“आइए मेरे बाबू जी! आइए मेरे कदरदान .. मेहरबान ..” मैं एक अधेड़ उम्र का बच्चा चौराहे पर मजमा लगा रहा होता था।
राम लाल बताने लगा था। उसे आज भी अपनी आंखों के सामने अंधकार घिरता लग रहा था।
“वो मैं था आनंद बाबू। मैं राम लाल गुरु जी के जाने के बाद अनाथ हुआ अब पैसे कमाने के प्रयत्न कर रहा था। मैं जी जान लगा कर लोगों को वही दिखाता, बताता जो गुरु जी के साथ दिखाता, बताता था।” राम लाल रुका था। उसने आनंद के भावों को पढ़ा था। आनंद कहीं गुम था। “कमाल ये था आनंद बाबू कि गुरु जी के समय लोग तालियां बजाते, मुझे बड़ी ही प्रशंसक निगाहों से निहारते और प्यार करते। लेकिन अब मुझे वही लोग हीन दृष्टि से देखते और आने दो आने फेंक कर चलते बनते।” राम लाल चुप हो गया था।
आनंद ने देखा था कि राम लाल के चेहरे पर पुरानी टीस सा कुछ उभर आया था। उसके भोगे दुख आनंद के सामने आ खड़े हुए थे। और आनंद था कि उन्हें छूने से भी नाट गया था।
“भूखा मरने लगा था मैं, आनंद बाबू।” राम लाल लौटा था किसी अंत हीन यात्रा से। “और फिर मैंने नौकरी तलाशनी आरंभ की।” वह तनिक हंसा था। “बिलकुल आपकी तरह। फर्क इतना कि आप एम ए पास हैं और मैं बिलकुल ही ठूंठ था गंवार था।” हंसा था राम लाल। “स्कूल गया ही कब था?” उसने अफसोस जाहिर किया था।
“मिली नौकरी?” आनंद पूछ बैठा था।
“हां-हां। मिली थी नौकरी। नुक्कड़ पर चलते रोमी के ढाबे में डेरा डाल दिया था। दिन निकलने से पहले ही हमारे लिए दिन निकल आता और रात होने के बाद भी रात न होती।” जोरों से हंसा था राम लाल। “हम नौकर थे .. ढाबे पर काम करते हम छोकरे मानव नहीं मशीन थे। हमारा भविष्य रोमी जल्लाद था।” राम लाल ने फिर से आनंद को घूरा था।
“मारता था?” आनंद पूछ रहा था।
“नहीं। उसका अंदाज ही अलग था। “अबे! तू नहाता ही रहेगा? वो आवाज देता। मैं लइन पइयन भागता। काम पकड़ लेता। और जब हार थक कर खाने पर बैठता तो फिर रोमी आवाज देता – बे साले खाते ही रहोगे? और हम सब खाना समेट कर फिर भाग कर काम पकड़ लेते।” राम लाल ने सांस संभाली थी। “न नाम था .. न पैसा था .. न आराम था। और न थी कोई इज्जत। हां। नौकरी तो थी आनंद बाबू।” खुल कर हंसा था राम लाल।
आनंद को जैसे हजारों हजार बिच्छुओं ने एक साथ काट लिया था – ऐसा लगा था उसे। नौकरी के मात्र स्मरण से आनंद के मुंह का जायका बिगड़ गया था। उसे अपना हुआ इंटरव्यू याद हो आया था। मालिक को नौकर से काम लेना होता है बस। आनंद फिर से सोचने लगा था।
“उम्र जा रही थी – मुझे ऐहसास था आनंद बाबू। मुझे ज्ञान था कि रोमी के पास पड़े-पड़े मैं बूढ़ा भी हो जाऊंगा तब भी छोकरा ही रहूंगा। यहां मेरी कोई पद प्रतिष्ठा होने वाली नहीं थी। रोमी अपने अलावा किसी अत्ते खां को भी नहीं गिनता था।” राम लाल फिर से हंसा था। “आप तो पढ़े लिखे हैं।” राम लाल ने आनंद को फिर से घूरा था। “क्या पढ़े हैं, आप?” उसका प्रश्न था।
“एम ए इन हिस्ट्री।” आनंद ने गहक कर उत्तर दिया था।
“लेकिन क्या फायदा?” राम लाल ने फिर पूछा था।
आनंद फिर से निराशा के सागर में जा डूबा था।
“मैं फिर से सड़क पर आ गया था।” राम लाल बताने लगा था।
“क्यों?” आनंद ने पूछा था।
“झगड़ा हुआ था रोमी के साथ। लाख मांगने पर पैसे देता ही न था। कहता – किस लिए चाहिए पैसे? खाना रहना मुफ्त है। जेब खर्च अलग से देता हूँ। एक सिनेमा देखने की छूट है। उसके पैसे भी मैं देता हूँ। फिर .. साले पैसे ..?” वह दहाड़ता रहता था। “मुझे आज तक का मेरा हिसाब दो।” मैं उस दिन अड़ गया था। जम कर झंझट हुआ था। पर मैं रोमी से पैसे ले कर ही टला था।”
“फिर ..?” आनंद के कान खड़े हो गए थे।
“फिर ..?” राम लाल हंसा था। उसने अपने आप को कुर्सी पर ठीक से स्थित किया था। “फिर आनंद बाबू मैं चल पड़ा। मैं खुली सड़क पर चल पड़ा। अब मेरी जेब में पैसे थे .. वो मेरे मित्र लगे मुझे। मेरा सब से बड़ा सहारा वो पैसे ही थे, जो मैंने कमाए थे और रोमी से हासिल किए थे। मैं प्रसन्न था। मेरे पैर मुझे लिए-लिए भाग रहे थे। न जाने कौन सी मेरी मंजिल थी जिसकी ओर मैं चलता ही चला जा रहा था।”
“पहुंचे कहीं?” आनंद ने विहंस कर पूछा था।
“क्यों नहीं।” राम लाल ने आनंद की जांघ पर थपकी दी थी।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

