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अनजानी चाहत

” Hello! सर हैं..!”।

” नहीं मैडम.. सर तो नहीं आए आज!’।

” अच्छा! चलो.. ठीक है! मैं कब तक कॉल करूँ!”।

” आप शाम तक देख लिजिये!’।

” क्यों नहीं आए.. ऑफ़िस.. बोला था.. बारह बजे तक कॉल करके देख लेना… मेरा लैंडलाइन नंबर चेंज हो गया है.. तुम्हें बता दूँगा! चलो! कोई बात नहीं कल फ़ोन करके देखूँगी!”।

कल..

” Hello! सर हैं..!”।

” नहीं मैडम सर का तो ट्रांसफ़र हो गया है.. इस ऑफिस से.. अब दूसरे डिपार्टमेंट में चले गए हैं.. पर आप कौन अगर सर अपना सामान लेने आए.. तो मैं आपका क्या बोलूँ!”।

” हम्म..! कुछ नहीं तुम बस! इसी नम्बर पर मुझे कॉल कर देना.. मैं बात कर लूँगी!”

” फ़िर भी मैडम आप अपना नाम बता देते तो ठीक रहता.. मुझे सर को बताने में!”।

दो मिनट रुककर और थोड़ा सोचने के बाद..

” सरिता! सर से बस तुम इतना कह देना.. कि सरिता मैडम का फ़ोन था.. वो समझ जाएंगे!”।

” ठीक है.. मैडम बता दूँगी! और सर आने पर आपको कॉल भी कर दूँगी!”।

सरिता.. एक भ्याता स्त्री.. पर एक अनजान इंसान से यूँहीं दोस्ती कर बैठी थी.. और बातों-बातों में और इस दोस्ती में कहीं ये इंसान सरिता के मन को भी भा गया था.. गलत कुछ नहीं था.. बस! यूँहीं..! हो जाता है.. कई बार!  ज़िंदगी के एक पन्ने में हमारी कोई अनकही छुपी हुई सी.. वो दास्ताँ लिख जाती है.. जिसे केवल हम ही जानते हैं.. और दिल के किसी कोने में महसूस करते हैं। ज़माने के शोर-शराबे से अलग एक ऐसी दास्ताँ जो पल भर के लिए चेहरे पर बिंदास मुस्कान और पल भर का सुकून ला देती है..

खैर! सरिता से रुका न गया बार-बार फ़ोन लगाने पर भी जब आफिस के नंबर पर बात नहीं हो पाई तो मोबाइल पर ही फ़ोन लगा डाला.. हालाँकि वादा तो आफिस के नंबर पर ही बात करने का था.. पर..

” Hello!”

” अरे! हाँ! तुम! “।

” मैं आपके लैंडलाइन नंबर पर आफिस में try कर रही थी.. पर आप आए ही नहीं थे!”।

” अरे! तुम्हें बताया तो था.. मेरा डिपार्टमेंट चेंज हो गया है.. नंबर अभी allot नहीं हुआ! खैर! और सुनाओ! कैसी हो.!”

” मैं बिल्कुल ठीक! आप सुनाएं..!”।

” अरे! एकदम बढ़िया भई! अच्छा.. सुनो! जब तक नया नंबर allot नहीं होता.. तुम मोबाइल पर ही ऑफिस टाइम में बात कर लिया करो!”।

” Ok”

फोन पर बातचीत के बाद और दौरान चेहरे पर प्यारी सी मुस्कुराहट थी.. चेहरा गुलाब से खिल गया था.. मानो दुनिया सबसे बड़ी ख़ुशी और अनमोल खज़ाना मिल गया हो!

कई बार यूँ भी देखा है

ये जो मन की सीमा रेखा है

मन तोड़ने लगता है

अनजानी आस के पीछे

अनजानी प्यास के पीछे

मन दौड़ने लगता है..!

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