अचानक ही विभूति मकीन को एक शक ने आ घेरा था।
वह भारत आई थी किसी पहुंचे हुए तपस्वी की तलाश में जो हर प्रकार के रोग भोग ठीक करता था और बदले में कुछ न लेता था। एक ऐसे स्वामी की कल्पना उसके मन में आई थी जो हिमालय की कंदराओं में तप करके लौटा था और अब जन कल्याण के काम में लगा था। एक ऐसा कल्पित साधु जिसके लंबे-लंबे जटा जूट थे, लाल-लाल लोचन थे, तेजस्वी चेहरा था और भस्म विभूति लगाए वह नंगा ही रहता था। लेकिन स्वामी अनेकानंद तो यंग था, उसका हम उम्र जैसा ही था। फिर उसने इतनी छोटी उम्र में …
“ठग है।” विभूति के दिमाग ने उत्तर दिया था। “जन कल्याण आश्रम बनाने में तो पापा का सारा खजाना खाली हो जाएगा। अगर पापा ठीक भी हो गए तो …?” एक और प्रश्न विभूति के सामने आ खड़ा हुआ था। “क्या करूं …?” प्रश्न था जो विभूति से उत्तर मांग रहा था।
विभूति ने मुड़ कर स्वामी अनेकानंद का फिर से विश्लेषण किया था।
“इन्हें संपूर्ण शांति दरकार है मैडम।” स्वामी अनेकानंद ने कहा था। “इन्हें सोने दें। आराम करने दें। इनकी जब तक नींद न टूटे – कोई व्यवधान न होना चाहिए। स्वामी जी का आदेश था।
“लेकिन स्वामी जी …?”
“आप का शंका का निवारण है – इन पर चौबीसों घंटे निगरानी रहेगी। दो-दो घंटे के अंतराल में आप, कदम, कैलाश और काशी निगाह रक्खेंगे। कभी भी ये चेतना ग्रहण कर सकते हैं। जैसे ही इच्छाएं हरी होगी ये उठने का प्रयत्न करेंगे। और तब भी हमने इनकी सहायता नहीं करनी। इन्हें संघर्ष करने देना है – स्वयं।” स्वामी जी ने विभूति की आंखों को पढ़ा था। “अजब तो लगेगा आप को लेकिन ये फेथ हीलिंग है मैडम। आम उपचार नहीं है।” तनिक मुसकुराए थे स्वामी।
उनकी बात मान ली थी विभूति ने। उसे उम्मीद थी कि कोई चमत्कार होगा। लेकिन वो अभी भी डरी हुई थी।
मोहन मकीन – विभूति के पिता कोई आम आदमी न थे। वह तो एक सोता हुआ शैतान जैसे थे। नींद खुलते ही उन्होंने तो चालू हो जाना था। और जब उन्हें पता लगना था कि उनकी लंका तो लुट चुकी है तो …? विभूति सिहर उठी थी। क्या जवाब देगी वह पापा को – वह सोचने लगी थी।
“क्या करूं? कहां जाऊं? विभूति कुछ भी तय न कर पा रही थी।
अब अमेरिका लौटने का तो विभूति का बिलकुल मन न था।
“स्वामी जी। मैं पूछना चाहती थी कि आप का ये संकल्प कलश कब से एक्शन में आएगा?” विभूति बिन बुलाए और बिन आज्ञा के स्वामी अनेकानंद की पर्ण कुटीर में दाखिल हुई थी। उसे अब किसी की परवाह न थी। उसका खोजी दिमाग कुछ उत्तर पा लेना चाहता था।
“जब से आप एक्शन में आएंगी संकल्प कलश भी एक्शन में आ जाएगा।” स्वामी जी ने मुसकुराते हुए कहा था। “हम धोखा खा सकते हैं लेकिन परमेश्वर तो परम हैं। उन्हें तो पल-पल का पता होता है। मैं नहीं जानता कि आप क्या सोच रही हैं लेकिन ईश्वर तो सर्वज्ञ हैं।”
डर गई थी विभूति। उसे लगा था कि स्वामी ने उसके भीतर का चोर पकड़ लिया था।
“म … मैं स्वामी जी …” विभूति गड़बड़ा गई थी।
“जिस दिन जन कल्याण आश्रम की पहली ईंट लगेगी उसी दिन मोहन मकीन साहब का पुनर्निमाण आरंभ हो जाएगा।” स्वामी अनेकानंद ने संयत स्वर में कहा था। “प्रकृति का लेना देना अलग से चलता है मैडम।”
विभूति की समझ में आ गया था कि भारत का बंज व्यापार अलग से चलता था। ये अमेरिका न था जहां मशीनों की भाषा पर बल दिया जाता था। यहां तो सब हवा में था, अदृश्य था और अनोखा था।
फोन पर विभूति ने कह कर पापा की टीम को भारत बुला लिया था। उसने टीम को एक ऐसा जन कल्याण आश्रम बनाने के आदेश दिए थे जो विश्व में पहला ही हो, अनोखा हो और जन हित में समर्पित हो।
विभूति का आदेश बंबई की काया में प्रवेश कर गया था।
जन कल्याण आश्रम का काम आरंभ हो गया था।
