राधू रंगीला की हुस्न परी फिल्म की पूरी टीम मनाली पहुंच गई थी।
मनाली का मौसम बहुत ही खूबसूरत हो गया था। बर्फबारी, बारिश और हड्डियां कंपाने वाली सर्दी के जाने के बाद वहां फिर से स्वर्ग बस गया था। आसमान भक्क नीला निखर आया था। हवा बड़ी ही नरम और सुगम थी। चारों ओर के नए वन उपवन नहा धो कर फिर से फलने फूलने लगे थे। राधू को जंच गया था कि इस मेहरबान हुए मौसम में प्रेम गीत की रचना बेहद सार्थक बन पड़ेगी।
“मेरा मन नहीं मानता … इस तरह के …” प्रतिष्ठा ने अपनी अरुचि का ईमानदारी से इजहार किया था। “गाना तो कहीं होता ही नहीं।” उसने शिकायत की थी।
“होगा … मैडम, होगा।” राधू रंगीला हंसा था। “गाना ही होगा। एक चमत्कार भी होगा। धीरज धरो। मुझे सपोर्ट करो बस।” राधू का आग्रह था।
“तुमने मुझे फंसा लिया है।” प्रतिष्ठा ने सीधे मानस पर आरोप लगाया था।
“और तुमने मुझे बहका लिया है।” मानस भी माना न था। उसने भी अपनी बात प्रतिष्ठा को कह सुनाई थी।
दोनों लंबे पलों तक एक दूसरे को देखते रहे थे।
प्रतिष्ठा को अपने मां बाबू जी की बहुत याद आ रही थी। उसका मन तो था कि लौट चले बंबई और संभाल ले बाबू जी की पार्टी। कर ले शादी और मां के खेलने के लिए खूब सारे बच्चे पैदा करे। बसा ले एक मनभावन सा संसार और बाबू जी के साथ …
मानस डर रहा था। वह जानता था कि प्रतिष्ठा के बिना उसका सारा बंज बिगड़ जाएगा। पहली बार ही था कि उसे सफलता नजर आई थी। लेकिन प्रतिष्ठा के बिना तो …
“बिन तुम्हारे मैं बरबाद हो जाऊंगा, प्रतिष्ठा।” मानस ने प्रतिष्ठा को पुकार सा लिया था। “मेरे जीवन का अब तुम आधार हो। मेरी प्रेरणा तुम हो मेरा उद्देश्य तुम हो। मैं अब तुम्हारे वशीभूत हूँ। मैं अब एक परवाना हूँ। मेरी बिसात नहीं कि मैं तुम्हें भूल जाऊं, या भाग जाऊं। मुझे तो अब मरना तक मंजूर है – जलना तक स्वीकार है। मैं अब …”
“सच …?” प्रतिष्ठा बोली थी।
“सच!” मानस ने उत्तर दिया था।
प्रतिष्ठा को आज एक नया एहसास हुआ था।
“बेटी बाप की तभी तक होती है जब तक कि उसका मन अनछुआ रहता है।” मानस प्रतिष्ठा को मनाने लगा था। “जिस दिन से उसे अपने प्रेमी का स्पर्श सुख सुहाने लगता है उसी दिन से वो पराई हो जाती है। इसमें सब का शुभ है। यहीं से नए संसार की रचना आरंभ होती है।”
“लेकिन … लेकिन मानस बाबू जी, बूढ़े हो रहे हैं बाबू जी और अम्मा?”
“कब तक उनकी उंगली पकड़ कर चलोगी?” मानस बताने लगा था। “समर्थ बनोगी तभी तो सहरा दे पाओगी?” मानस ने प्रतिष्ठा को छू कर जगा दिया था। “अगर ये हुस्न परी फिल्म सुपर हिट हो जाती है तो सोचो प्रतिष्ठा कि तुम …?”
