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जीने की राह चौहत्तर

“हाजिरी माफी की एप्लीकेशन लगा रहा हूँ योर ऑनर!” अमरीश का वकील आग्रह कर रहा था। “ही इज सीरियसली इल!”

“झूठ बोल रहे हैं वकील साहब!” गाइनो का वकील गरजा था। “अमरपुर आश्रम में किस लिए गए!” उसका प्रश्न था।

“डॉक्टर ने जवाब दे दिया है योर ऑनर! असाध्य रोग है कोई। बाबा के पास हार झक मार कर गए हैं। किसी ने बताया था ..”

“दी बाबा आर स्टिल दी लास्ट विड?” हंसे थे जज साहब। “पढ़े लिखे हैं। उद्योगपति हैं। चाहें तो ..”

“फेथ की बात है योर ऑनर!” वकील साहब ने बड़ी ही विनम्रता से कहा था। “क्या पता कोई टोटका कब काम कर जाए!”

“एक हफ्ते बाद की तारीख ..”

“नहीं योर ऑनर! सात दिन के बाद तो बाबा ने बुलाया है! और फिर ऑन ह्यूमन ग्राऊंड्स प्लीज योर ऑनर ..”

“ठीक है। दो महीने की तारीख लगा देते हैं।” जज साहब मान गए थे।

गाइनो ने पूरे ड्रामे को बड़े गौर से देखा था। एक ओर अमरीश का असाध्य रोग उसे मिला वरदान लगा था तो दूसरी ओर वो सजग थी कि कहीं अमरीश कोई चाल न खेल दे। काम बन चुका था। अमरीश मैदान छोड़ कर भाग रहा था। और अगर ..! गाइनो ने चुपचाप अमरीश के मरने की दुआएं मांगी थीं।

“इट्स ब्लडी गुड! लेट हिम डाई!” गाइनो ने स्वयं को सुना कर संवाद बोला था। “आफ्टर अमरीश इज गॉन – अविकार हैज नो मीनिंग!” उसका अपना अनुमान था।

प्रेस को एक नई कहानी मिल गई थी।

“जो खोदेगा वही गिरेगा!” आम राय बन चुकी थी अमरीश के बारे में। “इतने अच्छे मित्र को मार डाला!” लोगों की शिकायत थी। “लालच बहुत बुरी बला है। आदमी अंधा हो जाता है। और तो और बेटे को भी गायब करा दिया! अब .. अब जब खुद मरेंगे तो ..?” अमरीश के साथ किसी की भी सिम्पैथी नहीं थी।

“गाइनो की एक आंख आप पर लगी है सर!” अमरीश का वकील बता रहा था। “मैं तो हैरान था कि बाबा के पास जाने तक की बात उसे पता है।”

“इट्स नो सीक्रेट नाओ, वकील साहब!” अमरीश बेहद ठंडी आवाज में बोल रहे थे। “मुझे तो अब अंजली की चिंता खाए जा रही है। मां बेटियां ..” अमरीश की आंखें छलक आई थीं।

“अगर किसी तरह से अविकार का पता चल जाए तो ही बात बन सकती है, सर!” वकील साहब अपनी अंतिम राय दे रहे थे। “लेकिन .. लेकिन इसे तो पता है! गाइनो सब जानती है। जब तक कंपनी को हड़प न लेगी तब तक तो ..” कुछ सोचने लगे थे वकील साहब। “और हो भी सकता है कि अविकार का इसने ..?”

“पता नहीं – ईश्वर को क्या मंजूर है!” अमरीश ने हाथ झाड़ दिए थे।

बड़ा ही इंटरेस्टिंग केस था अमरीश और गाइनो का!

“पापा!” अंजली रोने रोने को थी। उसके हाथ में अखबार लगा था। “आप ने अपनी बीमारी को मुझसे भी छुपाया ..?”

“क्या बताता तुम्हें बिट्टा!” अमरीश ने अंजली को बांहों में भर लिया था। “ये कौन सी ऐसी खुशखबरी थी जो तुम्हें बताता!”

“बाबा जी ने कहा है – सब ठीक हो जाएगा!” सरोज ने अंजली को समझाया था।

उद्योगपति अमरीश की गाड़ी पटरी से उतर गई थी – इसकी चर्चा हर कोई कर रहा था।

कौन कब चलते चलते रास्ता भटक जाए – किसी को पता नहीं होता!

जीने की राह सीधी नहीं है।

मेजर कृपाल वर्मा

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