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स्वामी अनेकानंद भाग 47

Swami Anekanand

प्रतिष्ठा लौटी थी बंबई तो सीता देवी उसे बांहों में भर कर खूब रोई थीं। बहुत देर तक रोती रही थीं। एक बेटा न होने का गम उन्हें खाए जा रहा था। वह जानती थीं कि बबलू के मुकाबले प्रतिष्ठा टिक न पाएगी। चुनावी दर्पण में उन्हें अपनी हार साफ-साफ दिख रही थी।

“जाने दो मां।” प्रतिष्ठा ने सीता देवी को दिलासा दिया था। “बहुत हुआ चुनाव पार्टी और पॉलिटिक्स।” वह सीता देवी को समझा रही थी। “ये सब तो आना जाना है। हम कोई टिकाऊ काम कर लेंगे।” उसने अपनी राय सामने रक्खी थी। “बबलू भइया और पल्लवी भाभी भी कौन पराए हैं।” प्रतिष्ठा ने समझदारी दिखाई थी।

“यहीं पर तुम दोनों बाप बेटी गलती करते हो।” सीता देवी बिगड़ी थीं। “अपने पराए की समझ तेरे भेजे में भी नहीं है।” उन्होंने प्रतिष्ठा को ललकारा था। “वंश बेल कैसे चलती है तू नहीं समझती बेटी।”

प्रतिष्ठा ने मां की बात पर गौर किया था।

“बेटी तो पराया धन होती है। शादी के बाद तेरा तो गांव गोत बदल जाएगा। तू तो पराई होगी और हम …”

“कैसी बातें करती हो मां। अब जमाना वो नहीं रहा।” प्रतिष्ठा ठनकी थी।

“वही है और वही रहेगा मेरी बच्ची। तेरे जाते ही बबलू संभाल लेगा सब कुछ।”

“तो मैं भी तो संभालूंगी कुछ?”

“पर हम तो दोनों अकेले रह जाएंगे।”

“चाहती क्या हो?

“तुम … तुम पार्टी संभालो।”

प्रतिष्ठा एक पल के लिए सन्न रह गई थी। उसने तो कभी सपने में भी पार्टी संभालने के बारे सोचा न था। जो वो संभालने जा रही थी उसकी भनक तो अभी किसी के कान तक नहीं पहुंची थी। “किसी तरह हुस्न परी हिट हो जाए, सुपर हिट।” प्रतिष्ठा ने मन में मन की मुराद मांगी थी। “वो और मानस फिर तो जग जीत लेंगे।” उसका इरादा स्पष्ट था।

लेकिन इस बारे वो अभी तक मां को कुछ बताना न चाहती थी।

“अमेरिका से लौटने के बाद इसकी शादी कर दो।” सीता देवी ने विलोचन शास्त्री को आदेश दिया था। “मुझे बच्चे चाहिए। मेरा मन नहीं लगता। मैं … मैं चाहती हूँ ये घर बच्चों की किलकारियों से गुलजार हो जाए।”

“ठीक है।” विलोचन शास्त्री ने हंस कर सीता देवी का आदेश मान लिया था। “लड़का मेरी नजर में है।” उनका कहना था। “पॉलिटिकल घराना है।” विलोचन शास्त्री सीता देवी को खुश करना चाहते थे। “दोनों मिल कर पार्टी संभाल लेंगे।” उन्होंने मुड़ कर प्रतिष्ठा को देखा था।

प्रतिष्ठा ने आंखें नीची कर ली थीं। वह न हां कहना चाहती थी और न ना कहना चाहती थी। उसे तो अपना अभीष्ट पता था।

“नारी शक्ति का ये आइडिया …?” प्रतिष्ठा पूछ बैठी थी।

“मेरा ही विचार है।” विलोचन शास्त्री बताने लगे थे। “आज वक्त बदल गया है बेटी।” वो तनिक हंसे थे। “नारी का वजूद घर की चौखट के भीतर बंद रहने से नहीं बनता। अब तुम भी तो अमेरिका गई हो। किस लिए?”

“म … मैं तो …” प्रतिष्ठा कुछ कहना न चाहती थी।

“कुछ भी काम कर सकती हो। कोई भी काम। यहां तक कि पॉलिटिक्स भी।” विलोचन शास्त्री कह उठे थे।

“पॉलिटिक्स ही करेगी – मेरे साथ।” अचानक पल्लवी भाभी और बबलू भइया प्रतिष्ठा से मिलने चले आए थे। “खबर मिलते ही मैं भागी कि मिल तो लूं अपनी अमेरिका रिटर्न ननदी से।” हंस रही थी पल्लवी। “नारी शक्ति का संचालन तुम्हीं को करना होगा दीदी।” पल्लवी ने घोषणा की थी।

