बंबई के क्षितिज पर नारी शक्ति का नया-नया सूरज उग आया था। बबलू और पल्लवी ने नारी शक्ति अभियान को जान लड़ा कर चलाया था। उन्हें विश्वास था कि अगर नारी शक्ति अभियान जड़ें पकड़ गया तो पार्टी का कल्याण हो जाना था। नारी समाज का सही मायनों में आधा हिस्सा थी। अगर नारी समाज जागृत हो गया तो विलोचन शास्त्री की जीत पक्की थी।
पूरी बंबई में हर नुक्कड़ पर, हर गली में और हर मोहल्ले में नारी शक्ति के नाम का गुण गान हो रहा था। जगह-जगह पर नारी उत्थान, नारी कल्याण सभा और नारी निकेतन खुल गए थे। नारी शक्ति जैसे समाज के लिए एक नया वशीकरण मंत्र था और नई जागृति को जन्म दे रहा था। क्यों न नारी राजनीति में आए – नए प्रश्न थे।
प्रश्नों के उत्तर में अखबारों में अनेकों लेख छपे थे। भारी शब्दों में लिखा गया था कि ये वक्त है जब नारी को घर की चौखट लांघ कर खुले में आ जाना चाहिए और खुले आम राजनीति में शिरकत करनी चाहिए। लोगों ने इस नए विचार का जोशो-खरोश के साथ स्वागत किया था।
पल्लवी ने नारी शक्ति अभियान पर अपनी पकड़ बना ली थी।
जितनी भी नई पदाधिकारी बनाई गई थीं सबकी सब पल्लवी भाभी की ही चोइस की थीं। पल्लवी ने युवा महिला वर्ग को मुख्यतः चुना था। वो महिलाएं जो समय दे सकती थीं, जो समर्थ थीं, जो धनाढ्य थीं और वो जो राजनीति में रुझान रखती थीं – पल्लवी की पहली चोइस थीं।
आम सभाओं में पल्लवी की ही बात सुनी जाती। कभी-कभी या कहीं-कहीं विलोचन शास्त्री को चाय पर आमंत्रित किया जाता था। बबलू भी बैकग्राउंड में ही बना रहता था। मुख्यतः तो सारी कर्ता धर्ता तो नारियां ही होती थीं।
पुरुष कहीं दूर खड़े होकर तमाशबीनों की तरह होते सम्मेलनों और सभाओं को नई निगाहों से देखते रहते थे।
कभी कभार विलोचन शास्त्री सीता देवी को मनाते, बहलाते और खुशामद करते तभी वो उनके साथ बे मन ही सभा और सम्मेलनों में चली जातीं। उनका मन ही न होता कि वो घर से बाहर निकलें। लेकिन …
“हमने नारी शक्ति समाज के लिए पांच परसेंट सीटें सुरक्षित कर दी हैं।” विलोचन शास्त्री ने एक महत्वपूर्ण सूचना जुड़ी जंगी जनसभा में कह सुनाई थी।
खूब तालियां बजी थीं। विलोचन शास्त्री की जय-जयकार हुई थी। पल्लवी और बबलू बहुत प्रसन्न थे। पार्टी की शाख बढ़ रही थी। नारी शक्ति सम्मान को लेकर समाज में एक खुशनुमा बयार बह चली थी।
“कहती हो तो तुम्हें पोताला की सीट से चुनाव लड़ाने की बात चलाएं?” विलोचन शास्त्री ने सीता देवी को खुश करने की गरज से पूछा था।
“नहीं।” सीता देवी का सीधा उत्तर था। “मैं इन पचड़ों में नहीं पड़ती।”
“लेकिन क्यों? सीता, मेरी बात मानो। समय बदल रहा है। कल को पार्टी चुनाव जीतती है तो तुम्हें …”
“हारेगी पार्टी।” सीता देवी का कड़क उत्तर था।
विलोचन शास्त्री को लगा जैसे सीता ने अभी-अभी पार्टी को हारने का श्राप दे दिया था।
फटी-फटी आंखों से विलोचन शास्त्री सीता देवी को देखते रह गए थे।
“कमर कस लो भइया।” कल्लू मग्गू को चेतावनी दे रहा था। “इस बार मुकाबला मर्दों से नहीं नारियों से है।” वह तनिक हंसा था। “विलोचन तो नाम के हैं। सी एम तो पल्लवी भाभी बनेंगी। ले ली पार्टी चाचा से।” कल्लू ने हवा में हाथ फेंके थे। “इसे कहते हैं पॉलिटिक्स।”
“फिर हम क्या बनेंगे?” बहुत देर के बाद बोला था मग्गू।
“वही जो स्वामी जी ने बताया है।” कल्लू ने मग्गू को याद दिलाया था। “सी एम और उसके बाद पी एम।” जोरों से हंसा था कल्लू। “कुछ भी हो सकता है मग्गू।”
“मजाक कर रहे हो?” मग्गू गंभीर था।
चलती हवा का रुख मग्गू को भी महसूस हो रहा था। बबलू ने जो नया नारी संग्राम छेड़ दिया था काबिले तारीफ था। अगर पासा सीधा पड़ा तो विलोचन शास्त्री हरगिज न हारेंगे। उनके पास नारी शक्ति का मुकाबला करने के लिए कुछ था कब?
