हिरन गोठी की बारह एकड़ जमीन का पट्टा जन कल्याण आश्रम के नाम लिख गया था। जमीन के बीचों बीच खडे होकर राम लाल ने उसके विस्तार को बड़े चाव से आंखों में समेट लिया था। जीवन का यह पहला पल था जब वह जमीन से जुड़ा था।
किस तरह उसने अपनी पहली कमाई बर्फी के नाम लिख दी थी – उसे सहसा याद हो आया था।
बारह एकड़ जमीन में खड़े पेड़, उगी झाड़ियां, घास और यहां तक कि जहां तहां बिखरा पड़ा मलबा भी उसे बेहद अपना लगा था। आज पहला मौका था जब वो एक से आगे दो हुआ था। और अब … “अब मिली है मंजिल” राम लाल ने स्वयं से कहा था और मुसकुराया था। “अब … अब बसाउंगा इसे।” उसने वायदा किया था। “अब तक तो पराई गाय के लिए पाला काटा।” वह हंस गया था। बर्फी दगा खेल गई – उसे आश्चर्य हुआ था।
राम लाल अब जमीन को खाली न छोड़ना चाहता था। वह चाहता था कि तुरंत ही कोई ऐसा उपाय करे जो वह जमीन पर काबिज हो जाए। हक सच्चा और झगड़ा झूठा होता है – राम लाल अब अनुभव से जानता था।
हिरन गोठी कैंप – राम लाल की समझ खुली थी। क्यों न पूरे प्लॉट में एक कैंप लगाया जाए? होटल से बाहर निकलते हैं। अपना ठिकाना बनाते हैं। लेकिन धन माल तो चाहिए था। अचानक उसे कल्लू याद आ गया था। कल्लू ही करेगा ये करिश्मा, राम लाल समझ रहा था।
“अब क्या मुश्किल है गुरु?” कल्लू कूदा था। “अब तो ठाठ बना धरा है।” उसने हामी भरी थी। “अखबार में इश्तहार दे देते है। आ जाएंगे ठेकेदार। पैसे लेकर चली आएगी पब्लिक।”
बात पते की थी। इश्तहार देते ही ठेकेदारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
“मैं आपको कैंप बना कर देता हूँ।” मानिक लाल ने ठेका लेने की बात की थी। “दस परसैंट मैं लूंगा।” उसकी डिमांड थी।
“ले लेना भाई।” कल्लू फौरन मान गया था। “लेकिन धर्म का काम है प्यारे।” कल्लू ने सचेत किया था मानिक लाल को। “बेईमानी की तो जूते बहुत पड़ेंगे।” कल्लू ने आंखें तरेरी थीं।
“मालिक। कैसी बातें करते हैं। हमारी भी शाख है बंबई शहर में। किसी नुक्कड़ पर जा कर पूछ लेना मानिक लाल को।”
“ठीक है भाई।” राम लाल बीच में बोला था। “लेकिन हमें काम जल्दी चाहिए। श्रद्धालुओं की भीड़ समा नहीं पा रही है होटल में। अब वहां जगह नहीं है।”
“आपको फिकर करने का नहीं मालिक। रोकड़ा आया नहीं कि काम हुआ नहीं।” मानिक ने खास बात बता दी थी।
“कल्लू। अब तुम संभालना होटल, आनंद और कदम संभालेगा …”
“कदम को आनंद सोंप दो गुरु।” कल्लू ने बात काटी थी। “मैं होटल और बाकी का काम संभालूंगा। मुझे मग्गू का काम भी तो करना है।” उसने राम लाल को याद दिलाया था।
एक अलग और अजब दुनिया उठ खड़ी हुई थी। और राम लाल देखता रहा था।
मानिक लाल ने वास्तव में ही कमाल कर दिया था। जन कल्याण कैंप क्या था – जन्नत थी। सारी सुविधाएं थीं श्रद्धालुओं के लिए। और राम लाल को भी एक बढ़िया ऑफिस बना कर दिया था। जितनी भी सेवादारों ने दुकानें खोली थीं, राम लाल को मुंह मांगे पैसे दिए थे। सारी जन सुविधाओं का पूरा-पूरा खयाल रक्खा था मानिक लाल ने।
अब राम लाल कैंप ऑफिस में बैठ पर्चियां बनाता था।
स्वामी अनेकानंद को इस नए ठिकाने की हवा तक न लगी थी।
मग्गू ने कई बार कल्लू को पुकारा था और पूछा था कि स्वामी जी ने विलोचन शास्त्री को क्या आशीर्वाद दिया था? लेकिन कल्लू हर बार वार बचा जाता था। मग्गू को फिर से चिंता होने लगी थी। हिरन गोठी की जमीन का पट्टा होने के बाद उसे चिंता थी कि मानस को क्या जवाब देगा?
