“अगर किसी ने इसे बच्चे की तरह रोते बिलखते देख लिया तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा गुरु!” कल्लू ने राम लाल को चेतावनी दी थी। “जितना जल्दी हो – उतना भला। इसे गांव के लिए रवाना करो।” कल्लू ने साफ शब्दों में कहा था।
राम लाल ने कदम को देखा था। कदम भी कल्लू से सहमत लगा था। बात भी सही थी। अगर स्वामी अनेकानंद को किसी ने रोते बिलखते देख लिया या सुन लिया तो गजब का गोला गिरेगा। लोगों के लिए अब स्वामी अनेकानंद ईश्वर से कम न था।
तीनों मित्र तीन दिशाओं में एक साथ दौड़े थे।
सबसे पहले कदम ने अपने नाई भाई को फोन पर फौरन बुलाया था। और जैसे ही वह पहुंचा था कदम ने उसे स्वामी अनेकानंद को दिखाया था।
“इन्हें अब आनंद बना दे भाई।” कदम ने आदेश दिया था। “आनंद मेरा मतलब – ए कॉरपोरेट फ्रॉम बॉम्बे।” कदम तनिक मुसकुराया था। “अब समझ तो रहे हैं न आनंद बाबू?” कदम ने विनम्रता पूर्वक पूछा था।
आनंद की समझ में भी आ गया था कि कदम का उठाया कदम सही दिशा में था।
और जब तक कल्लू अपने दर्जी भाई को लेकर आश्रम लौटा था तब तक स्वामी अनेकानंद आश्रम से गायब हो चुके थे। कल्लू कॉरपोरेट आनंद को देख खुश हो गया था।
“चलिए, अब आनंद बाबू आप कपड़े पहनिए।” कल्लू ने आग्रह किया था।
आनंद ने आज जैसे मुद्दतों के बाद उन लाए कपड़ों को देखा था। स्वामी अनेकानंद के चोले को छोड़ अब एक कॉरपोरेट आनंद के किरदार में लौटना – उन्हें आश्चर्य जैसा लगा था। उसे तो अब स्वामी अनेकानंद का रोल पसंद आ गया था। आशीर्वाद लेते लोग, चरण छूते लोग और … और उसकी प्रशंसा – सब कुछ मिल कर आनंद के लिए किसी मिले वरदान से कम न था। लेकिन आज उसे लग रहा था कि वह फिर से मनुष्य योनि में लौट रहा था और अब उसे सब कुछ वही करना पड़ेगा … जो …
सिहर उठा था आनंद। पहली बार उसे आज यों लौटना अच्छा न लगा था।
“लो आनंद बाबू घड़ी पहनो।” कल्लू ने जेब से निकाल कर बेहद आकर्षक रिस्ट वॉच आनंद को दी थी। “और ये रखिए पर्स। इसमें पैसे हैं। ब्रीफकेस में आपके सारे कपड़े हैं। जरूरत का सारा सामान है। और ये पकड़िए कॉरपोरेट कैप।” हंसा था कल्लू।
कॉरपोरेट कैप पहन कर आनंद साक्षात कॉरपोरेट बन गया था।
“अब अंग्रेजी तो आपको आती ही है आनंद बाबू!” कल्लू ने अलग से प्रसंग उठाया था। “मेरी राय है आनंद बाबू कि आप बाहर निकल कर, यहां तक कि गांव पहुंच कर भी ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी ही बोलें।” हंस पड़ा था कल्लू। “क्या है कि इस देश का मानस महान मूरख है। अंग्रेजी सुनते ही उसको नशा चढ़ जाता है। फिर आप जो भी कहोगे वह मानेगा। हाहाहा।” खूब हंसा था कल्लू। “अगर आनंद बाबू मुझे अंग्रेजी आ जाती तो … तो सच में आनंद बाबू मैं भारत को खरीद लेता।”
एक हंसी का ठहाका उठा था। तभी राम लाल कार से उतर कर अंदर आ गया था।
“गुड। वैरी गुड।” राम लाल ने आनंद के नए हुलिए को देखा था तो खुश हो गया था। “ये लीजिए आनंद बाबू आपका फर्स्ट क्लास का टिकिट। आप की सीट रिजर्व है। और यह लीजिए पांच हजार रुपये, जरूरत के काफी हैं न?” राम लाल ने पूछ लिया था।
आनंद के दिमाग में एक खुशी की लहर दौड़ गई थी। उसके गांव जाने को जिस तरह से तरजीह मिल रही थी वह उसे देख कर आनंदित हो उठा था।
“काफी है।” आनंद ने सर हिला कर हामी भरी थी।
कदम ने आनंद का सामान उठा कर कार में रक्खा था। राम लाल ने कार का दरवाजा खोल आनंद को सीट पर बिठाया था। कल्लू कार की अगली सीट पर बैठा था और ड्राइवर को रेलवे स्टेशन चलने को कहा था।