प्रतिष्ठा को हुस्न परी के सुपर हिट होने का सपना आज सच होता लगा था।
“इस बार थोड़ा दौड़ भाग होगा मैंडम।” राधू रंगीला प्रतिष्ठा को खबरदार कर रहा था। “पन आप घबराना नहीं।” वह हंसा था। “प्रेमियों को पनिश्मैंट भी मिलता है न?” राधू ने व्यंग किया था। “वही सब तो दिखाना है।”
प्रतिष्ठा ने राधू रंगीला की बात मान ली थी। उसकी समझ में तो अभी भी न आया था कि उस गाने का रूप रंग और ढंग ढोंग क्या होगा।
“फिक्शन का अलग चार्म होता है प्रतिष्ठा।” मानस उसे समझा रहा था। “मैंने बहुत मार खाई है। यथार्थ को कई बार पर्दे पर उकेरा है। लेकिन लोग देखते ही नहीं। उठ कर चले जाते हैं। लेकिन जब फिक्शनल प्रपोजीशन परदे पर थिरकते हैं तो लोग सीट से हिलते तक नहीं।” वह हंसा था। “मैंने कसम खाई है कि मैं अब वही परोसूंगा लोगों को जो …”
“क्या …?” प्रतिष्ठा ने हंस कर पूछा था।
“हुस्न परी। प्रतिष्ठा नहीं। हुस्न परी – नाचती, गाती, थिरकती, मचलती हुस्न परी।”
प्रतिष्ठा ने इसके बाद कभी राधू रंगीले को टोका नहीं था, टोका नहीं था। जो उसने कहा था प्रतिष्ठा ने वही किया था।
मनाली से पंद्रह किलोमीटर दूर सतसई पर शूटिंग का नया सैट लगा था।
लोकेशन पर एक छोटा झरना था। झरने के नीचे जहां पानी जमा हो रहा था वहां दलदल जैसा बड़ा पैच बन गया था। झरने के आसपास घास का खुला मैदान था। और बाएं हाथ पर खेत थे। यह दृश्य राधू रंगीला की कहानी पर खरा उतरता था।
नब्बो – प्रतिष्ठा भेड़ बकरियां चराने घास के मैदान में दिख रही थी तो धीरू – मानस बाएं के खेतों में काम करता दिख रहा था।
बड़े कैमरे पीछे की टेकरी पर लगे थे। क्लोजप के लिए राधू रंगीला स्वयं लोकेशन पर जा कर शूटिंग कर रहा था। नब्बो को प्रेम गीत गाते दिखाया गया था। धीरू खेत में जमी एक छोटी चट्टान से जूझ रहा था। इसी को लेकर राधू रंगीला ने एक बेहद रोमांटिक दृश्य की रचना कर डाली थी।
और फिर एक हादसा हुआ था। नब्बो बे ध्यानी में गीत गाती-गाती फिसली थी और नीचे दलदल में जा गिरी थी। धीरू ने पलट कर हुए हादसे को देखा था तो दलदल से नब्बो को बचाने के लिए उसने छलांग लगा दी थी।
पूरा दिन लगा कर राधू रंगीला कुल मिला कर इतना ही काम कर पाया था।
हारे थके राधू रंगीला की टीम के लोग होटल लौट आए थे। अंदाजा था कि इसी लोकेशन पर शायद महीनों काम चलेगा।
प्रतिष्ठा और मानस होटल के पीछे बने घास के लॉन में आराम कुर्सियों पर बैठ चाय पी रहे थे। बड़े ही प्रेमिल पलों का आगमन हुआ था। प्रतिष्ठा आज बहुत प्रसन्न थी। उसे आज अपना नया किरदार – नब्बो के रूप में बेहद भला लगा था। एक ग्रामीण लड़की भेड़ बकरी चराती वहां जंगल में अकेली प्रेम गीत गाती प्रतिष्ठा को एक काव्य जैसा लगा था।
और मानस। खेत में काम करता एक देहाती युवक? छोटी-छोटी मूछों में बड़ा ही आकर्षक लग रहा था मानस। सर पर लाल पीला गमछा बांधे और कमर में लिपटी रस्सी ने प्रतिष्ठा का मन मोह लिया था। एक अनजान लड़की की जान बचाने के लिए दलदल में छलांग लगाता धीरू प्रतिष्ठा को कोई देवदूत जैसा लगा था। कहानी रोमांटिक थी।
“कल क्या होगा?” प्रतिष्ठा ने मानस से पूछा था।
“राधू को पता है।” मानस ने सीधा उत्तर दिया था।
प्रतिष्ठा को बुरा लगा था। उसे लगा था कि मानस झूठ बोल रहा था। वह कहानी बताना न चाहता था। वह उठी थी और अपने कमरे में चली गई थी।
राधू रंगीला ने कहानी के अगले अध्याय को कागज पर उतारा था। उसने अलग-अलग दो कॉपियां बनाई थीं। एक प्रतिष्ठा के लिए थी तो दूसरी मानस के लिए। वह उठा था और प्रतिष्ठा के कमरे की घंटी बजाई थी। प्रतिष्ठा को लगा था कि मानस उसे मनाने आया होगा।
“आप।” प्रतिष्ठा ने दरवाजा खोला था तो सामने राधू रंगीला खड़ा था। “अब किस लिए?” उसने फौरन पूछा था।
“अगला काम। अगली कहानी।” राधू रंगीला ने विहंस कर कहा था।
“आओ-आओ। अंदर आओ।” प्रतिष्ठा ने स्वागत किया था। अचानक उसे मानस याद हो आया था। मानस झूठ नहीं बोलता था, उसने आज मान लिया था।
राधू रंगीला ने प्रतिष्ठा को स्क्रिप्ट की एक प्रति पकड़ा दी थी।
“आप के अगले डायलॉग हैं। पढ़ लेना। समझ लेना। याद कर लेना।” उसने बताया था। “दलदल से बाहर आने के बाद तुम दोनों का परिचय होगा।” हंस गया था राधू रंगीला।
कमरे में मिले एकांत में प्रतिष्ठा ने मिली स्क्रिप्ट को पढ़ा था।
“तुम्हारा नाम?” धीरू सांस संभाल कर पूछता है।
“नब्बो।” उत्तर प्रतिष्ठा देती है।
“नहीं। तुम्हारा नाम होगा हुस्न परी। और मैं तुम्हें परी कह कर बुलाऊंगा।”
“और तुम्हारा नाम?” नब्बो ने पूछा है।
“धीरू।” उत्तर आता है।
“नहीं। तुम्हारा नाम होगा प्रेम देवता। और मैं तुम्हें देव कह कर पुकारूंगी।”
“ओ माई परी।”
“ओ माई देव।”
दोनों का मिलन हो जाता है।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

