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Bhukh

parchaiyanभूख 

हम दुश्मन के देश में थे . कारण- हमें हमला करना था. हमें दुश्मन के नापाक इरादों को नाकाम करना था. उसे भूख थी …कि वो हमें तबाहो-बर्बाद कर दे…हमारी ज़मीन हड़प ले …हमारी सीमा में घुस कर हम पर जुर्म ढाए  ….हमें गुलाम बनाए ….और …..

सत्ता की भूख थी – उसे ! साम्राज्य बनाने -बढाने की भूख थी उसे ! उसे भूख थी …..और अब वह हमारा सब कुछ लील जाना चाहता था !

हमें उस पर हमला करना था.

रात के ठीक बारह बजे हमला होना था. अब आप वक्त की उलटी गिनती गिनना आरम्भ करें . हमारे सारे सैनिकों को …दुश्मन के इतने करीब पहुँचाना था कि …बस …झपटें …और उसे गर्दन से पकड़ लें ! हमारे तोप खाने को समय से पूर्व अपने सारे टारगेट रजिस्टर कर लेने थे. हमारे हवाई जहाज़ों को खबर थी – कि हम आज रात बारह बजे हमला करेंगे ! हम हर तरह की तैयारीओं में जुटे थे. यहाँ तक कि …सैनिकों का खाना-पीना …हथियार -अमुनिशन …सब वक्त से पहले ही हो जाना था.

सब हो रहा था. बड़ी ही चतुराई से सब चल रहा था. गुप्त था – सब. दुश्मन को हमारी कानों-कान खबर नहीं थी. हम उस की नज़र से नदारद थे. हम गुप-चुप की तैयारीओं में व्यस्त थे.

“मेस से खाना वक्त से आना है, पार्टनर !” मैंने कैप्टिन ओम  को आदेश दिया था. “मैं  नहीं चाहता कि …दुश्मन ताड़ ले …और ….!”

“अवस्थी को भेज दिया है, सर !” उत्तर था – ओम का.

सब तैयार था. हम हर तरह से तैयार थे.

“सर, एक-एक ….ड्रिंक …हो …जाए ….? खाने से पहले – मेरा मतलब ….कि …?” सारे ऑफिसरों की मुराद थी.

कैसे मोड़ता – इस मांगी – मुराद को , मैं ….जब कि हम दुश्मन पर हमला करने जा रहे थे….? आप भी जानते हैं कि …हमले का अर्थ …मरना-मारना है ….जान लेना …जान देना है ….! बहुत भीषण काम है ! दुष्कर्म-सा कुछ है …!! इसे देश-भक्त सैनिक अपनी पूरी सामर्थ लगा कर अंजाम देते हैं !!!

मैंने उन की मुराद को मंजूरी देदी थी !

अब सब ठीक था. सब के हौंसले बुलंद थे. सब मूड में थे. सब तैयार थे.

“खाना ….!”  आदेश हुआ था. “खाना लगाओ, अवस्थी !”” ओम का आदेश था.

बहुत देर हुई लेकिन खाना नहीं लगा ! सामने टेबल थी. उस पर सफ़ेद कपड़ा बिछा था. छुरी-कांटे सब धरे थे. लेकिन खाना नहीं था. एक चुप्पी थी – भिन्न प्रकार की चुप्पी !

“क्या हुआ , अवस्थी ….?” मैंने सीधा प्रश्न किया था. “खाना क्यों नहीं लगाते , भाई …?”

और फिर वही – चुप्पी !

“सर, खाना नहीं आया …! खाली हॉट केस …जीप में धर दिए  …और ….”

भूख लगी थी – पर खाना नहीं था ….! क्या करें …., प्रश्न था !

कहकहे लगा रहे थे – हम ….अवस्थी की …की मूर्खता का जश्न मन रहे थे – हम …और अब हमले में जा रहे थे – हम !!

मित्रो , फतह हमारी हुई थी ! भूख को तो हम भूल ही गए थे …!!

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