Site icon Praneta Publications Pvt. Ltd.

स्वामी अनेकानंद भाग 59

Swami Anekanand

आने वाले चुनावों का प्रचार प्रसार जोर पकड़ता चला जा रहा था।

बबलू और पल्लवी जी जान से चुनाव की तैयारी में जुटे थे। आने वाले इतवार को पल्लवी ने पूरी बंबई में नारी शक्ति सभाओं का किया था। पूरा प्रोग्राम तीन भागों में बंटा था। एक भाग पल्लवी देख रही थी तो दूसरा भाग बबलू के जिम्मे था। तीसरे भाग में विलोचन शास्त्री और सीता देवी को जाना था और कार्य कर्ताओं का होंसला बढ़ाना था।

बैनर से लेकर पोस्टरों तक को सारी बंबई में लगा दिया था। जगह-जगह दीवारों पर भी नारी शक्ति की महत्ता को लिखा गया था। प्रेस और मीडिया को बबलू ने खास तौर पर आमंत्रित किया था और उनके लिए जलपान की मुकम्मल व्यवस्था की गई थी।

नारियों में सभाओं में जा कर शिरकत करने की होड़ लगी थी। बड़ा ही उल्लास और उन्माद था नारी समाज के बीच। उन्हें पहली बार एहसास हो रहा था कि वो भी देश की भाग्य विधाता थीं। नई जागृति का नया युग आया लगा था।

विलोचन शास्त्री भी इस बार बढ़ चढ़ कर प्रचार में लगे थे। इस बार उनकी हवा बनती लग रही थी। बबलू ने जो नया पैंतरा बदला था – बेजोड़ लग रहा था। जीत हासिल होने के बाद विलोचन शास्त्री इस बार पहले जैसी गलतियां नहीं दोहराएंगे – उन्होंने प्रतिज्ञा की थी।

कल्लू की नजर में विलोचन शास्त्री और बबलू का नया खेल समाया हुआ था।

“शहीद चौक के चौराहे पर सनातन का सम्मेलन इतवार के ठीक दो बजे आरंभ होगा।” कल्लू ने मग्गू के सामने योजना रख दी थी। “आपने अपने दो चार लाइन का परिचय कह सुनाना है।” कल्लू ने मग्गू को घूरा था। “दो चार लाइन के – आचार्य घनानंद, सनातन के राष्ट्रीय स्तंभ और जनता के परम प्रिय आपके सामने अपने विचार रक्खेंगे। बस, आप बैठ जाइए और आचार्य घनानंद स्टेज ले लेंगे।”

“यार …! अकेले ही आचार्य …?” मग्गू ने प्रश्न दागा था।

“हां। अकेले ही बोलेंगे।” कल्लू ने जोर दे कर कहा था। “अगर तीर चल गया तो देखना मग्गू – किस्मत चमक जाएगी प्यारे।” कल्लू हंस रहा था। “देख तो लिया है न तुमने आचार्य घनानंद को?” कल्लू ने पूछा था। “ताड़ सा लंबा और बादलों सा घरघराता – घनानंद …”

“तेरी मर्जी।” मग्गू ने बात समाप्त की थी।

पूरी बंबई में आचार्य घनानंद के पोस्टर लगे थे। पोस्टरों को बड़े ही करीने से तैयार किया गया था। आचार्य घनानंद किसी दिव्य पुरुष से कम न लग रहे थे। आते जाते लोग पोस्टरों को ठहर-ठहर कर देखते थे। हर कोई अनुमान लगाता था – आचार्य घनानंद के बारे और चला जाता था।

प्रेस और मीडिया को लिखित रूप में सूचित किया गया था। आचार्य घनानंद का एक संक्षिप्त परिचय निमंत्रण के साथ भेजा गया था। बताया गया था कि आचार्य ऋषि मुनियों की सनातन की परंपरा के पक्षधर थे और सनातन आज के समाज की आवश्यकता थी।

आचार्य घनानंद के लगे पोस्टरों को देख पूरी बंबई का रुख मुख मुड़ा लगा था।

विलोचन शास्त्री के खेमें में भगदड़ जैसी मच गई थी। स्वयं विलोचन शास्त्री भी उस आचार्य के लगे पोस्टर को देख दंग रह गए थे। उनका अपना लगा पोस्टर उन्हें बौना लगा था – आचार्य घनानंद के पोस्टर के मुकाबले। पल्लवी और बबलू को एक बड़ा धक्का लगा था। पर वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे। नारी शक्ति का करिश्मा घुलता लगा था।

“ये मोढ़ा कहां से आया?” बबलू ने पल्लवी से चुपके से पूछा था।

“खरीदा हुआ लगता है।” पल्लवी की राय थी। “जासूसी कराओ।” पल्लवी ने आंखें तरेरी थीं। “इसका चरित्र …?”

“ठीक कहती हो।” बबलू भी मान गया था।

सीता देवी बहुत प्रसन्न थीं। उन्हें आचार्य घनानंद का पोस्टर बहुत भला लगा था। उन्हें अहसास हो रहा था कि इस बार भी विलोचन शास्त्री चुनाव हार जाएंगे।

“तुम भी कोई ऐसा ही बाबा जी पकड़ लाओ ना?” सीता देवी ने विलोचन शास्त्री को राय दी थी। “तुम अकेले-अकेले कब तक लड़ोगे?” वह हंस रही थीं।

नारी शक्ति की जुड़ी सभाओं में आज विलोचन शास्त्री से ज्यादा आचार्य घनानंद की चर्चा थी।

पूरी बंबई में लगे आचार्य घनानंद के पोस्टरों ने कमाल कर दिखाया था। आते-जाते लोगों की निगाहें पोस्टरों पर पड़ती तो वो पल भर के लिए ठहर जाते। उन्हें अचानक ही स्वामी विवेकानंद की याद हो आती थी। उन्हें भ्रम होता था कि कहीं स्वामी जी लौट तो नहीं आए?

