहीं छुपा था। दर्शक बनी भीड़ भी एक कौतूहल से भरी थी। शायद हार मिल जाए, सभी सोच रहे थे।
“कोई क्यों चुराएगा हार?” गुलाबी वकालत करने में लगी थी। “हो सकता है झूठ बोला होगा सेठानी ने!” गुलाबी ने अपना दर्शन बघारा था। “वो तो किसी न किसी प्रकार से आश्रम को ही ले लेना चाहती थी लेकिन ..”
“चालू तो थी सेठानी!” सुरती कहने लगी थी। “उसके हिसाब से तो औरत को जबान खोलनी ही नहीं चाहिए! पहले ही औरत की पीठ पर सारा समाज लदा है। ऊपर से ..”
“लैक्चर देना आसान है सुरती!” लाली ने समर्थन किया था। “जिस तन लागे वो तन जाने!” लाली भीतर से भभक आई थी। “मुझे पूछो! मैंने सहा है जुलम! मेरी सास जैसा जल्लाद तो कभी पैदा ही नहीं हुआ। घर माल की मुख्तार थी। बेटा मुट्ठी में था। बस मैं ही थी – निठल्ली, बेकार, बेवकूफ और फूहड़!” आंखें भर आई थीं लाली की। “रोज पिटवाती थी – बेटे से ..”
“और तेरे घर वाल ..?” सुरती ने प्रश्न किया था।
“कोई नहीं बोला! मेरा ही दोष माना गया!”
“फिर ..?”
“फिर ..! फिर .. मैंने ..” हिलकियां बंध आई थीं लाली की।
उधर हवा में एक शोर उठ खड़ा हुआ था। मिल गया मिल गया .. हार मिल गया ..! मुन्नी थी जो एक हाथ में फटा टूटा झोला थामे और दूसरे हाथ में हीरों का हार पकड़े झूम रही थी – नाच रही थी।
अमरपुर आश्रम हर्षोल्लास से भर उठा था।
“कौन है चोर? किसका है ये झोला?” आम प्रश्न पैदा हुए थे।
हर आंख उस फटे टूटे झोले को देख रही थी। हर कोई उसे पहचानने का प्रयत्न कर रहा था। कोई नाम – एक नाम अब सामने आना था। किसी को बताना था कि वो झोला किसका था। पूछने पर मात्र मौन ही लौटा था – नाम नहीं।
“गुलनार का है!” मुन्नी ने ही घोषणा की थी। “मुझे पता है। मैं जानती हूँ। गुलनार का है ये झोला!”
“गुलनार! वही गुलनार – जो श्रावणी मां सजी थी, वही गुलनार जो दिव्य देवी के रूप में विराजमान थी और उसके चरणों की वंदना हो रही थी।” गुलाबी पूछ रही थी। “वंशी बाबू की चेली है!” गुलाबी ने सरेआम बात उछाल दी थी। “पूरे आश्रम की चाबियां इसी के पास रहती हैं। क्यों? आश्रम का मुफ्त का माल खा खा कर इसके गलुए लाल हो गए हैं। ये मरने मरने को थी .. लेकिन ..”
“सेठानी भी इनसे मिली हुई थी।” मंजू ने गुलाबी की बात बड़ी की थी।
अब एक चोर लुटेरों का महकमा सामने था। वंशी बाबू उन सबके सरगना थे। आश्रम की अस्मिता खतरे में थी। गुलनार एक बड़ी साजिश का नाम था।
“कमरे में बंद करो इसे!” गुलाबी ने आदेश दिए थे। “इसका खुलासा होगा! लेकिन उससे पहले और ..”
वंशी बाबू जा चुके थे। श्री राम शास्त्री को भी जंच गया था कि अब उन्हें भी आश्रम छोड़ कर चले जाना चाहिए! गुलाबी का क्या पता था – उन्हें भी कहीं धर लेती!
“मिल गया चोर – स्वामी जी!” शंकर ने सूचना दी थी। “वही है जिसको आपने जीवन दान दिया था – गुलनार!”
स्वामी जी गुलनार का नाम सुन कर सन्न रह गए थे।
अब वो जीना ही नहीं चाहते थे – अगले पल को तो जीने की राह क्या करती?
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

