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स्वामी अनेकानंद भाग 31

Swami Anekanand

माधव मोची सफेद परिधान में सजा वजा स्वामी अनेकानंद के सामने संस्कार प्राप्त करने आ बैठा था।

पांच सितारा होटल – मानस माधव इंटरनैशनल भीड़ से खचाखच भरा था। लोग जिज्ञासु थे ये जानने के लिए कि आखिर स्वामी माधव मोची के बारे क्या भविष्य वाणी करने वाले थे। माधव मोची विधायक थे। लोगों के नेता थे। देश का भविष्य थे। और जनता के लिए जरूरी पुरुष थे।

स्वामी अनेकानंद ने माधव मोची को निगाहें भर कर देखा था।

स्वामी अनेकानंद ने महसूसा था कि माधव मोची के बारे जो भी कल्लू ने बताया था वह सारा सच था। कल्लू से ज्यादा शायद कोई ही था जो माधव मोची को जानता था। कल्लू माधव मोची के हर भले बुरे में शामिल रहा था। और जो कुछ माधव मोची को उन्होंने बताना था वो भी कल्लू का ही कहा था। स्वामी अनेकानंद का हिया एक बारगी कांप उठा था। उन्होंने अडिग भव्यता से आसन पर बैठे राम लाल को उड़ती निगाहों से देखा था।

राम लाल ने इशारों इशारों में ही सहमति जताई थी।

“आप एक परोपकारी पुरुष हैं।” सधी ठहरी आवाज में आनंद ने कहना आरंभ किया था। वह भूल ही गया था कि वह स्वामी अनेकानंद का किरदार निभा रहा था।

तभी बगल में बैठे कल्लू ने आनंद को कंधा मार सचेत कर दिया था।

“आपके संस्कार श्रेष्ठ हैं।” अब स्वामी अनेकानंद बोल रहे थे। “परमात्मा ने आप को पृथ्वी पर लोगों के दुख हरने को भेजा है।” स्वामी जी ने कहते हुए पूरी जमा पब्लिक को निगाहों में भर कर देखा था।

कल्लू ने तालियां बजाई थीं तो भीड़ भी तालियां बजाने लगी थी।

“आप का सत्ता में साझा है।” स्वामी अनेकानंद ने इस बार माधव मोची को सशरीर सामने बैठा पाया था। “आप सी एम बनेंगे .. आप पी एम बनेंगे .. और आप ..” रुक गए थे स्वामी जी।

तभी कल्लू जोरों से बोल पड़ा था – माधव मोची …? उत्तर आया था – जिंदाबाद-जिंदाबाद! कौतूहल था। कोहराम था। हवा थी – माधव मोची की लौट आई हवा। वह पुरानी हवा जब माधव मोची लोगों का सर्व प्रिय नेता था।

माधव मोची के पुराने पाप धुल गए थे – कल्लू ने कन्फर्म कर दिया था।

स्वामी अनेकानंद ने कल्लू की आंखों को पढ़ा था। अब अगला संदेश क्या जाना था – वह जान लेना चाहते थे।

“मेरा आशीर्वाद सदा सहाय होगा – आपको।” स्वामी जी ने माधव मोची के सर पर हाथ धरा था। “प्रभु आपसे प्रसन्न हैं।” उन्होंने मुसकुराते हुए कहा था। “ये लीजिए। प्रभु ने अपने पायक हनुमान जी को आपकी सहायतार्थ भेजा है।” स्वामी अनेकानंद ने अपना दाहिना हाथ हवा में लहराया था और हनुमान जी की मिनी मूर्ति को माधव मोची की हथेली पर रख दिया था।

तालियों की गड़गड़ाहट ने समूचे परिदृश्य को हिला दिया था।

“और ये विभूति लीजिए।” स्वामी अनेकानंद ने विहंसते हुए कहा था। “मस्तक पर चढ़ाइए।” उनका आदेश था। “हनुमान जी का स्मरण कीजिए।” वो बता रहे थे। “सदा सहाय होंगे आपके – प्रभु के सेवक हनुमान जी। आप इन्हें हमेशा धारण करेंगे – श्रीमान माधव जी।” स्वामी जी ने अपनी बात समाप्त की थी।

माधव मोची का चेहरा चमक उठा था। उसकी आंखों में एक अलौकिक आभा उग आई थी। माधव की काया में जो स्फूर्ति व्याप्त हुई थी अवर्णनीय थी। उसने काया कल्प होते महसूस किया था और उसे एहसास हुआ था कि कुछ था – कुछ ऐसा अनूठा था – जो उसके अंदर बाहर अभी-अभी व्याप्त हो गया था।

आनंद ने भी इस चमत्कार को खुली आंखों देखा था।

उसने महसूस किया था कि ये सब झूठ नहीं था। उसे अनुभव हुआ था कि माधव मोची ने जो लाभ प्राप्त किया था वो सच था। वह घटेगा – जरूर घटेगा – आनंद इसे मान रहा था। राम लाल निरा अनाड़ी न था। इस खेल का तो वह पक्का खिलाड़ी था। उसे विश्वास था कि जो कुछ स्वामी अनेकानंद कहेंगे – वह घटेगा जरूर।

सूत्रधार राम लाल ने आज आनंद को बाल ब्रह्मचारी स्वामी अनेकानंद का अवतार घोषित कर दिया था।

जैसे ही मानस मोची आशीर्वाद लेने स्वामी अनेकानंद के सामने उजागर हुआ था वैसे ही उसके सहयोगी और साथियों के जमा हुजूम ने तूफान ला दिया था।