नारी शक्ति की जुड़ी सभाओं में आम चर्चा चल पड़ी थी कि ये आचार्य घनानंद था कौन? कुछ लोग तो उसे जासूस तक बता रहे थे। कुछ का मानना था कि ये आचार्य घनानंद और कुछ नहीं माधव मोची का खेला स्टंट था। माधव को इस बार हार का डर था। यही कारण था कि वो कुछ ऐसा वैसा – नया नोसरा कर जनता का ध्यान भटकाना चाहता था। लेकिन पोस्टर से तो लगता था जैसे आचार्य घनानंद कोई हस्ती था, परम पुरुष था या कोई दिव्यात्मा था।

देखते-देखते आचार्य घनानंद विलोचन शास्त्री से ज्यादा प्रासंगिक हो उठा था।

जुड़ी नारी शक्ति की सभाओं में विलोचन शास्त्री से ज्यादा चर्चा आचार्य घनानंद की हो रही थी। एक जिज्ञासा थी – आचार्य घनानंद को जानने की। जो हर पल जोर पकड़ती जा रही थी।

एक और घटना घटी थी। प्रेस और मीडिया भी दो बजते न बजते शहीद चौक के चौराहे पर एकत्रित हो गए थे। आचार्य घनानंद ने सनातन के बारे क्या कहना था – सभी तुरंत जान लेना चाहते थे। विलोचन शास्त्री में उन्हें अब कुछ नया न लगता था।

“सनातन के राष्ट्रीय स्तंभ आचार्य घनानंद जी आपके सामने अपने विचार रक्खेंगे।” माधव मोची ने ठीक दो बजे जब शहीद चौक से घोषणा की थी तो तालियां बज उठी थीं। “मैं आचार्य से विनती करूंगा कि वो आएं और लोगों को अपने विचारों से अवगत करें।” माधव मोची ने मंच पर बैठे आचार्य घनानंद से निवेदन किया था।

आचार्य घनानंद आहिस्ता-आहिस्ता माइक के सामने अवतरित हुए थे।

जमा भीड़ ने फिर से तालियां बजाई थीं और आचार्य घनानंद अमर रहें के नारे लगे थे।

“वसुधैव कुटम्कम सनातन का मूल मंत्र है, मित्रों।” आचार्य घनानंद ने जनता को संबोधित किया था। “और आज – इस घड़ी हमारे देश को ही नहीं हमारे विश्व को इस मूल मंत्र की आवश्यकता आन पड़ी है।” आचार्य बताते रहे थे। “स्वार्थ सिद्धि से समाज कल्याण संभव नहीं है दोस्तों।” आचार्य का कहना था। “जबकि आज हम सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए नंगे हो कर खड़े हैं और हमें धन चाहिए – जैसे भी मिले। हमें न कोई शर्म है और न कोई लिहाज। हमारा न कोई धर्म है और न कोई कर्म। हमारी न कोई सीमा है न कोई सुरक्षा है। अब हम कपड़े उतार कर समाज के सामने नंगे हो कर नाच रहे हैं।” आचार्य की आवाज में घरघराहट थी। आचार्य के हाव भावों से जनता मंत्र मुग्ध हो गई थी।

आचार्य घनानंद का प्रवचन एक घंटे तक चला था। इस बीच अखंड शांति बनी रही थी। किसी पंछी ने भी पर नहीं मारा था।

पब्लिक ने खूब तालियां बजाई थीं, खूब नारे लगाए थे और माधव मोची का मनोरथ सिद्ध हुआ लगा था।

शहीद चौक पर हुए इस सम्मेलन को बबलू और पल्लवी ने छुप कर देखा था।

“कुछ करना होगा – जरूर।” पसीना पोंछते हुए बबलू ने पल्लवी से कहा था। “नारी शक्ति के नारे में इतना दम नहीं पल्लो कि इस उठती आंधी को रोक दे।” चिंतित हो उठा था बबलू।

“ठीक सोच रहे हो।” पल्लवी ने भी माना था। उसका भी चेहरा उतर गया था। “उठवा दो।” उसने धीमे से राय दी थी बबलू को।

“नहीं। चाचा जी को बहुत बुरा लगेगा। वो तो परम पुरुष हैं। इस बात पर कभी राजी नहीं होंगे।” बबलू ने सच सामने रक्खा था।

“फिर ये आचार्य तो …” पल्लवी बोल ही न पा रही थी।

“सोचते हैं।” बबलू की आवाज भी बैठ रही थी। “अभी वक्त है। इतनी जल्दी तो कुछ नहीं होगा।” बबलू मान रहा था।

शाम को विलोचन शास्त्री के आवास पर प्रेस और मीडिया इकट्ठा हो गया था।

“अगर सनातन की जीत होती है तो मेरी हार कोई शर्म की बात नहीं।” विलोचन शास्त्री ने प्रेस और मीडिया को उनके उठाए प्रश्नों का एक ही उत्तर थमा दिया था।

कल्लू ने विलोचन शास्त्री के छोड़े इस तीर का दिया घाव भी नाप लिया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

Exit mobile version