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स्वामी अनेकानंद भाग 42

Swami Anekanand

सतत प्रयत्न करने के बाद भी मानस प्रतिष्ठा की बंबई लौटने की जिद को तोड़ नहीं पाया था।

राधू रंगीला निठल्ला बैठा गूलर खा रहा था तो पूरा हुस्न परी फिल्म का क्रू मातम मना रहा था। चलता काम रुक गया था। राधू की रिद्म टूट रही थी। वह बेकल हुआ बैठा था।

“अगर तुम बंबई चली जाती हो प्रतिष्ठा तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा।” मानस ने अंतिम गुहार लगाई थी। वह गंभीर था। वह तो लड़ना चाहता था …

“मेरे मां बाबूजी से बड़ा मेरे लिए और क्या हो सकता है मानस।” प्रतिष्ठा का प्रश्न था। “उनके सुख दुख में मैं अगर …”

“मैंने मना कब किया है?” मानस मान रहा था। “लेकिन शूटिंग बंद होने का मतलब होगा टोटल डिजास्टर। मैं खत्म हो जाऊंगा प्रतिष्ठा, प्लीज … समझो …”

“लेकिन …”

“लेकिन ये कि यूरोप की शूटिंग के बाद पंद्रह दिन का ब्रेक है। सभी छुट्टी पर होंगे। तब हम भी बंबई पहुंच कर …”

“मां का रोना मुझसे सहा नहीं जा रहा मानस।” प्रतिष्ठा की आंखों में आंसू थे। “मैं भूल नहीं पाती। शूटिंग भी होगी तो मैं …”

“यूं समझो प्रतिष्ठा कि आज खाली हाथ बंबई जा कर क्या बिगाड़ लोगी बबलू और पल्लवी का। लेकिन कल – जब हमारी फिल्म हुस्न परी रिलीज हो जाएगी, हिट हो जाएगी तो तुम स्टार होगी माई डार्लिंग। बबलू और पल्लवी स्वयं सरेंडर कर देंगे माई डियर। समझो प्रतिष्ठा …”

“क्या समझूं …”

“यूं समझो … कि एक दिन वो था प्रतिष्ठा जब मेरे बाबूजी मच्छी टोला के नुक्कड़ पर बैठ लोगों के जूते गांठते थे और पॉलिश करते थे। परिवार की रोटी जुटाने के लिए न उनके पास रोजगार था न कोई जायदाद थी। खाली हाथ थे।”

“क्या …?” चौंकी थी प्रतिष्ठा।

“हां डियर। ये सच है। और अगर तुम चली जाती हो तो ये दूसरा सच होगा जब फिर से हम सड़क पर होंगे।”

प्रतिष्ठा सकते में आ गई थी। उसे याचक बना मानस अचानक ही अच्छा लगा था – बहुत अच्छा।

“करते हैं काम।” प्रतिष्ठा ने हामी भर दी थी।

हुस्न परी फिल्म के एकत्रित हुए कलाकार और रचनाकार खुशी से झूम उठे थे।

राधू रंगीला ने लंदन को पहले कवर किया था। विश्व विख्यात लंदन और वहां का बकिंघम पैलेस आज भी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। आज भी लोग जानते थे कि कभी ब्रिटिश के साम्राज्य में सूरज न डूबता था।

“मुझे सूना-सूना क्यों लग रहा है लंदन?” प्रतिष्ठा ने जब संवाद बोला था तो राधू रंगीला बिगड़ गया था। “क्या हो गया प्रतिष्ठा?” उसने कड़क आवाज में कहा था। “संवाद में संवेदना लाओ भाई!” राधू ने सुझाव दिया था। “ये चमन यूं ही नहीं उजड़ा है।” वह बता रहा था। “वक्त गोता मार गया, तो सम्राट क्या करते?” राधू तनिक मुसकुराया था। “इस तरह कहो इस कहानी को …” उसने प्रतिष्ठा को फिर से संवाद बोलने का आग्रह किया था।

और जब मुड़ कर प्रतिष्ठा ने संवाद बोला था तो तालियां बजी थीं।

“वक्त ने ही उजाड़ा है इस उपवन को मेरी मलिका।” मानस ने उत्तर दिया था। “हम लड़े तो थे लेकिन हमारे हथियार झूठे पड़ गए थे।” मानस के चेहरे पर जो बेबसी धरी थी – बेजोड़ थी।

“खूब कहा शहंशाह।” राधू रंगीला ने खुश हो कर आज की शूटिंग समाप्त कर दी थी।

प्रेम गीत फिल्माने के लिए राधू रंगीला की टीम स्विट्जरलैंड पहुँच गई थी।

गीत के बोल मानस की विशेष फरमाइश पर बिंदास ने लिखे थे। मानस चाहता था कि प्रेम गीत के बोल और म्यूजिक कैची हो। गीत हिट होने पर फिल्म के हिट होने का चांस बढ़ जाता है – मानस अभी तक के अनुभव से जानता था।