“मैं मजाक नहीं करता मग्गू, तुम जानते हो।” कल्लू मग्गू की ओर मुड़ा था। “मैं जो कहता हूँ उसे करता भी हूँ।”
मग्गू कुछ न बोला था। मग्गू के पास कहने को कुछ था भी नहीं। वह तो जानता था कि इस बार का मुकाबला कठिन था। वह जानता था कि लोग उससे ज्यादा खुश न थे। कल्लू ही एक था जो उम्मीदें बांधे था। लेकिन …
“लेकिन इस बार नारी शक्ति के सामने हमें कुछ नया स्वांग रचना होगा।” कल्लू गंभीर था। “कुछ ऐसा करना होगा मग्गू जिसे जनता लप्प से लपक ले।”
“मसलन …?” मग्गू ने सीधा कल्लू की आंखों में देखा था।
“मसलन कि सनातन।”
“क्या सनातन? धर्म के साथ राजनीति को न जोड़ो कल्लू।” मग्गू ने चेताया था।
“जोड़ेंगे।” कल्लू कूदा था। “जोड़ेंगे और खूब जोड़ेंगे। भगवा पहन लो। सनातनी बन जाओ। स्वामी जी की भविष्य वाणी को जाने दो हवा में। बताते हैं लोगों को कि माधव मोची दलित है। देश की मजबूरी है – दलित पी एम जरूरी है के नारे को जाने देते हैं।”
“चुनाव तो सी एम का है पागल।”
“मुझे सब पता है। नारे का अर्थ होगा सी एम तो तुम शर्तिया हो ही और आगे तुम्ही ने पी एम बनना है प्यारे। देखना, किस कदर हवा फिरती है। उड़ जाएगा तेरा विलोचन इस आंधी में और पल्लवी भाभी भी पत्ती सी डोल जाएगी। और …”
“कल्लू …!” गंभीर था मग्गू। “ये ट्रिक नहीं चलेगा।”
“चलेगा। चलेगा मेरे यार। संभावना ही तो सच होती हैं पागल। कल का क्या पता। कौन क्या बनेगा कोई नहीं जानता मेरे यार। हवा है … वक्त है … मौका है। मुंह खोलने में हमारा क्या खर्च होगा?”
“म … मैं तो कल्लू …”
“भगवा धारण कर लो। आज से ही। बनवा दूंगा कपड़े मैं खुद। तुम खड़े हो जाना मग्गू, मैं सब कुछ संभाल लूंगा।”
“जग हंसाई होगी कल्लू।” मग्गू ने गुहार लगाई थी। “लोग रंगा सियार बताएंगे। कोई भी वोट न देगा। मैं कहे देता हूँ कल्लू।”
“चूको मत मग्गू। चलो सत्ता में साझा करते हैं।”
“लेकिन कैसे?”
“हवा है। वक्त है। युग पलट रहा है। सनातन की बयार चल पड़ी है पगले। पहन ले भगवा।”
“लेकिन … लेकिन कल्लू …?”
“रंग देते हैं सनातन के रंग में पूरे विश्व को मग्गू। तुम आज मेरी बात मान लो।”
और मग्गू ने कल्लू की बात मान ली थी।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

