भादों बदी सोलह सप्तमी, मतलब कि सोलह फरवरी को होने वाले महा महोत्सव की मंत्रणा मग्गू के ऑफिस में चल रही थीं।
“कुल पंद्रह दिन शेष हैं।” मग्गू ने चेतावनी दी थी। “जबकि काम सारा पड़ा है।” उसने सामने बैठे स्वामी घनानंद को गौर से देखा था। “महा महोत्सव का भार आपके कंधों पर है स्वामी जी।” मग्गू ने ऐलान किया था। “आप अभी से अपने प्रवचनों में सनातन का संकल्प का जिक्र करना आरंभ कर दें और लोगों को बता दें कि सनातन के लिए किए संकल्प का उद्देश्य है – भ्रष्टाचार की आंधी का अंत।” मग्गू तनिक मुसकुराया था।
“यही आज के समय की मांग है स्वामी जी।” उसने अपनी पूरी टीम को अंखिया कर देखा था।
पूरी टीम महा महोत्सव के उद्देश्य के प्रति कृत संकल्प लगी थी।
“और कल्लू भाई आप …?” मग्गू ने बात मोड़ी थी।
“मुझे प्रेस और पत्रकारों को संभालना है।” कल्लू ने अपना दायित्व कह सुनाया था। “मेरी पूरी तैयारी है।” कल्लू मुसकुराया था। “प्रतीक व्यास से मेरी बात तय हो चुकी है।” कल्लू ने सूचना दी थी। “ऐसा समा बांधेगा प्रतीक कि आपका नाम और काम लोगों के दिल दिमाग पर छा जाएगा।”
“गुड।” मग्गू मुसकुराया था। “तुम से तो मुझे उम्मीद है कल्लू।” उसने कल्लू की प्रशंसा की थी। मग्गू ने मुड़ कर पंडित अवध नारायण को देखा था।
“पंडित जी आप …?” मग्गू का प्रश्न आया था।
“मेरा भी पूरा सर अंजाम तैयार है श्रीमान।” पंडित अवध नारायण ने आश्वासन दिया था। “केवल और केवल स्वामी अनेकानंद और स्वामी घनानंद के वस्त्र आभूषण तैयार होने हैं। उसके लिए …?”
“कदम के भाई को बुला कर आदेश कर दो।” कल्लू ने बीच में राय दी थी। “वो बड़ा एक्सपर्ट है। स्वामी जी के वस्त्र वही बनाता है।”
“और काशी से चार विद्वान भी आएंगे श्रीमान। उनका …?”
“कल्लू।” मग्गू ने कल्लू को देखा था। “होटल के ऊपर की मंजिल का आधा भाग तुम ले लो।” उसने बताया था। “विदेशी मेहमान और विद्वान लोगों के लिए यही उपयुक्त रहेगा।”
“मैं सब संभाल लूंगा।” कल्लू ने बात मान ली थी।
मग्गू को जैसे कुछ भूला बिसरा याद हो आया था।
“अरे हां। स्वामी राज हंस को आगंतुकों के स्वागत से ले कर विदाई तक का जिम्मा सोंप दो।” मग्गू ने घनानंद की ओर इशारा किया था। “चाय नाश्ता से लेकर प्रसाद वितरण तक का काम वो संभालेंगे। और वो सी एम साहब को उपहार भी भेंट करेंगे।”
स्वामी घनानंद ने स्वीकार में सर हिलाया था।
“कितने निमंत्रण पत्र छपेंगे ये भी हमें तय करना होगा।” मग्गू अंतिम मुद्दे पर उतर आया था। “ये काम भी कल्लू आप करेंगे।” मग्गू ने सीधा कल्लू का नाम लिया था और किन-किन को घर जा कर निमंत्रण पत्र देने हैं और किन-किन को डाक द्वारा भेजने हैं, यह भी पहले से तय होगा।” कल्लू ने यह जिम्मा भी ओट लिया था।
सोलह फरवरी को होने वाले महा महोत्सव का फूंका शंख नाद सर्वत्र सुनाई दिया था। राम लाल ने भी सब सुना था। सब गुना था। हर पल का हिसाब लगाया था। और हर आने वाले श्रद्धालु से क्या लेना देना था – पूरा जोड़ तोड़ दिमाग में बिठा लिया था।
राम लाल खुश था कि उसे किसी भी अवसर पर स्वामी अनेकानंद के सामने न आना था।
“आंख ओझल पहाड़ ओझल।” राम लाल ने मन में दोहराया था।
राम लाल खुश था। राम लाल हंस रहा था।
