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स्वामी अनेकानंद भाग 6

Swami Anekanand

“कहां ..?” आनंद ने भी पूछ ही लिया था।

“बाटा चौक।” राम लाल ने प्रसन्न हो कर बताया था। “एक तरह से बियाबान ही था पर मेरी सूझबूझ ने कहा था – ये तुम्हारी मक्का मदीना है। यहीं बैठ जाओ। खोल दो अपना होटल।”

“खोल दिया होटल?”

“हां। खोल दिया होटल। एक बड़ा स्टोव, तवा, आटा और एक अचार का डब्बा ले आया। घड़े में पानी रख दिया। पेड़ की छांव में एक टूटी बेंच पहले से ही पड़ी थी। बस, मेरा होटल चालू। गरम-गरम परांठे अचार के साथ और पानी मुफ्त। छांव पेड़ की थी अत: कोई पैसा नहीं।” हंस रहा था राम लाल। “सच मानो आनंद बाबू मेरे पहले दिन की कमाई गिन कर मैं बल्लियों कूदा था।”

“फिर ..?”

“फिर, खूब चला मेरा राम लाल का ढाबा। मेरे परांठे दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गए थे। मैंने अचार खुद बनाना आरंभ कर दिया था। तीन लड़के रख लिए थे। मेज कुर्सी लगा ली थी। पानी कांच के गिलासों में देने लगा था। और साथ में चाय का धंधा भी चालू कर दिया था।”

“पौ बारह ..?” आनंद ने भी प्रसन्न हो कर पूछा था।

“हां। लेकिन ..”

“लेकिन ..?”

“पहुंच गए पुलिस वाले। पहले तो पेट भर-भर कर खाना खाया फिर लगे पूछ ताछ करने। कहां के हो? क्यों हो? कब से हो? कित्ती कमाई हो गई? चलो थाने ..!”

“क्यों? थाने क्यों चलूं ..?” मैं अकड़ गया था।

“सड़ाक-सड़ाक।” दो झापड़ उस लंबे पुलिस वाले ने मेरे मुंह पर दे मारे। “चल।” उसने मुझे आगे-आगे डाल लिया, ओर ले आए पुलिस थाने। “साला। हमारे इलाके में बिना हमारी इजाजत के धंधा पीट रहा है और नोट कमा रहा है। चोर ..!” पुलिस वाले कहते रहे थे।

“फिर ..?”

“नंगा कर छोड़ दिया।” राम लाल अब रोने-रोने को था।

“वैरी सैड।” आनंद का भी कलेजा हिल गया था। उसे लगा था जैसे उसी को पुलिस वालों ने पकड़ कर सड़क पर ला पटका था। “फिर आपने ..?” आनंद ने डरते-डरते पूछा था। “ए ग्रेट ट्रैजडी।” आनंद जैसे स्वयं से कह रहा था।

“भट्टू बाबा ने तावीज दिया था, बस। उसी के बाद से हमारे वारे न्यारे हो गए।” मैंने एक महिला को कहते हुए सुना था। मैंने उस महिला को गौर से देखा था।

“भट्टू बाबा?” मैंने उस से पूछ ही लिया था। मेरे मन में एक पुरानी जिज्ञासा जाग उठी थी।

“मणी पर रहते हैं। खूब भीड़ रहती है भइया। कोई भी मिल सकता है।” उस महिला ने मुझे बताया था। “कोई दुख है तो मिल लो भइया।” वह राय दे रही थी। “दुनिया के दुख दूर करते हैं। कुछ लेते-देते नहीं। श्रद्धा हो सो दे आओ।” उसने मुझे अगली सूचना भी दे दी थी।

और सच मानो आनंद बाबू मुझे तो जैसे परमात्मा ही मिल गया था। मैं तो भाग लिया था। और मैंने मणि पर जा कर ही दम लिया था। खूब बड़ा मेला लगा था। भीड़ थी। लोग थे। और भट्टू बाबा की चर्चा थी, प्रशंसा थी। उन्हें परम पुरुष की उपाधि मिल चुकी थी। वो पूज्य थे। मेरा भी मन भर आया था। मैं अपने नम्बर पर सीधा भट्टू बाबा के चरणों में लेट गया था। लेकिन ..” रुक गया था राम लाल। उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी। “भट्टू बाबा ने मुझे बांहों में भर लिया था और एकांत में ले गया था। उसने मेरे चरण पकड़ लिए थे। और मुझसे भीख मांग रहा था कि मैं ..”

“कौन था ..?”

“गज्जू था। इसे मैंने ही ये सब सिखाया था। और अब ये सिद्ध पुरुष बन गया था।” मुसकुरा दिया था राम लाल।

आनंद को लगा था कि राम लाल ने अभी-अभी आसमान को पकड़ा है और उसे तोड़ मरोड़ डाला है।

“चलें ..?” राम लाल का प्रश्न था। “रिक्शा आ गया है।” उसने आनंद का ध्यान आकर्षित किया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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