कल्लू आनंद को विदा कर लौटा था। राम लाल और कदम उसके आने के इंतजार में बैठे मिले थे।
आज आश्रम में एक नया सूरज उदय हुआ था।
इतवार का दिन था। न आश्रम में और न होटल में स्वामी अनेकानंद का कोई प्रोग्राम न था।
राम लाल, कल्लू और कदम इत्मीनान के साथ गरम-गरम चाय पी रहे थे। शनिवार की पूरी रात लगा कर उन तीनों ने आनंद को गांव के लिए विदा कर दिया था।
“कहां चले गए स्वामी जी?” अचानक राम लाल ने प्रश्न पूछा था।
“गांव गए।” कदम ने तुरंत उत्तर दिया था।
“पागल।” कल्लू उछल पड़ा था। “बे भाव जूते पड़ेंगे प्यारे।” कल्लू ने खबरदार किया था कदम को। “किसी को नहीं बताना गांव का अता-पता।” चेतावनी दी थी कल्लू ने।
“तो फिर कहां हैं स्वामी जी?” राम लाल ने फिर से वही प्रश्न दोहराया था।
मौन छा गया था। वो तीनों मुड़-मुड़ कर एक दूसरे की शकल देख रहे थे। तीनों जानते थे कि स्वामी अनेकानंद यों अचानक गायब कैसे हो सकते थे। और अगर वो गायब थे तो थे कहां? लोगों को तो मुकम्मल जानकारी चाहिए थी। यहां तक कि अखबार और प्रेस भी ये प्रश्न उठा सकते थे।
स्वामी अनेकानंद अब कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वो अब एक ऐसी पब्लिक फिगर बन चुके थे जिसकी जानकारी आम और खास सबके लिए जरूरी थी।
राम लाल ने कल्लू की आंखों में देखा था। वह अब कल्लू से उत्तर मांग रहा था।
“यहीं हैं स्वामी जी।” कल्लू बोल पड़ा था। “यहीं पर्ण कुटीर में हैं।” कल्लू ने दिए उत्तर को स्पष्ट किया था। “विपासना पर बैठे हैं।” कल्लू ने कुछ सोच कर कहा था। “मौन धारण किए हैं।” सिद्धि प्राप्त करने के लिए मौन व्रत लिया है।” कल्लू बताता रहा था।
“फिर लोग तो उनसे मिलना चाहेंगे?” राम लाल बोल पड़ा था।
“नहीं। पर्ण कुटीर का दरवाजा बंद रहेगा। दरवाजे पर सील लगी होगी। जब तक स्वामी जी को सिद्धि प्राप्त नहीं होती सील नहीं टूटेगी। और सिल टूटी तो मानो सिद्ध हो गए स्वामी जी।” हंसा था कल्लू।
“तब तक के लिए … पूजा पाठ और आश्रम और होटल में सुबह शाम कीर्तन। स्वामी जी की सिद्धि प्राप्त करने में सहयोग।” कल्लू सटीक बातें बता रहा था।
“और मग्गू?” राम लाल ने अचानक बात बदली थी। “अपने मित्र मग्गू को क्या बताओगे?” राम लाल ने आम प्रश्न पूछा था।
“सनातन।” कल्लू ही खेल खेल रहा था। “पूरी बंबई में मग्गू को लेकर सनातन सभाओं का आयोजन होगा। चुनाव भी तो जीतना है कि नहीं?” उसने विहंस कर राम लाल को देखा था। “गुरु!” हंसा था कल्लू। “अब मग्गू को सी एम और पी एम भी तो बनाना ही होगा।” उसका कहना था।
राम लाल का चेहरा खिल उठा था। कल्लू बड़े ही काम की चीज था – आज फिर राम लाल को जंच गया था।
“कदम।” राम लाल ने बात घुमाई थी। “इसमें हमें तुम्हारी चतुराई चाहिए।” उसने कदम को समझाया था। “स्वामी जी पर्ण कुटीर में हैं। इस बात के तुम गवाह होगे। स्वामी जी की सेवा चाकरी में तुम कितने व्यस्त हो यह भी दिखाना पड़ेगा। और भीतर के दरवाजे पर एक सील लगानी होगी। लेकिन किसी को न बताना होगा न दिखाना होगा। स्वामी जी को संपूर्ण एकांत चाहिए। विपासना में मौन स्वामी जी …”
“अब तो सिद्धि प्राप्त करने के बाद ही बोलेंगे।” कल्लू ने बात पूरी की थी।
कमरे में बंद स्वामी अनेकानंद गांव चले गए आनंद से भी ज्यादा गुणकारी सिद्ध हुए थे।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

