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स्वामी अनेकानंद भाग 70

Swami Anekanand

तप:पूत काया, उजड़े बिगड़े बाल, लम्बी लटक आई दाड़ी, निस्तेज हुई आंखें और छुहारे सी सूख गई सुनहरी काया स्वामी जी की तपस्या के प्रमाण थे। घोर तप किया था – स्वामी जी ने – ये अब सर्व मान्य सच था।

घोर निराशा के दलदल से बेहोश हुए अरबपति मोहन मकीन का यों साबुत बच जाना एक अलग करिश्मा था। स्वामी जी से मिलने से पहले विभूति और मीरा मर्फी ने मोहन मकीन से बातें की थीं।

“मैं ऋणी रहूंगा स्वामी जी का बेटी।” उन्होंने विभूति से कहा था। उनकी आवाज में स्वामी जी के लिए आभार था। “अब तुम संभालो मेरे साम्राज्य को। मैं तो अब स्वामी जी के चरणों में बैठ कर वैरागी बनूंगा।” मोहन मकीन तनिक से मुसकुराए थे।

अचानक साथ खड़ी मीरा मर्फी को लगा था कि वही संदेश उसके लिए भी था। अगर उसने भी हाथ नहीं खींचा तो डूब जाएगी धन माल के दलदल में। अकेली थी वो। कौन बचाएगा उसे?

“स्वामी अनेकानंद।” मीरा मर्फी के अंदर से ही उत्तर आया था। “शरणागत हो जाओ तुम भी मीरा।” कोई कह रहा था। “ये माया मोह सम्पत्ति नहीं विपत्ति है।”

और जब दोनों सहेलियों ने स्वामी अनेकानंद के दर्शन किए थे तो दंग रह गई थीं।

“तप किया है न।” आहिस्ता से विभूति ने मीरा मर्फी को बताया था। “घोर तपस्या की है।” उसने दोहराया था। “वरना तो …”

“मैं तो पचा ही नहीं पा रही विभू।” उदास थी मीरा मर्फी। “ये जीवित कैसे रहे होंगे?” मीरा मर्फी का प्रश्न था।

“तप तपस्या में माया गलती है लेकिन आत्मा और विकसित हो जाती है।” पंडित अवध नारायण दर्शनार्थियों को बता रहे थे। “स्वामी जी अब आत्मिक शक्ति से पूरी तरह लैस हैं। इनके आशीर्वाद के आगे अब कोई कैसा भी अशुभ न टिकेगा।” उनका कहना था।

“कब से मिलेगा आशीर्वाद पंडित जी?” किसी ने भीड़ में से प्रश्न किया था।

“इस संसार में लौटेंगे तभी से मानो।” पंडित जी ने उत्तर दिया था।

“इंतजार तो करना ही होगा?” मीरा मर्फी ने प्रश्न किया था।

“कर लो।” विभूति की राय थी।

पंडित अवध नारायण ने स्वामी जी के जागृत होने की पहली शर्त रक्खी थी। उन्होंने हाथ उठा कर कहा था – स्वामी जी की मनोकामना है कि इस पुराने पर्ण कुटीर के स्थान पर यहां शिव मंदिर की स्थापना हो। उनकी तपस्या शिव की कृपा से संपूर्ण हुई है। शिव जितना कृपालु देव और कोई नहीं है।” पंडित जी बता रहे थे।

तभी मीरा मर्फी खड़ी हो गई थी। उसने सीधा पंडित अवध नारायण को संबोधित किया था।

“पंडित जी। मेरी विनती है कि इस प्रस्तावित शिव मंदिर का मैं निर्माण कराऊं।” मीरा मर्फी ने आग्रह किया था। “मेरी मां शिव की पुजारिन थी।” मीरा मर्फी ने बताया था। “वो भारतीय थी। और शिव की उपासना करती थी।”

पब्लिक ने मुड़ कर एक साथ मीरा मर्फी को देखा था। विदेशी थी मीरा मर्फी। पता चला था कि वो अमेरिका से आई थी। ज्ञात हुआ था कि वो भी विभूति की मित्र थीं।

न जाने क्यों और कैसे स्वामी अनेकानंद ने आंख उठा कर मीरा को देखा था।

अनिंद्य सुंदरी थी मीरा मर्फी। कंचन काया और अपसराओं जैसे हुस्न की मालिक मीरा आनंद बाबू को भीतर से छू गई थी। अचानक बर्फी का चेहरा कौंधा था और बुझ गया था। फिर कदम खंडी का दृश्य लौटा था और किसी संस्कारी कन्या का चेहरा सामने आया था। लेकिन वो भी टिका नहीं था।

