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स्वामी अनेकानंद भाग 40

Swami Anekanand

“क्यों न हम भी एक वूमन सैल खोल दें बबलू भैया?” धूमिल दूर की कौड़ी लाया था। “मैंने भी महसूस किया है कि क्यों न हम भी नारी शक्ति का पॉलिटिक्स में प्रयोग करें?” उसका प्रश्न था।

बबलू धूमिल को बड़ी देर तक देखता रहा था। जो धूमिल कह रहा था उसमें बबलू को संदेह तो न था पर उसका मन महिलाओं की ओर से कभी आश्वस्त न होता था। पॉलिटिक्स गंभीर विषय था। जबकि नारी शक्ति की पहुंच बहुत घरेलू थी।

“ये लोग का मन मस्तिष्क कहां चलता है राजनीति में?” बबलू कुछ सोच कर बोला था।

“क्यों भैया! इंदिरा गांधी …” धूमिल ने जोर दे कर पूछा था।

बबलू अचानक ही घिर गया था। वह निरुत्तर हो गया था।

“पल्लवी भाभी को लाते हैं।” धूमिल का अगला सुझाव था। “इनका तो पूरा परिवार ही पॉलिटिक्स में है। वूमन सैल चलाएं और समाजवादी का गौरव बढ़ाएं।” हंस रहा था धूमिल।

धूमिल की सलाह बबलू को जंच गई थी।

“पुरोहित जी।” बबलू ने अपने मन की बात को पार्टी के लोगों के बीच खोला था। “वूमन सैल बनाने का सुझाव आया है – पार्टी के लोगों का। उनका मानना है कि आज की नारी शक्ति का प्रयोग अगर पॉलिटिक्स में भी किया जाए तो …?”

“हां! सही बात है। वोट परसेंटेज तो अवश्य बढ़ेगा।” मान रहे थे कमला पुरोहित। “मैं तो कहूंगा कि विचार बुरा नहीं है। पल्लवी भाभी हैं। संभाल लेंगी वूमन सैल।” कमला पुरोहित ने पुरजोर समर्थन किया था नए विचार का।

और जब बबलू ने इसी विचार का जिक्र पल्लवी – अपनी पत्नी से किया था तो बात बन गई थी। पल्लवी ने सहर्ष कहा था – वूमन सैल चलाने और साथ में गारंटी भी दी थी पार्टी को अगला चुनाव जिताने की।

बबलू का मन भी प्रसन्न हो गया था। राजनीति का ये एक नया अध्याय था जो समाजवादी पार्टी खोलने जा रही थी।

देखते ही देखते पार्टी में एक नई क्रांति की तरह वूमन सैल पहुंच गई थी।

वूमन सैल का नया दफ्तर हैली रोड़ पर अलग से बनाया गया था। पूरी बिल्डिंग को फिर से सजा वजा कर ऑफिस की शक्ल दे दी थी। रामू पनवाड़ी ने पूरा दमखम लगा कर इस ऑफिस को एक आदर्श की तरह पेश किया था।

प्रेस और अखबारों को ये एक नया आइटम वूमन सैल लिखने और कहने सुनने को मिल गया था। पूरे शहर में इसकी चर्चा थी। नारी शक्ति का अनुमोदन सारे समाज ने किया था। नारियां भी अलग से उत्साहित थीं। उन्हें भी घर की चौखट लांघने का अवसर मिलने जा रहा था। वो भी अब देश के अच्छे बुरे में शामिल होना चाहती थीं – गा बजा कर।

वूमन सैल के उद्घाटन का समय पांच तारीख इतवार का बना था। छुट्टी थी। नर नारी सभी आ सकते थे।

वूमन सैल के ऑफिस के उद्घाटन की सूचना और आने के लिए निमंत्रण पत्र ले कर बबलू और पल्लवी सजवज कर विलोचन विला में चार तारीख की शाम को दाखिल हुए थे।

“आप के कर कमलों द्वारा उद्घाटन होना है।” बबलू ने सीता देवी के चरण स्पर्श किए थे और आने का निवेदन किया था। “नया चलन है चाचा जी!” उसने विलोचन शास्त्री को संबोधित किया था। “पीछे छूटने में कोई फायदा नहीं। अत: मैंने …”

“ये बहुत अच्छा काम किया बेटे।” विलोचन शास्त्री बेहद प्रसन्न थे। उन्हें बबलू के इस तरह के किए प्रयोग अच्छे लगते थे।