“मैं तो कब से सोच रहा था कि तू आए तो …” बबलू बोला था।

“मैं आई कब हूँ भइया। पंद्रह दिन के अवकाश पर हूँ।” प्रतिष्ठा ने बताया था।

“लेकिन चुनाव तक तो आ जाओगी न?” पल्लवी ने पूछा था।

“वायदा नहीं करती भाभी।” प्रतिष्ठा वार बचा गई थी।

सीता देवी इस पूरे प्रकरण से असंपृक्त बनी रही थीं।

“इस बार कौन सी हीरोइन फसाई है?” सामने पड़ते ही कल्लू ने मानस से पूछा था।

कल्लू मानस को बचपन से ही जानता था। कल्लू जानता था कि जो मग्गू ने कमाया था उसे मानस ने फिल्म बनाने के बहाने उड़ाया खाया था। मानस का शौक था – नई-नई हीरोइनें फिल्म बनाने के बहाने लेना और फिर …

“बाहर की है काका!” मानस ने कल्लू के प्रश्न का उत्तर दिया था। “पहाड़ी है।” वह हंस पड़ा था।

“बेटे, इस बार मुझे तुम्हारी चुनावों में मदद चाहिए।” कल्लू ने प्रस्ताव रक्खा था। “हमारा इस बार मुकाबला नारी शक्ति से है।” कल्लू जोरों से हंसा था। “और तुम तो जानते हो कि औरतों से कोई जंग नहीं जीत सकता।”

“फिर क्यों लड़ते हो काका?” मानस ने व्यंग किया था।

“तेरे बाप की खातिर!” कल्लू ने तुनक कर कहा था। “इसे सी एम और पी एम बनाना है बेटे।”

“सी एम और पी एम दोनों एक साथ कैसे काका?” हंस पड़ा था मानस।

“इसी को तो जादू कहते हैं बेटे।” कल्लू मानस को समझा रहा था। “ये जो पब्लिक है न मानस – जिसे तुम झूठी मूठी कहानियां दिखा कर पागल बनाते हो पॉलिटीशियन भी इसे सी एम और पी एम बन कर रिझाते हैं। कल क्या था मग्गू? और आज …?”

मानस चुप था। वह अपने कल्लू काका को जानता था।

और कल्लू भी मानस को खूब पहचानता था। नई-नई हीरोइनों के साथ ऐश अइयाशी करता मानस किसी को बुरा न लगता था। पों का माल पों में चला जाता था। मग्गू कमाता था और मानस उड़ाता था।

“इस बार तुम अपनी टीम को लेकर चुनाव में कूदो मानस।” कल्लू ने आग्रह किया था। “तुम तो जानते हो कि पब्लिक तुम लोगों की बातों पर यकीन करती है। तुम आ जाओगे तो सच में हम चुनाव जीत लेंगे मानस।” कल्लू अब गंभीर था।

अचानक ही मानस की निगाहों के सामने दो राजनीतिक दल आ खड़े हुए थे।

एक ओर उसके पापा माधव मोची थे तो दूसरी ओर प्रतिष्ठा के बाबूजी विलोचन शास्त्री खड़े थे। दोनों दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर प्रहार कर रहे थे। जीत हार की पतली रेखा टूट-टूट जाती थी। कभी लगता – माधव मोची एक दलित पब्लिक का सच्चा हितैषी था तो फिर लगता कि विलोचन शास्त्री – एक सच्चा समाज सेवी ही उनका भला बुरा सोच सकता था।

लेकिन मानस तय न कर पा रहा था कि वो कौन से दल के साथ था।

प्रतिष्ठा आई थी और अपने बाबू जी की बगल में जा खड़ी हुई थी। लेकिन वह न मुड़ा था। वह अपने पापा के पास नहीं गया था। वह दोनों दलों के बीच पड़ी विभाजन रेखा पर दोनों पैर जमा कर खड़ा रहा था।

“इसे तोड़ूंगा पहले।” मानस बार-बार कह रहा था। “पहले … पहले हम सब एक हो जाएं – तब …?” मानस प्रतिष्ठा को अपलक देख रहा था। प्रतिष्ठा को प्राप्त करना उसे अनिवार्य लगा था।

“अगर कल्लू काका को पता चला कि …?” मानस का हिया दरक गया था। “कल्लू काका भी तो इसी बीमारी में मरे थे।” मानस को याद था। उसे याद था जब कल्लू काका का उनकी प्रेमिका मुन्नी से विछोह हुआ था। तब से – हां तभी से तो इसी विभाजन रेखा ने उनका विछोह किया था। “तो क्या … तो क्या प्रतिष्ठा …?”

“मैं चुनावों में न आ पाऊंगा काका।” बड़े ही विनम्र भाव से मानस बोला था।

“चलो कोई बात नहीं।” कल्लू ने बच्चा मान मानस को माफ कर दिया था। “चुनाव तो हमने जीत ही लेना है।” कल्लू हंसा था।

मानस को कल्लू काका पर शक न था। कल्लू काका से लड़ कर कोई क्या जीत लेता? उनके पास तो हारने के लिए कुछ था ही नहीं।

लेकिन मानस किसी भी कीमत पर प्रतिष्ठा को हारना न चाहता था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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