बंगले के द्वार पर पड़े अखबार को बर्फी ने बे मन एक बेगार मानते हुए उठाया था।
आनंद के जाने के बाद अब वहां कौन था जिसे अंग्रेजी का अखबार पढ़ना था। लेकिन अखबार लगा लिया था तो अब रोज आ रहा था। बर्फी ने अखबार को बंद करने का निर्णय ले लिया था। लेकिन जैसे ही उसकी निगाह अखबार पर पड़ी थी – बर्फी दंग रह गई थी।
अखबार के मुख पृष्ठ पर लंबा चौड़ा किसी स्वामी का फोटो छपा था। गौर से देखने पर उसे जंच गया था कि वो फोटो आनंद का ही था। लेकिन गेरुआ अंग वस्त्रों में सजा वजा आनंद कोई दिव्य पुरुष लग रहा था। बर्फी को अपनी आंखों पर से भरोसा उठ गया था। स्कूल जाते अपने बेटे विक्की को उसने पुकार लिया था।
“ये कौन है। पढ़ तो जरा।” बर्फी ने विक्की से कहा था।
“ये – बाल ब्रह्मचारी स्वामी अनेकानंद हैं, अम्मा।” विक्की ने अखबार में लिखा पढ़ा था। “अरे, ये तो आनंद लगता है।” विक्की भी चौंका था। “वो – हमारे वाला ही आनंद, अम्मा।” विक्की ने विहंस कर कहा था।
बर्फी पर जैसे तड़तड़ा कर बिजली गिरी थी। उसकी आंखों के सामने अंधकार छा गया था।
“ला, दे अखबार।” संभली थी बर्फी। “तू जा स्कूल।” उसने विक्की को मुक्त किया था।
और विक्की के जाने के बाद बर्फी अकेले बाल ब्रह्मचारी स्वामी अनेकानंद बने आनंद के सामने निहत्थी खड़ी थी।
“ये तूने क्या कर डाला बे शऊर।” बर्फी की आत्मा ने टीसते हुए पूछा था। “घर आए नगीने को निकाल फेंका।”
अखबार को पकड़े बर्फी के हाथ कांपने लगे थे।
प्रणय वेदना को पहली बार बर्फी ने उसे परास्त करते हुए महसूसा था। छू कर भाग गया प्रेमी अखबार के पन्नों पर जा बैठा था। वह तो भ्रम वश उसे पराया मान दुत्कार बैठी थी। वह तो उसे दूर – कहीं दूर बैठा सपना जान दुत्कार कर भगा बैठी थी। और राम लाल ..
“तुम्हारा था कब ..?” अंतर से आवाज आई थी। “तुम्हारी एक जरूरत थी – राम लाल। और ये तुम भी जानती हो कि तुम्हारा मन मीत तो जेठवा ही था।”
और स्मरण करते ही बर्फी के पास उसका पति जेठवा आ खड़ा हुआ था।
बर्फी ने माथे का पसीना पोंछा था। अपने आप को व्यवस्थित कर जेठवा के सुपुर्द किया था। जेठवा ने भी बड़े ही आदर से बर्फी को गले लगाया था। लेकिन जैसे ही बर्फी की निगाहें बगीचे में जा कर डोली थीं वैसे ही उसे आनंद दिख गया था।
“हैल्लो ..” पेड़ के साथ अंग्रेजी में बात करता आनंद उसे बुला रहा था। बर्फी ने मुड़ कर जेठवा को पुकारा था। लेकिन .. “हैल्लो ..” फूल पत्तियों को अंग्रेजी में संबोधित करता आनंद ही उसे दिखा था।
और फिर न जाने क्या हुआ था कि आज जेठवा आनंद से मुकाबला हार गया था।
जेठवा अनपढ़ था – बर्फी जानती थी। आनंद पढ़ा लिखा था – वह पहचानती थी। फिर उसके मन प्राण ने आज गलती न की थी और अनपढ़ जेठवा रूठ कर चला गया था। अब बर्फी आनंद के साथ उपवन की सैर करने निकल गई थी।
“ओह दुकान ..!” सहसा बर्फी को ध्यान आया था कि उसे दुकान खोलनी थी।
रिक्शा आया खड़ा था। बर्फी दौड़ी भागी थी। देर हो चुकी थी। लेकिन उसे दुकान तो जाना ही था। रिक्शा वाला अपनी धुन में रिक्शा चला रहा था। लेकिन बर्फी का मन फिर भागा था और आनंद की तलाश में बंबई शहर की काया में जा घुसा था। कब दुकान पर पहुंची बर्फी उसे सुध न थी।
ऑडर आ चुके थे। ग्राहक दुकान के आस पास झुकरा रहे थे। बर्फी ने जल्दी पल्दी में चाय तैयार की थी। काम चल पड़ा था। लेकिन न जाने क्यों आज बर्फी को चाय बनाने में वो मजा न आ रहा था जो उसने पहले दिन महसूस किया था। बे मन चाय बनाती आज बेगानी थी, अलग थी, कहीं और जा जुड़ी थी।
तीन बार बनते-बनते चाय बिगड़ी थी। दो बार बर्फी का हाथ जला था। जैसे तैसे दिन पूरा हुआ था। उसके आदेश अनुसार विक्की उसे स्कूल से लौटते वक्त लेने पहुंच गया था।
एक बारगी विक्की उसे एक नई आशा किरण की तरह उदय हुआ लगा था। लगा था – संतान का साथ सार्थक होता है। लेकिन लौटते वक्त बर्फी का मन उसके साथ घर न लौटा था।