मीरा मर्फी का कांतिमय चेहरा आनंद बाबू की आंखों के सामने अड़ा खड़ा ही रहा था।

लेकिन क्यों? आनंद बाबू को इस प्रश्न का उत्तर न आता था।

मग्गू का मिजाज बिगड़ा हुआ था। राम लाल बगल में मिलाई रजिस्टर दबाए खड़ा-खड़ा बेहोश होने को था। स्वामी घनानंद पर भी गाज गिरने वाली थी।

“कमाल है, भाई।” मग्गू गरजा था। “माल हमारा और मुनाफा उनका?” उसने राम लाल पर नजर डाली थी। “स्वामी जी हमारे लेकिन पहले दर्शन करेंगे विलोचन शास्त्री?” उसने स्वामी घनानंद को अपांग देखा था। “आप को तो खाने नहाने के अलावा और कुछ …”

“नहीं जनाब।” स्वामी घनानंद हिम्मत बटोर कर बोले थे। “हमने सोचा था कि एक बार विलोचन बाबू हो जाएं तो हम जाएं।”

“और जा कर झक मारें?” मग्गू उबल पड़ा था। “थोड़ी भी अक्ल …”

“नहीं जनाब। विलोचन बाबू जो कर के जाएं हम उससे कई गुना …”

“मतलब …?”

“मतलब सर कि उन से सब कुछ कहीं ज्यादा कहीं ज्यादा – बहुत ज्यादा …” स्वामी घनानंद तनिक हंसा था।

“यही ठीक रहेगा माधव जी।” राम लाल ने भी स्वामी घनानंद की बात बड़ी की थी।

मग्गू क पारा उतरा था। होश लौटा था। बात समझ आई थी।

“ठीक है।” मग्गू का स्वर अब संयत था। “जाइए।” उसने उन दोनों को क्षमा कर दिया था।

जान बची तो लाखों पाए – कहते हुए राम लाल लौटा था। वह बहुत प्रसन्न था। उसका मिलाई रजिस्टर बता रहा था कि खूब माल कमाई हो रही थी और होने वाली थी। एकाएक राम लाल को याद हो आया था कि उसने आनंद बाबू के मांगने पर बीस हजार रुपये नहीं भेजे थे। और अब उन्हीं आनंद बाबू की बदौलत फिर से भंडार भर गए थे। होटल भी पूरा बुक था। आश्रम में पैर रखने को जगह न थी। और श्रद्धालुओं का ऐसा तांता लगा था कि पूरी बंबई डूबने-डूबने को थी।

“लेकिन आनंद बाबू ने एक बार मुड़कर भी न तो कोई शिकायत की और न कोई शिकवा किया। क्यों?” राम लाल ने इस अपने ही प्रश्न के आघात को कठिनाई से सहा था।

होटल के कमरे में अकेली बैठी मीरा मर्फी बार-बार – हर बार स्वामी अनेकानंद के तप तपस्या के बारे सोच रही थी। अनुमान लगा रही थी कि कैसे स्वामी अनेकानंद ने अपनी तपस्या पूरी की होगी? कोई पुरुष इतना समर्थ भी हो सकता है – उसने पहली बार देखा था।

हर बार मीरा मर्फी की उंगली स्वामी अनेकानंद के तप: पूत शरीर को छू कर देखना चाहती थी। लेकिन हर बार झिझक कर लौट आती थी। डर रही थी मीरा मर्फी कि कहीं स्वामी अनेकानंद का पवित्र गात उसके छूने से मैला न हो जाए।

जीवन में पहली बार ही था जब उसने किसी पुरुष का इस तरह का पौरुष देखा था। और पहली बार ही था जब उसके मन मयूरा ने टेर-टेर कर मांगा था एक पुरुष – स्वामी अनेकानंद जैसा ही एक पुरुष जो उसकी प्रेम पिपासा बुझाता और वो …

“तुम क्या दोगी उसे?” मीरा के जागृत प्रेमी मन ने उससे प्रश्न पूछा था।

“तन-मन-धन – सब कुछ निछावर कर दूंगी।” मीरा मर्फी ने भी खुल कर ऐलान किया था।

मीरा मर्फी ने महसूसा था कि उसके प्रेम का यह पहला प्रसंग था जिसके बारे उसने आज पहली बार सोचा था।

“भारत में ही मिलेगा तेरा जोड़।” मां की आवाज थी। “यहां अमेरिका में तो दूषित और छल कपट का चलन है। किसी भी मोड़ पर चल देता है पति पुरुष छोड़ कर।” मां हंसती रही थी। “मेरे तो प्रभु की कृपा है जो तेरे पापा मुझे मिल गए। वरना तो …”

“क्या मुझ पर भी मेरे प्रभु दया करेंगे?” आंखें मूंदे मीरा मर्फी ने स्वयं से प्रश्न किया था।

स्वामी अनेकानंद स्वयं मीरा मर्फी के सामने आ खड़े हुए थे।

मीरा मर्फी चौंकी थी, हंसी थी और हंसती ही रही थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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