शहर में पर्चे बंट रहे थे। पंद्रह तारीख सोमवार को अमरीश विला में कीर्तन का प्रोग्राम था।
अमरपुर आश्रम के कुमार गंधर्व संकीर्तन की शोभा बढ़ाएंगे – बड़ी सूचना थी।
सारे शहर में उल्लास और आनंद की लहरें हिलोरें ले रही थीं। भक्त लोग महा प्रसन्न थे। कुमार गंधर्व की गायकी जिन्होंने सुनी थी वो तो प्रशंसा के पुल बांध रहे थे। लेकिन कुछ वो भी थे जो इसे निरा ढोंग और ढकोसला बता कर इसके विरोध में खड़े थे।
“खबर है भाई! काशी से तीन पंडित आएंगे और हवन यज्ञ कराएंगे। अमरीश विला को शुद्ध करने के बाद ही संकीर्तन होगा!” पूरे शहर के पास सूचना थी।
“सब ढोंग है। बीमार है तो अस्पताल किस लिए खुले हैं? आज की मैडीकल साइंस के पास क्या नहीं है! ये मोढ़े तो पागल बनाते हैं आदमी को! खूब लूट मार मचा रक्खी है इन्होंने!” कुछ लोगों का मत था।
“करोड़ों में कमाते हैं ये ढोंगी बाबा। और लोग इतने पागल हैं कि ठठ के ठठ जमा हो जाते हैं। न जाने क्या जादू है!”
“सब को मुफ्त का माल चाहिए जी।” लोग हंसते और चले जाते। “पंद्रह तारीख सोमवार तो कोर्ट की तारीख भी है। कोई प्रपंच रचा जा रहा है शायद!”
लेकिन जगदीश एंड ऐसोसिएट्स को पूर्ण विश्वास था कि अमरीश अब बचेगा नहीं। गाइनो ग्रीन ने केस हर हालत में जीत लेना था और उसके बाद तो ..! गाइनो को तारीख बता कर तार भी भेज दिया गया था।
कुमार गंधर्व के कीर्तन का संदेश बिना तार के तार पर कुछ ऐसा गूंजा था कि लोगों में उल्लास की लहर दौड़ गई थी। हर किसी ने मन बना लिया था कि जरूर जाकर वो कुमार गंधर्व को सुनेंगे। युवा कुमार गंधर्व की गायकी का शोर था कि वो किस तरह नए अंदाज में कन्हैया की कथा कहते हैं – सुनाते हैं – एक चर्चा का विषय ही था।
प्रेस के कान भी खड़े हो गए थे।
साधू संतों के बारे में प्रेस भी एक मत न था।
कुछ ने बड़े ही अच्छे विचार व्यक्त किए थे और अमरपुर आश्रम की भूरी भूरी प्रशंसा की थी, तो कुछ का मानना था कि ये आश्रम भी खूब धन माल कमा रहा था।
स्वामी जी ने कुमार गंधर्व को कीर्तन के मुहूर्त के लिए मना लिया था।
शनिवार को अंजली को सपरिवार कीर्तन में शामिल होना था। रात को रुकने का वायदा था। फिर इतवार को भी वो लोग आश्रम में ही ठहरने वाले थे। सोमवार की सुबह उन्होंने प्रस्थान करना था। हवन यज्ञ का प्रोग्राम सुबह होना था और कीर्तन शाम को छह बजे से आरम्भ होकर चलते रहना था जब तक भक्त चाहें।
भजन कीर्तन के इस माहौल ने समाज में चलते दुराचार को रोक सा लिया था। अचानक ही लोगों को एहसास हुआ था कि रात दिन की मार काट के उस पार एक और भी जीने की राह थी जहां संतोष पूर्वक रहा जा सकता था। धर्म और धारणा की ओर ध्यान देना भी समाज का ही कर्तव्य था। जो अल्लम-खल्लम और अनैतिक चलन चल पड़ा था – वह कहीं से कुंठित था। आज की सफलता का प्रतीक केवल पैसा ही बन गया था। आचार विचार और नैतिक मूल्यों का कोई मतलब ही न रह गया था।
कीर्तन सुनने के लिए पूरे शहर के लोग उमड़ पड़ना चाहते थे। यहां तक कि महिलाओं की मांग पर उनके बैठने की व्यवस्था भी अलग से करानी पड़ी थी।
जगदीश एंड ऐसोसिएट्स के अब कान खड़े हो गए थे। क्या अमरीश को कोर्ट से किसी सिम्पैथी की आशा थी – वो अनुमान लगाने लगे थे।
लोग भी तरह तरह के कयास लगा रहे थे – अमरीश की बीमारी के बारे!
लेकिन सच और झूठ अब एक ही जीने की राह पर साथ साथ चल पड़े थे।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