आनंद की तलाश में उसका मन बंबई में डोलता रह गया था।
“हमारी परणाम।” स्वामी के दरस परस को आई भीड़ को चीरते हुए बर्फी ने स्वामी के चरण स्पर्श किए थे। “भूल चूक माफ देवता।” बर्फी ने आनंद की आंखों में देखा था। वह क्षमा प्रार्थना कर रही थी। “आ गए हम भी तिहारी शरण।” उसने घोषणा की थी। “हमने भी छोड़ा मोह माया – तिहारी खातिर।”
“लेकिन मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ। मैं तो औरत को छूता तक नहीं।” स्वामी बोल पड़े थे।
“तो उद्धार कैसे होगा तिहारा?” बर्फी ने उसमंजस जताया था। “औरत तो स्वर्ग का रास्ता है स्वामी।” मुसकुराई थी बर्फी। “यहीं से सबका आना जाना है।” उसने पते की बात बताई थी। “औरत को छूओगे नहीं तो नरक में जाओगे।” तनिक हंसी थी बर्फी। “आओ हमरे साथ। संग-संग उड़ेंगे दोनों।” बर्फी ने स्वामी को आमंत्रित किया था। “फिर देखना स्वामी बर्फी का कमाल।” लजा गई थी बर्फी। “भूल जाओगे बैराग।”
“अम्मा। दूध वाला आया है।” विक्की ने आवाज लगाई थी। “पैसे मांग रहा है।” उसने सूचना दी थी।
बर्फी का ध्यान टूटा था। उसकी आंखों के सामने उसका घर संसार घूम गया था।
दूध वाले को पैसे चुकाने के बाद एकाएक बर्फी को राम लाल याद हो आया था। उसे याद हो आया था कि राम लाल के आने के बाद उसे कभी ताती बयार न लगी थी। राम लाल ने इस कदर संभाला था उसका कारोबार कि दिन दूना और रात चौगुना होता चला गया था। राम लाल की चाय मशहूर हो गई थी। दुकान पर चाय के ऑडर आते थे और पैसे नकद।
देखते ही देखते राम लाल ने बर्फी को झुग्गी से उठा कर बंगले में बिठा दिया था।
और तब चुपचाप बिल्ली की तरह उसने राम लाल की छत्र छाया में बच्चे पैदा किए थे। दो बेटे और एक बेटी। बच्चों की शिक्षा के लिए उनके दाखिले भी बर्फी ने कॉन्वेंट स्कूल में कराए थे। राम लाल के होते सोते बर्फी का कोई काम न रुका था। बर्फी का रुतबा बढ़ता ही चला गया था।
लेकिन आज जब दूध वाले को उसने पैसों का भुगतान किया था तो एहसास हुआ था कि उसके सर से अब राम लाल का साया उठ गया था। और वो थी कि एक पागल की तरह किसी स्वामी के ख्वाब में बावली हुई डोल रही थी।
“सब चौपट हो जाएगा।” किसी ने बर्फी के कान में कहा था। “इसी तरह चाय बनाती रही तो ग्राहक टूटने में क्या लगता है।” वह जानती तो थी।
विक्की अभी छोटा था – बर्फी ने मान लिया था। अभी वो दुकान नहीं संभाल सकता था। वह जानती थी। बच्चों के भविष्य की खातिर अब बर्फी को फिर से बागडोर संभालनी थी। वह जानती थी कि अगर व्यापार गोता खा गया तो वो बर्बाद हो जाएगी।
“राम लाल …?” अचानक बर्फी ने आवाज सुनी थी।
“अब नहीं लौटेगा।” उसने उत्तर भी सुन लिया था।
“आनंद ..?” वही आवाज फिर से गूंजी थी।
“हमारा लगता क्या है? भेंस का बैल से कौन रिश्ता?” बर्फी का उत्तर स्पष्ट था। “कितने ही लोग घूमते हैं दुनिया में – किस किस को पकड़ेंगे?” चेतावनी दी थी बर्फी के दिमाग ने। “अपना मरना जीना पहले देखो। तीन बच्चे हैं तुम्हारे, राम लाल के नहीं। आनंद के भी नहीं। संभालो बागडोर को बर्फी। बहको मत। मझधार में नाव है अगर डूबी तो ..
बर्फी के पसीने छूट रहे थे।
वह तो राम लाल पर ही पूरी तरह से आश्रित थी। कभी सोचा ही नहीं था कि राम लाल यों छोड़ कर चल देगा। और फिर वह भी तो चाहने लगी थी कि राम लाल ..
“बच्चे बड़े हो गए थे।” बर्फी ने उत्तर दिया था। “शरम आने लगी थी।” उसने सच उगला था। “जो हुआ ठीक हुआ।” बर्फी ने अपने आप को संगठित किया था। वह काम को संभालेगी – उसने निर्णय किया था। राम लाल लौटा भी तो वह उसे घर में नहीं घुसने देगी। और .. और .. आनंद ..?
बर्फी पर जैसे कोई भूत सवार हो गया था – वह उठी थी। घर के अंदर गई थी। उस अखबार को जिसके मुखपृष्ठ पर स्वामी अनेकानंद का फोटो छपा था, गर्दन से पकड़ लाई थी और उसे फाड़ कर घर की चौखट के बाहर फेंक चलाया था।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

