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कुछ पढ़ते हैं

चलो कुछ पढते हैं
चलो कुछ लिखते हैं
नर हो तुम निराशा छोड़ो
गिरते उठते चलते दौड़ो
चेतन अरु अवचेतन मन का
अावाहन यह अरुणोदय का
कल गिर जाने वाली कलियां
खिलकर कहती खुलकर झूमों
फूलों पर गुनगुन करते भँवरे,
कहते तुम भी जीवनरस चूमों
~कुमार गौरव

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