वक्त मग्गू की मुट्ठी से फिसलता ही चला जा रहा था।
एक लंबी चौड़ी कार होटल माधव मानस इंटरनैशनल की पोर्टिको में आ कर रुकी थी।
होटल में गजब की गहमा गहमी थी। भीड़ इतनी कि आदमी से आदमी टकरा रहा था। स्वामी जी अपनी सीट पर विराजमान थे। श्रद्धालुओं का जमघट जोरों पर था।
“मालिक आए हैं।” होटल में संदेश करेंट की तरह दौड़ा था।
होटल का सी ई ओ दौड़ा भागा मालिक के स्वागत के लिए हाजिर हुआ था। आज मालिक बड़े दिनों के बाद दिखे थे। बीमार थे – सभी जानते थे। सी ई ओ मिस्टर गुलिया ने उन्हें सादर प्रणाम किया था और खैरियत पूछी थी।
“अब तो स्वस्थ हैं आप?” गुलिया ने मुसकुराते हुए पूछा था।
“कहां …!” कठिनाई से कहा था माधव ने। “चला फिरा नहीं जाता।” उन्होंने शिकायत की थी। “आप कैसे हैं?” उनका प्रति प्रश्न आया था।
गुलिया साहब मालिक के प्रश्न का उत्तर ले कर आए थे।
“अब तो प्रोफिट में हैं।” गुलिया साहब बोले थे। “अच्छा चल पड़ा है काम।” उन्होंने बताया था। “नई मंजिल भी भरी है।” उन्होंने सूचना दी थी।
माधव दो चार कदम होटल की लिफ्ट तक चले थे। चांदी की छड़ी का सहारा ले कर वो आहिस्ता से लिफ्ट में चढ़े थे और ऊपर अपने ऑफिस में पहुंचे थे। ऑफिस के स्टाफ ने उनके चरण छूए थे। उन्होंने आशीर्वाद दिया था।
“कल्लू को बुलाओ।” माधव ने धीमे और मीठे स्वर में आदेश दिया था।
कल्लू तल्लीनता से स्वामी जी के साथ श्रद्धालुओं को सुलझाने में व्यस्त था।
“मालिक आए हैं।” कल्लू के कान में कदम ने कहा था। “बुलाया है।” उसने आदेश कह सुनाया था।
पहली बार था आज कि कल्लू के पसीने छूट गए थे। उसे एकाएक बोध हुआ था कि उसका यार मग्गू इस होटल का मालिक माधव मोची था।
आनंद को अकेला छोड़ वह सीधा मालिक के ऑफिस में हाजिर हुआ था।
“काम ज्यादा है?” कल्लू को आया देख मग्गू मुसकुराया था। उसका प्रश्न अर्थ पूर्ण था।
“सो तो है।” कल्लू तनिक हिला था। “लेकिन … तुम्हारा … माने कि आपका काम भी हो गया है।” कल्लू ने बड़ी चालाकी से बात को घुमाया था। “सोच रहा था कि … घर आउंगा तो एकांत में बातें होंगी।”
“यहां भी तो पूर्ण एकांत है।” हंसा था माधव मोची। “चाय पीते है – सुकून से।” उसने प्रस्ताव रक्खा था। “फिर …?” माधव ने सीधा कल्लू की आंखों में देखा था।
चाय आई थी। होटल की चाय और घर की चाय में फर्क था। कल्लू भी अब जानता था कि एक पांच सितारा होटल के मालिक की हैसियत क्या होती है।
“स्वामी जी ने विलोचन शास्त्री को श्राप दे दिया है।” कल्लू ने धीमे से मग्गू को बताया था।
“कैसा श्राप?” माधव ने प्रश्न किया था।
“कहा है कि विलोचन शास्त्री का कोई बहुत अपना उसके साथ विश्वासघात करेगा।”
“तो क्या होगा?”
“विलोचन के मन में शंका पैदा होगी – अपनों के प्रति। और शंका …” कल्लू चुप हो गया था। वह उत्तर देने में अटक गया था।
“बना रहे हो …?” माधव मोची की आवाज गुरु गंभीर थी।
“न … नहीं।” कल्लू घबरा गया था। “स्वामी जी का कहा सच होता है।” कल्लू ने होश संभाला था तो बोला था। “आप को जो कहा है वो …” कल्लू ने माधव को याद दिलाया था कि स्वामी जी ने उसे सी एम और पी एम बनने का आशीर्वाद दिया था जबकि शास्त्री को श्राप दिया था।
“चुनाव हारा तो …?”
“किसने कहा? कौन कहता है!” कल्लू भावुक था। “मैं … मैं अपनी जान लड़ा दूंगा।” कल्लू ने छाती ठोकी थी। “चुनाव मैं जीतूंगा।”
माधव को अचानक ही अपना जिगरी यार कल्लू दिख गया था।
जुदा होने से पहले दोनों बांहें पसार कर मिले थे।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