सामने आशीर्वाद लेने आ बैठे युवक मानस मोची को स्वामी अनेकानंद ने बड़े चाव से देखा था। हमउम्र ही था मानस, उन्हें जंच गया था। लेकिन मानस का रुतबा और रुबाब कहीं से स्वामी अनेकानंद को छू गया था। चरण स्पर्श करते मानस को उन्होंने आशीर्वाद तो दिया था लेकिन बदले में कुछ लिया भी था। अचानक ही आनंद को अपनी संघर्ष करती बूढ़ी मां याद हो आई थी। और उसका छोटा भाई बिल्लू आ कर उसकी गर्दन से लिपट गया था। दो अलग-अलग संसार थे जो रात दिन की तरह कहीं मिलते न थे।

“अपने नाम का उच्चारण करो।” स्वामी अनेकानंद ने मानस को आदेश दिया था।

“मानस मोची।” बड़े ही विनम्र भाव से मानस ने उत्तर दिया था।

“संघर्ष समाप्त हो रहा है।” स्वामी जी ने मानस को पहली सूचना दी थी। “विरोधियों के होंसले पस्त हो रहे हैं। सहयोगियों के हौसले बुलंद हैं।” तनिक मुसकुराए थे स्वामी जी।

कल्लू का चेहरा अलग से दीप्तिमान हो उठा था। इस बार आनंद का अंदाज अनोखा था। उसने आसन पर बैठे गुरु राम लाल को प्रशंसक निगाहों से बधाई दी थी।

“आप का अपना कोई आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा।” स्वामी जी ने कुछ सोच कर कहा था। “परेशान तो होंगे आप पर आपका शुभचिंतक कोई बुजुर्ग सहायतार्थ आगे आएगा।” कहते हुए स्वामी जी ने नेत्र बंद कर कुछ भविष्य में खोजा था। “आपके कार्य कौशल की प्रशंसा होगी।” स्वामी जी ने प्रसन्न होते हुए कहा था। “सहयोगियों से संबंध सुदृढ हो जाएंगे।” उन्होंने घोषणा की थी।

मानस का मन बल्लियों कूद रहा था। उसे झंझट और झमेलों में पड़ी अगली प्रोजैक्ट याद हो आई थी। अगर बेल मढे चढ़ गई तो वारे के न्यारे थे – वह जानता था।

“आपकी लव लाइफ में अब रौनक लौट आएगी।” हंसते हुए स्वामी जी बोले थे।

मानस को अपना आस पास उजालों से भर गया लगा था। कब से मांग रहा था वो दुआएं – अपने प्रेम प्रसंगों के प्रतिफलित होने की। प्रतिष्ठा का हुस्न उसकी आंखों में लरक कर रह गया था।

“तीन जन्मों से आप लोग साथ-साथ चले आ रहे हैं।” स्वामी जी ने नेत्र बंद करते हुए कहा था। “लेकिन इस जन्म में मिलन बिछोह का दोष समाप्त हो जाएगा।” स्वामी जी ने घोषणा की थी। “संबंध भी मधुर हो जाएंगे और मनोरथ भी सिद्ध होंगे।”

मानस का मन हुआ था कि स्वामी जी के एक बार फिर चरण स्पर्श करे लेकिन वह तटस्थ ही बना रहा था।

“लक्ष्मी जी सदा सहाय।” स्वामी जी विहंस कर बोले थे। “कार्य सिद्धि के लिए आपको मां लक्ष्मी की आवश्यकता होगी।” स्वामी जी ने बताया था। “अत: ये लक्ष्मी मां पहुंचेंगी आप के पास।” स्वामी जी ने अपना दाहिना हाथ हवा में लहराया था और मिनी लक्ष्मी की मूर्ति मानस की हथेली पर रख दी थी। “इन्हें आदर सम्मान से माथे चढ़ाएं और हमेशा अपने सिरहाने रक्खें।” स्वामी जी ने आदेश दिए थे। “अब कार्य सिद्धि में कोई विघ्न आएगा ही नहीं।” स्वामी जी ने मानस को आश्वस्त किया था। “और ये लें विभूति। माथे पर तिलक धारण करें। अब आप विजय रथ पर आरूढ़ हैं। आप को कोई भी रोक नहीं पाएगा – ये आपकी नियति का आदेश है।” कहते हुए आसन से उठ गए थे स्वामी जी।

मानस के जमा लोगों ने आज बंबई को हिला दिया था।

“मानस भाई!” एक साथी ने नया नारा दिया था। “करो सगाई।” दूसरी ओर से मांग सामने आई थी।

प्रेस पागल हो गया था। किसी तरह से वो प्रतिष्ठा का एक फोटो प्राप्त कर लेना चाहते थे। लेकिन प्रतिष्ठा अपार भीड़ में छुपी हुई थी। वह किसी कीमत पर भी उजागर न होना चाहती थी। मानस लपक कर प्रतिष्ठा की सहायतार्थ पहुंच गया था। दोनों का जैसे पहली बार मिलन हुआ था – वो भुजाएं पसार कर मिले थे।

प्रेस झक मार रहा था लेकिन मानस और प्रतिष्ठा के साथियों ने उसकी दाल न गलने दी थी।

और फिर पता चला था कि मानस और प्रतिष्ठा लापता थे।

“खबर मिलते ही विलोचन मरने के लिए जगह ढूंढेगा। हाहाहा।” कल्लू अट्टहास करके हंसा था। “अब देखता हूँ कौन-कौन रोकेगा इस शादी को?” कल्लू ने समस्त समाज को ललकारा था।

मुन्नी – अपनी प्रेमिका से शादी न होने का गम आज भी कल्लू को खाने दौड़ता था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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