
जिस की लाठी उसी की भैंस !!
महान पुरूषों के पूर्वापर की चर्चा !
उपन्यास अंश :-
"मानव कल्याण के लिए काम करोगे …?" मुझे पूछा गया था .
बहुत गहरा प्रश्न था – यह !!
मानव कल्याण के लिए काम करना – एक श्रेष्ठ कर्म था- मैं जानता था ! लेकिन 'कर्म' की परिभाषा क्या होगी , मैं नहीं जानता था . उस कर्म के तहत मुझे और कितने कर्म करने होंगे , विदित नहीं था . मानव कल्याण का मंत्र भी अभी तक मेरी समझ में न समाया था . अभी तक तो मैं उस आश्रम की भव्यता और दिव्यता के दर्शन कर आत्म-विभोर ही बना हुआ था !
"स्वामी विवेकानंद एक परब्राज्य थे . उन्होंने सर्व प्रथम भारत भ्रमण किया था . वो निकले थे और जन-मानस के बीच जा कर खो गए थे . उन्होंने जन-मानस के दुखों को छुआ था ….उन्हें समझा था ….पहचाना था . उन्हें ज्ञात हुआ था कि …जन-मानस एक गहरे अंध-कूप में जाकर औंधा आ पड़ा था ! न उसे खाने की सुध थी …न पीने की . न उसे कोई समझ थी ….न उस का कोई सोच था ! उस का अपना तो हुछ था ही नहीं !"
"अब भी कौन सा सुधार हो गया है ….?" मैंने भवक कर प्रश्न किया था . आज भी बदला क्या है …? मैं वाद नगर से भागा क्यों हूँ …?"
"भारत भ्रमण पर हो ! देखो ….समझो ….सोचो …! पूछो प्रश्न . नरेन्द्र दत्त की तरह तुम भी पूछो कि …भगवान रहता कहाँ है ….?"
"किसी झोंपड़ी में पड़ा होगा …!" मैंने उत्तर दिया था . "महलों में तो महान लोग रहते हैं ! सत्ता में बने लोग स्वयं से आगे कुछ सोचते कहाँ हैं …? भगवान् उन के लिए तो कूड़ा है…कचरा है ! कौनसा वेदान्त जानते हैं …वो …? कौनसा जन-कल्याण याद आता है , उन्हें ? अरे, जिस की लाठी – उसी की भैंस !"
न जाने कहाँ से एक चूक खट्टा स्वाद मेरी जुवान पर आ बैठा था …?
"वो लोग कहाँ हैं …जिन की तलाश में …मैं आया था …?" मैं अब स्वयं से प्रश्न पूछ रहा था . "कहाँ रहते होंगे …रास बिहारी बोस …सुभाश चन्द्र बोस ….खुदी राम …और कहाँ है अनुशीलन …और जुगांतर का ऑफिस …….?" मेरी जिज्ञासा अब नए सबूत मांगने लगी थी . "उन को में कहाँ ढूँढूं ….कैसे ढूँढूं …?" मैं सोच में पड गया था .
"हम यहाँ वेदांत की शिक्षा -दीक्षा देते हैं ." मुनि ज्ञानेश्वर मुझे बता रहे थे . "एक बार तुम्हारी समझ में जिन्दगी जीने का समीकरण आ जाए …तब और सब समझना आसान होगा !" उन का सुझाव था . "आदमी को अपने लिए नहीं ….औरों के लिए जीना चाहिए !" वो हँसे थे . "इस जीने का आनंद ही अलग है , बेटे ! निरानंद इस जीवन को जीने का जो आनंद …आता है …वह किसी भी अन्य ऐश्वर्य से आगे है ! इसे ख़रीदा नहीं जा सकता है …इसे तो प्राप्त करना होता है !" उन्होंने मेरी आँखों में देखा था . "अगर तुम चाहो तो ….तुम भी विवेकानंद की तरह ही …..?"
मैं चुप था . अभी तक मैंने स्वामी जी का चोंगा ओढ कर अलख जगाने के बारे सोचा ही न था ! अभी तक तो मैं स्वामी जी से पूर्ण साक्षात्कार भी न कर पाया था . अभी तक मेरे जहन में तो गहरे शक कुंडली मारे बैठे थे !
"स्वामी जी …क्या कर पाए ….?" मैंने मुड कर प्रहार किया था .
"उन्हें जीवन ही कितना मिला …? जब वो सक्षम हुए तो …."
"लेकिन …."
'लेकिन क्या , वत्स ! कुल ३९ वर्ष की आयु में ही उन का देहांत हो गया था ! वह स्वयं स्वीकार कर गए हैं ….कि मैं …अभागा रहा ! मैं तो चाहता था कि …अपने जैसे ही १००० परब्राज्य पैदा करू …और तब जंग का ऐलान करू ….!"
"कौनसी …जंग …?" मैंने पूछा था .
लेकिन मेरे प्रश्न का उत्तर ज्ञानेश्वर महाराज की आँखों में उग आए आंसूओं ने दिया था . स्वामी विवेकानंद की अकाल म्रत्यु का सदमा उन्हें सताने लगा था ! मैं भी अब ग़मगीन था . मैं भी अब रोना चाहता था . मैं भी चाहता था …कि …
"अधूरा रह गया , उन का मिशन, नरेन्द्र !" संत ज्ञानेश्वर टीस आये थे . "तुम …उन के सामान …उन के बराबर …उन्ही का नाम लेकर …इस आश्रम में …उन्हीं की तरह …अचानक आए हो ! न जाने क्यों मेरा मन तुम से आग्रह करना चाहता है …कि …तुम …."
"मैं भी चाहता तो हूँ ….पर …" मेरे होंठ बंद थे ….मैं चुप था !
स्वामी विवेकानंद एक संभ्रांत परिवार में पैदा हुए थे . उन के पिता कलकत्ता के जाने-माने अटोर्नी थे . उन की माँ – भुवनेश्वरी विदुषी थीं . उन्होंने शिक्षा क्रिश्चियन कालेज में प्राप्त की थी . वो ग्रेजूएट थे . वो …..
"कौनसी गिनती गिन रहे हो , नरेन्द्र ….?"
"यही कि …मैं …उन के समकक्ष नहीं हूँ ….!"
"क्यों …?"
"क्यों कि …..मैं किन्हीं और ही आदमियों की तलाश में कलकत्ता आया था …! मैं इस लिए आया था कि …."
"व्यापारी हो ….?"
"नहीं ! हूँ तो मैं सदाचारी …पर …."
"चलो, सोच लो …." वह चले गए थे .
मेरी तब जान में जान लौटी थी . मैंने एक लंबी उसांस को अपने भीतर भरा था . लगा था – मैं एक खतरे से टकरा कर बाल-बाल बचा हूँ . लगा था – मेरी टक्कर अभी-अभी जो वेदांत के साथ हुई थी ….उस में …मैं परस्त नहीं हुआ हूँ !
मैं बिन भीगा …गंगा के किनारे खड़ा …खड़ा उस के पवित्र नीर को निगाहें भर-भर कर देखता रहा था अनंतर …!!
…………………
श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!
