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बचपन की शुरुआत हमारे साथ–1

कानू

सुबह-सुबह टोकरी में से शोर मचाने कीआवाज़, मेरे सिरहाने के नीचे ही रखी थी टोकरी…आवाज़ मेरे कानों में गई, बस फिर क्या था फटाक से टोकरी खोलकर देखी बस, मुँह से निकल गया”अले नोनू आना ताते हो बहार आ ताओ तलो”उठाया प्यार से और आपने होठों से लगा लिया, बड़ा प्यारा सा स्नेह भरा सपर्श था,ताज़ा हो गया था मन सुबह-सुबह।

कमरे के बाहर लाकर छत्त पर छोड़ दिया था, फिर क्या था खेल कूद और दौड भाग शुरू कानू जी की। अरे!भाई भागती तो इतना तेज़ थी कि पकड़ना मुश्किल हो जाता था।छत्त काफ़ी बडी है, पर उस वक़्त सत्तर पिचहत्तर गमले रखे थे छत्त पर, इस गमले के बीच से निकल उस गमले के बीच से निकल नाक में दम कर दिया था,पकड में ही नही आती थी,दूर से खड़े होकर देखते थे,तो ऐसा लगता था मानो छोटा सा खरगोश जिगजैग पैटर्न में छत्त पर भाग रहा हो। अभी तो भोंकना सीखी ही नहीं थी पर चंट दिमाग़ की थी। हा-हा-हा अपने साथ रजाई में लिटा लिया तो चिमटी काटना शुरु।शैतानियों से तंग आकर इन्हे सिर्फ खेलने कूदने के लिये बाहर निकालते थे,और फिर वापस टोकरी के अंदर बन्द कर देते थे-जैसा कि मैने पहले भी लिखा है, कि टोकरी तो कानू-मानू की पसंदीदा बेडरूम बन गई थी,अपने बिस्तर पर तो धब्बा भी नही लगने देती थी,दूसरों के बिस्तर को बेशक गंदा कर दो।

हाँ, जैसा कि डॉक्टर द्वारा इंस्ट्रक्शन दी गईं थीं…. खाने में हमने ड्रूल्स डाले ,पर मुँह से भी नहीं लगाया,खाने पीने में क़ानू रानी का चटोरा नेचर निकला।खैर!हमने छोटे-छोटे टुकड़े कर कर सब्ज़ी से खिलाया तो बस मज़ा ही आ गया।फिर कानू हैप्पी हो गई थोड़ी देर नीनी औऱ फिर शैतानी, यही रूटीन बन गया था।

छोटे-छोटे स्टफ टॉयज़ रखे थे मैने सोफ़े पर, कानू को बहुत पसन्द आ गए, सबसे ज़्यादा जो उन टॉयज में से उसका favorite बना,वो था, छोटा सा टाइगर जिसे वो हमेशा अपने पास रखती थी, उस छोटे से टाइगर को मुँह में दबाकर छत्त पर ले जाती, और गोल-मोल लुढ़ककर खूब खेलती, उसके साथ बहुत प्यारा मन भावन करने वाला दृश्य होता था वो सच! एक पल के लिए सब कुछ भूलकर जीवन की इतनी प्यारी मासूम सच्चाई में खो जाते हैं,नन्ही-नन्ही प्यारी सी आँखे और उनमें छुपा वो भोलापन इस क़दर आकर्षित कर लेता है, कि कुछ पल के लिए हमारा जीवन उन्हीं गतिविधियों में समावेश हो जाता है।

बाथरूम से मग्गा खींच कर लाना और प्लास्टिक की खाली बोतलों से tak-tak कर पूरे दिन खेलना ,इससे वाकई पूरे घर में रौनक और नयापन आ गया था। दिन रोज़ धीरे-धीरे बडी होने लगी हमारे साथ हमारी कानू।

हर दिन एक नई पहचान से वाकिफ़ होने लगी थी मैं।घर के सारे सदस्यों को एक-एक करके पहचानने की कोशिश कर रही थी–बहुत समझदारी होती है इनमें बचपन से ही, मैं सोचा करती थी कि अरे!जानवर होते हैं, ये क्या जाने, पर नहीं, यकीन मानिए मेरी कानू ने हर एक सदस्य को उसकी अपनी जगह से परिचत करवाया—पतिदेव को पिता का स्थान अपने आप ही दे दिया,उनसे डरना और उनके आते ही गोलू -मोलू अपनी पूँछ हिलाकर उनका स्वागत करना, और हाँ, पापा के आते ही डिसिप्लिन में सारी शैतानियां बंद करके एक जगह बैठ जाना—–है न हैरानी की बात!एक महिने के नन्हे से फ़रिश्ते ने मेरे पतिदेव को पिता का स्थान दे दिया—-लोग कहते हैं, अरे!जानवर है इसको क्या पता..पर नहीं इंसान से ज़्यादा समझदार और रिश्तों की बारिकीयिओं को समझने वाले होते हैं ये

खेर!मेरे सुपुत्र को भाई का स्थान -बड़े भाईसाहब से किस अदब से पेश आना चाहिए ये कानू से कोई सीखे। सबसे सुंदर प्यार भरा और शैतानी भरा रिश्ता कानू ने मेरी सुपुत्री गार्गी से बनाया—-दीदी के साथ पूरी शरारतें करना और प्यार निभाना, दीदी को कुछ भी न समझना, और उसके ईधर उधर न होने पर दीदी को ढूढ़ना कहाँ गई होगी और सोचना कि अरे!”अब मेरे कान और नाक  छेड़कर मुझे तंग कौन करेगा”।

क़ानू की प्यारी दीदी क़ानू की हर शैतानी में बराबर की भागीदार थी,जैसे दोनों एक ही हों…कानू भी खुश चलो कोई मेरे जैसा तो है, और गार्गी भी खुश चलो घर में प्यारा खिलोना आ गया वरना मन नहीं लगता था। सबसे अहम औधा मुझे दिया मेरी प्यारी बेटी ने—-मेरी छाती और गले से लगकर मुझे दुनिया का सबसे ऊँचा पद दिया,वो था —-माँ का-माँ, जिसके आगे औऱ किसी शब्द की कोई कीमत नहीं है,इस नन्ही सी एक महीने की बच्ची के मुहँ से निकल था,हालाँकि अभी आवाज़ निकालना नही सीखी थी,पर नन्ही आँखे मुझे देखते ही पुकारा करती थी, “माँ आ गई तू”और मैं कानू पर अपनी सारी ममता उड़ेल दिया करती थी,अपनी गोद में लेकर—-ईश्वर की तरफ आसमान की और देखकर यही निकलता था”हे!इश्वर, यह कैसा अनमोल तोहफ़ा मेरी गोद में रख दिया आपने,है तो जानवर पर इतना गहरा संबंध एक ही दिन में बन गया, ऐसा लगता है,पिछले कई जन्मों का रिश्ता है इस बच्ची के साथ।”लोग पूछने लगे थे,अरे! नयी कुत्ती पाली है ,आपने—-तुरन्त मुँह से निकलता—-नहीं-नहीं कुत्ती नहीं,बस ऐसे ही बेटी है मेरी, सामने वाले इंसान को हँसी आनी स्वाभाविक थी—-पर नहीं क़ानू के घर आने से मेरा पुनर्जन्म और अधूरे रिश्तों ,दो आत्माओं और संस्कारों पर विश्वास दोबारा कायम हो गया था,जो इस बार अटूट था।

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