लेकिन जब विलोचन शास्त्री ने सीता देवी के रौद्र रूप का अवलोकन किया था तो उनकी सांस रुक गई थी।

बबलू और पल्लवी को खुशी-खुशी विदा करने के बाद विलोचन शास्त्री ने महसूसा था कि एक काटने वाला सन्नाटा उनके साथ लौटा था और घर में भर गया था। सीता देवी बुझ सी गई थीं। बुझते दीपक की चिरआंध को सूंघ विलोचन शास्त्री खबरदार हुए लगे थे।

“क्यों, क्या हुआ?” विलोचन शास्त्री ने सीता देवी के उजाड़ चेहरे को देख प्रश्न पूछा था।

“जो नहीं होना चाहिए था।” सीता देवी की आवाज तल्ख थी। लगा – वो नाराज थीं। “ये हमें पूछ तो लेते?” सीता देवी का उलाहना आया था। “पार्टी के व्यवस्थापक आप हैं और आप को ही पता तक नहीं कि …”

“क्या फर्क पड़ता है सीता।” विलोचन शास्त्री ने सहज होने का प्रयत्न किया था। “वो शायद हमें सरप्राइज देना चाहते थे।” तनिक हंसने का प्रयत्न किया था विलोचन ने।

“नहीं। हमें धोखा देना चाहते थे। गुपचुप चाल चलना चाहते थे कि …”

“अरे, नहीं भाई। बबलू तो बड़ा ही …”

“चालाक है। चोर है। पार्टी को खा रहा है। और हमारा उल्लू बना रहा है।” सीता देवी एक ठहरे ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी थीं। “और आप … आप …” गला भर आया था सीता देवी का।

अचानक ही विलोचन शास्त्री की जैसे नींद खुली थी, और सीता देवी ने जो विलाप किया था वह कितना टिकाऊ था, वह सोचने लगे थे।

“बबलू को बचपन से मैं जानता हूँ।” विलोचन शास्त्री अब अपना पक्ष सामने धर रहे थे। “निहायत ही ईमानदार लड़का है। लोग उसकी कद्र करते हैं भाई।”

“लेकिन मैं नहीं करती।” सीता देवी कूद कर आंगन में जा खड़ी हुई थीं। “उसकी मीठी मुसकान के पीछे विषैले दांत छुपे हैं। आप तो …”

“अरे भाई। मुझे पार्टी चलानी है।” विलाप सा कर रहे थे विलोचन। “बबलू के बिना मैं …”

“यही तो वह जानता है। तभी तो उसने पूछा तक नहीं और अपनी पत्नी को वूमन सैल पकड़ा दी। कल को पार्टी इनकी हो गई। हमारा क्या है? एक बेटी है और वो भी …” निराशा टपक रही थी सीता देवी की आंखों से। “बाप बेटी दोनों ही …” जोर दे कर कहा था सीता देवी ने।

फोन बजा था। विलोचन जानते थे कि प्रतिष्ठा का फोन होगा। यही समय था जब रोज उसका फोन आता था। आज उन्होंने फोन नहीं उठाया था। फोन सीता देवी ने उठाया था और पूछा था – कौन?

“मां। मैं प्रतिष्ठा बोल रही हूँ।” फोन पर आवाज आई थी।

“तू कब लौट रही है?” सीता देवी का प्रश्न अटपटा था।

“म …मैं तो मां …”

“जब सब चौपट हो जाएगा तब आएगी?” तमतमा कर सीता देवी ने पूछा था। “दोनों बाप बेटी …” सीता देवी रोने लगी थीं।

देर रात गए विलोचन शास्त्री ने जैसे तैसे सीता देवी को कल के फंक्शन में जाने के लिए राजी कर लिया था।

“कुछ कहना होगा तो सोच समझ कर कहेंगे सीता।” उन्होंने आश्वासन दिया था। “पार्टी तो हमारी है। करता धरता और प्रवक्ता तो मैं हूँ पार्टी का। बबलू को तो कोई जानता तक नहीं। नाम विलोचन शास्त्री का है बबलू का नहीं। फिक्र मत करो। आइंदा मैं …”

सीता देवी अभी भी चुप थीं।

“कल कोई स्यापा मत खड़ा करना सीता।” पार्टी की शाख खत्म हो जाएगी।” विलोचन शास्त्री ने कलह का परिणाम बताया था।

सीता देवी का मुंह बंद करने के लिए इतना कहना जरूरी था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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