जैसे ही मोहन मकीन ने आंखें खोली थीं प्रहरी बनी विभूति उछल पड़ी थी।
“ओह गॉड।” विभूति के होंठों से हौले से शब्द बाहर आए थे। उसकी निगाहें आसमान पर थीं और उसकी आंखें जागृत हो गई थीं।
“जिस दिन इनकी इच्छाएं हरी होंगी उस दिन …” स्वामी जी के कहे शब्द विभूति को याद हो आए थे। “तो क्या … तो क्या पापा की इच्छाएं …?” विभूति स्वयं से पूछ रही थी।
मोहन मकीन खुली आंखों से कमरे के आकार प्रकार को निरख परख रहे थे। वो असमंजस में थे। विभूति मकीन भी अब उनकी निगाहों के साथ-साथ कमरे में डोल फिर रही थी। और जब मोहन मकीन ने करवट बदलने की असफल चेष्टा की थी तो विभूति उठ कर उनके पास पहुंच जाना चाहती थी लेकिन दरवाजा बंद था। आदेश न था अंदर जाने का।
विभूति अचानक ही स्वामी जी की आवाजें सुनने लगी थी।
“धन कमाना भी एक आर्ट है।” स्वामी जी कह रहे थे। “विकसित होने पर आदमी कमाने की होड़ में शामिल हो जाता है। उसके बाद आता है उचित अनुचित, भला बुरा, न्याय अन्याय और एक वक्त आता है जब आदमी आपा खो देता है। लालच की खुली मुट्ठी में जा बैठता है और फिर तो …”
“इसमें बुरा क्या है स्वामी जी?” विभूति का प्रश्न आया था।
“प्राप्त धन के साथ अच्छा बुरा जुड़ जाता है। ईमानदारी की कमाई पॉजिटिव होती है और बेईमानी की कमाई निगेटिव होती है।” हंस गए थे स्वामी जी।
“तो क्या पापा को बेईमानी की कमाई ले डूबी?” विभूति ने एक पल सोचा था।
“लालच आदमी को बहका देता है।” स्वामी जी ने आगे बताया था। “जब भावनाएं अनियंत्रित हो जाती हैं तब व्यक्ति जल्दबाजी में ऐसे वित्तीय निर्णय ले लेता है जिनका परिणाम नुकसान के रूप में सामने आता है। और ये नुकसान किसी भी रूप में हो सकता है।”
“लेकिन स्वामी जी पापा तो …” विभूति ने अपने पापा का पक्ष संभालना चाहा था।
“धन सृजन के लिए एक शांत और संतुलित मस्तिष्क का होना अनिवार्य होता है और अगर अर्जित धन का कोई उद्देश्य न हो तो वो निगेटिव हो जाता है।
“कोई उपाय तो होगा स्वामी जी?”
“है। उपाय भी है। यहां आदमी के हृदय की भूमिका सामने आती है। सत्य, करुणा और सम्वेदनशीलता जैसे नैतिक मूल्यों से अर्जित किया गया धन सकारात्मक सिद्ध होता है। जैसे कि आपका किया संकल्प अब निगेटिव को पॉजिटिव में बदल देगा। अशुभ शुभ में परिवर्तित हो जाएगा और तब …”
और आज एक आशा किरन विभूति के दिमाग में लहक गई थी।
“अब शुभ-शुभ होगा।” विभूति के मन ने मान लिया था।
और जब दूसरी बार मोहन मकीन करवट बदलने में सफल हुए थे तो विभूति का मन बल्लियों कूदा था।
आज फिर विभूति को स्वामी अनेकानंद का बताया धन दर्शन याद हो आया था। आज उसे विश्वास हो गया था कि स्वामी जी का कहा एक-एक शब्द सच हो कर रहेगा।
“आपका लिया संकल्प सत्य है।” स्वामी जी ने बताया था। “यही सत्य मोहन मकीन साहब के धन संचय को शुद्ध कर देगा। आप उनकी बेटी हैं। आपका किया संकल्प भी ईश्वर को मान्य है। अब आपकी भौतिक समृद्धि, आंतरिक संतोष और आध्यात्मिक उन्नति तथा सामाजिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। आपको आकाश जितनी ऊंचाइयां प्राप्त होंगी मैडम।” स्वामी जी ने आशीर्वाद दिया था।
और जब अचानक उसकी खुली आंखों के सामने मोहन मकीन ने उठने का प्रयत्न किया था और लड़खड़ाते हुए उठे थे और पानी पीने का स्वयं प्रयत्न किया था तब बिस्तर पर पानी फैल गया था लेकिन विभूति को जंच गया था कि स्वामी अनेकानंद का कहा सब सत्य था।
“भारत। तेरा अहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी।” विभूति ने अश्रु पूरित आंखों से अपने मन में संवाद बोला था और आशापूर्ण आंखों से अपने पापा का पुनर्जन्म होते देखती रही थी।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

