चंद्रप्रभा के पानी का तोड़ बहुत था। मैं फूल सा हल्का-फुल्का मझधार में बहता ही चला जा रहा था।
कभी मैं डूब जाता तो कभी ऊपर तैर आता। कभी दो चार घूंट पानी पी जाता तो कभी ऊपर आ कर सांस साध लेता। हाथ पैर मारता तो पानी के ऊपर तैरने लगता और हिम्मत हारने लगता तो डूबने लगता!
तब – उस दिन, उन पलों में मैंने पेट में पड़े पव्वे को साक्षात जन्म लेते देखा था। एक दुस्साहस की तरह वह जन्मा था और मेरी मदद के लिए आ पहुंचा था। मेरे शरीर में पव्वे ने गर्मी पैदा कर दी थी और अब मुझसे किनारे लग जाने को कह रहा था।
मैंने आंखें पसार कर देखा था। चंद्रप्रभा का फांट मीलों में फैला था। कहीं किनारा नजर ही न आ रहा था। और निराशा ने मुझे जब आ घेरा था तो पव्वा बोला था – किनारा होता है – और है भी! चलते रहो, दिख जाएगा किनारा। और फिर न जाने कब तक मैं चंद्र प्रभा के प्रचंड तोड़ के साथ-साथ बहता रहा था और फिर अचानक मुझे किनारा दिख गया था।
हरे कच्च पेड़ों की लाइन दिखी थी। पेड़ पानी में कमर तक डूबे थे। लेकिन उनकी हरी भरी फुनगियां आसमान से बतिया रही थीं। मुझे भी उन्होंने पुकारा था। पव्वे ने भी मेरा साथ दिया था और जब मैं उस हरे भरे उपवन में पहुंचा था तो मैं भी हरा हो गया था। पानी का तोड़ कम हो गया था। मैंने आसानी से पेड़ों की हरी फुनगियों को बाँहों में भरा था और पेड़ पर चढ़ गया था।
अब किनारा ज्यादा दूर न था। लेकिन मेरा दम चुक गया था। पव्वा भी ठंडा पड़ गया था। मैं फिर से निरुत्साहित हो गया था। शरीर नीला पड़ गया था और पेट में नाक तक पानी भर गया था। मेरी सांस भी मुश्किल से आ जा रही थी और मेरा मन कह रहा था कि मैं वहीं डूब मरूं!
“दो कदम पर ही तो किनारा है पीतू!” कोई कह रहा था। “आगे तो जन्नत है! तुम्हारे इंतजार में तुम्हारा सौभाग्य आगे खड़ा है। चलकर मिल तो लो उससे!”
मर-मर कर मैंने किनारा गहा था।
किनारे पर आते ही मुझे उलटियां हुई थीं। पेट का पानी परनाले की तरह बाहर आ कर बहा था। मुझे सुकून मिला था। मेरी सांस भी सीधी हो गई थी। अब मैं सीधा जमीन पर लेट गया था। सूरज की किरणें शरीर में गर्मी भरने लगी थीं। मैंने जब पेट से पानी खाली किया था तो मुझे बेहद आराम मिला था। चेतना लौटने लगी थी। जीने की उम्मीद मेरे पास आ कर खड़ी हो गई थी। मैं भी उठ कर बैठ गया था। कई पलों तक बैठा-बैठा अपने आसपास को देखता रहा था।
तनिक दूर – एक छोटे फासले पर मुझे एक पीपल का पेड़ दिखाई दिया था।
“पीपल देवता तुम्हें बुला रहे हैं, पीतू!” किसी ने फिर कहा था। “उठो, उनकी शरण में पहुंच जाओ।”
अब सूरज अस्ताचल को जा रहा था। शाम घिरने को थी। रात – अंधेरी रात ने अब आ घेरा था। मैंने भी पीपल देवता तक पहुंचने का इरादा बना लिया था। निष्प्राण शरीर को आहिस्ता-आहिस्ता खींचता मैं पीपल देवता के पास आ रहा था। कदम दर कदम फासले को तय करता मैं न जाने क्यों जीने की आस से भरने लगा था।
बड़ा सुकून मिला था मुझे जब मैं पीपल देवता की शरण में पहुंच गया था। पीपल के मोटे तने से कमर टिकाए मैं निष्प्राण हुआ आंखें बंद करके निढाल पड़ा रहा था – न जाने कब तक।
लेकिन जब मेरी आंख खुली थी तो भोर का प्रथम प्रहर आ पहुंचा था। प्राची में उजास फूटा था तो अंधेरा छट गया था। चिड़िया चहक रही थीं तो कहीं मुर्गा बांग दे रहा था। एक शीतल पवन बह निकली थी। मुझे यह बहती हवा बड़ी ही प्राण दायी लगी थी। शरीर में स्वयं ही एक स्फूर्ति भरने लगी थी। मेरा मन उल्लसित था कि मैं अब तक ..
“प्रणाम स्वामी जी!” तब मुझे किसी ने स्वामी जी कह कर पुकारा था और प्रणाम भी किया था।
यह एक नया आश्चर्य था। एक बड़ा ही सुखद आश्चर्य था। एक बड़ी ही विचित्र घटना थी जो मेरे मानस पटल पर अंकित हो गई थी और मेरा अंतर-बाहर सब संभलने लगा था। मैंने बड़े गौर से उस व्यक्ति को देखा था। उसकी न तो आवाज में छल था और न ही आंखों में खोट था। मुझे अपनी मंजिल के कई मुकाम याद थे लेकिन ये आदमी कोई अलग ही देव दूत था।
“ये कंबल ले लीजिए!” उसने अपना कंबल मुझे दे दिया था। “आराम मिलेगा आपको!” उसने कहा था और चला गया था।
और बो कंबल जैसे मेरा जीने का नया संबल था और एक नया संकेत था जिसे मैंने भी सहर्ष स्वीकार लिया था – जीने की नई राह की तरह!
मेजर कृपाल वर्मा