“प्यारे देश वासियों।” स्वामी घनानंद चौक महानद पर खड़े हो कर स्टेज पर दहाड़ रहे थे। “महान महोत्सव का उद्देश्य है – सनातन का संकल्प।” उन्होंने अपनी धारदार आवाज में सर्वथा नया और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था। “और सनातन का संकल्प है मित्रों – देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करना।” उन्होंने अपनी दाहिनी उंगली को आकाश की ओर तान दिया था। तालियां बजने लगी थीं। स्वामी घनानंद अमर रहें के नारे गूंजे थे।
“मेरे विचार से ये भ्रष्टाचार का कोढ़ हमारे समाज के हमारे नैतिक मूल्यों में जब परिवर्तन होगा, तभी नष्ट होगा। इसे कोई कानून नहीं हटा सकता। इसे पुलिस नहीं हटा सकती। और इसे कोई सरकार भी नहीं हटा सकती। इसे तो मैंने और आपने भगाना होगा।” स्वामी घनानंद ने उपचार बताया था। “जब तक हम सब इस भ्रष्टाचार से दो-दो हाथ नहीं करेंगे, ये नहीं हारेगा।”
सत्य वचन। साधुवाद। स्वामी घनानंद अमर रहें। पब्लिक की जबरदस्त प्रतिक्रिया सामने आई थी।
कल्लू ने प्रतीक व्यास को बुला कर स्वामी घनानंद के प्रवचन पत्रकारों को उसी तरह का संदेश प्रसारित करने को कहा था। उसने प्रेस को भी सचेत किया था कि वो अब अपनी तलवार भ्रष्टाचार पर चलाएं। और लोगों को अवगत कराएं कि इस जंग में उनकी भी भागीदारी अपेक्षित है।
मग्गू के पास लिस्ट बनकर आ गई थी। जिनको घर जा कर निमंत्रण पत्र देने थे, उनकी अलग लिस्ट थी। और जिन्हें बाई पोस्ट निमंत्रण पत्र भेजने थे उनकी लिस्ट अलग थी।
“सर्व प्रथम सी एम को उनके घर जा कर निमंत्रण पत्र देने का काम करना है, कल्लू भाई।” मग्गू ने बड़े उत्साह के साथ कल्लू को सूचना दी थी। “बोलो कब चलें?” उसने पूछा था।
“शुभस्य शीघ्रम। कल ही चलते हैं भाई।” कल्लू का उत्तर था।
माधव मोची के सी एम निवास पर जा कर निमंत्रण पत्र देने की खबर प्रेस ने पूरे शहर में फैला दी थी।
कदम का भाई जब स्वामी अनेकानंद के वस्त्र आभूषण तैयार करने के तहत नाप लेने आया था तब उन्हें ज्ञात हुआ था कि मामला क्या था। उन्हें सहसा एहसास हुआ था कि अगर सी एम आ रहे हैं तो फिर तो उन्हें दर्शन देने ही होंगे। और शायद कुछ और भी …? उन्हें याद थी कि कल्लू ने उन्हें आने से पहले ही बता दिया था कि क्या कुछ कहलवाना होगा …
स्वामी राज हंस काम में नाक तक डूबे थे। उनका काम बड़ा था। जिम्मेदारी बहुत थी। और वो भी सिद्ध करना चाहते थे कि वो कितने कार्य कुशल थे। उनका मुकाबला अब स्वामी अनेकानंद से था। इस बात का संकेत उन्हें राम लाल से मिलता रहता था।
विलोचन शास्त्री के यहां जब निमंत्रण पत्र बाई पोस्ट पहुंचा था तो उन्हें अच्छा न लगा था। सपरिवार आने को लिखा था। लेकिन पार्टी के लिए कोई संकेत न था। बबलू ने जब निमंत्रण पत्र पढ़ा था तो मजमून को भांप लिया था। माधव मोची का सीधा संकेत था कि आगामी चुनाव में भी विलोचन शास्त्री की शिकस्त होगी।
बबलू और पल्लवी सकते में आ गए थे। उन्हें अपनी नइया डूबती दिखाई दी थी।
राम लाल का मनोबल बहुत ऊंचा था। उसके रजिस्टर में बड़े-बड़े नामी गिरामी श्रद्धालुओं के नाम दर्ज थे। उसका अनुमान था कि शायद इस बार राम लाल …?
मन की बात मन में ही रख राम लाल ने अपनी खुशी का इजहार नहीं किया था, लेकिन उसे पता था कि ये सारा खेल उसी के लिए खेला जा रहा था – अनभोर में।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