प्रतिष्ठा को गीत का फॉरमेट मिला था। उसे गीत के बोल मन में गा-गा कर दिमाग में बिठा लेने थे ताकि शूटिंग के दौरान निर्बाध गति से गीत बहे होठों के हिलने के साथ-साथ।

गीत बिंदास ने प्रचलित शब्दों में बांधा था – हुस्न परी तू – हुस्न की देवी। प्रेम देवता – प्रेम पुरुष तुम। प्रेम नगर की कठिन डगर पर। दौडे दो दीवाने – हम तुम – हम तुम। साथ रहेंगे साथ मरेंगे हम तुम हम तुम। गीत का म्यूजिक राकेश ने गढ़ा था और अब डायरेक्टर राधू रंगीला ने इस गीत के सारे अवयव जोड़ तोड़ कर साथ बिठाने थे।

“मुझे तो ये गीत वीत कुछ जमता नहीं है राधू जी।” प्रतिष्ठा ने साफ-साफ इजहार किया था। “मेरी समझ से तो सब कुछ बाहर है।” वह हंस रही थी।

“यही तो शुभ है।” राधू ने भी विहंस कर कहा था। “दिखना तो सब कुछ मुझे चाहिए मैडम और उसे मैं परदे पर चलते फिरते देख रहा हूँ।”

“क्या देख रहे हैं?” प्रतिष्ठा ने पूछा था।

“यही कि जब गीत परदे पर बजेगा तो लोग सिनेमा हॉल में खड़े हो कर डांस करेंगे। देख लेना आप …” राधू ने गारंटी दी थी।

और जब गीत को लेकर शूटिंग शुरु हुई थी तो प्रतिष्ठा को और भी निराशा हुई थी।

“ये क्या कर रहे हैं हम?” प्रतिष्ठा ने मानस से पूछा था। “गीत की टांग कहीं है तो सर कहीं और दिखता है। तुम कहीं होते हो मैं कहीं और, ये क्या कैमिस्ट्री है मानस?”

“ये तो राधू ही बता सकता है डियर।” जब तक पूरा गीत एडिट हो कर न आएगा – समझ न आएगा। मुसकुरा रहा था मानस।

अब अकेले में बैठी प्रतिष्ठा सोच रही थी कि प्रेम जिसे वो जानती थी वो तो उसे अभी तक कहीं नजर नहीं आया था। जो स्पर्श सुख था और जो संवाद का आनंद प्रेम से मिलता था उसके तो अभी तक दर्शन ही न हुए थे। वह मानस से प्रेम करती थी। लेकिन … लेकिन प्रेम का प्रदर्शन नहीं करती थी। जबकि राधू …?

“यों मानिए मैंडम कि प्रेम एक साबुत कांच की बोतल है।” राधू प्रतिष्ठा को एकांत में बैठ समझा रहा था। “मैंने कांच की बोतल को फर्श पर दे मारा तो बोतल किरच-किरच हो गई। अब मैं उन बिखर गई किरचों को जोड़ कर फिर से बोतल का निर्माण करता हूँ तो कैसा लगेगा?”

“बकवास।” प्रतिष्ठा ने मुंह बिचकाया था। “प्रेम महसूस करने की एक पवित्र भावना है मिस्टर।” प्रतिष्ठा नाराज थी। “और ये जो तुम कर रहे हो ये कोई मजाक है।”

“और यही मजाक जब पर्दे पर प्रदर्शित होगा मैडम तो आप भी नाचेंगी – मेरी गारंटी है।” राधू खुल कर हंसा था। “यही तो अभिव्यक्ति की आर्ट है। यही तो है जो हर कोई नहीं देख सकता।”

प्रतिष्ठा ने निश्चय किया था कि वो वही करती रहेगी जो राधू कहेगा। वह नहीं चाहती थी कि मानस का खेल बिगड़ जाए।

एक सप्ताह के सतत प्रयत्नों के बाद राधू रंगीला ने गीत को डब्बे में बंद कर चुपचाप सहेज लिया था।

अब राधू रंगीला ने फ्रांस, जर्मनी, इटली और पोलैंड में जा कर लोकेशन शूटिंग करनी थी।

यह एक ऐसा दौर था जहां सब कुछ राधू रंगीला की आंख के नीचे होना था। उसने वो सब कैमरे में कैद करना था जो बेजोड़ था, अलग था और लाजवाब था। राधू का कैमरा भी तो कमाल का था। वो अपने उन शॉट के लिए विख्यात था जो लीक से हट कर होते थे।

मानस खुश था। उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि उसका भाग्य इस बार जरूर उसका साथ देगा।

“फिल्म रिलीज होने से पहले वैष्णों देवी चलेंगे प्रतिष्ठा।” मानस ने बताया था। “मैंने बोला है मां को कि …”

“तुम भी …?” प्रतिष्ठा ने प्रश्न पूछा था।

“बिना इनके कुछ होता नहीं डार्लिंग।” मानस ने प्रतिष्ठा की आंखों में देखा था। “मैं अब इन्हें मानता हूँ।”

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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