आनंद आज स्वयं चल कर आया था। राम लाल आदतन आकर अपनी कुर्सी पर बैठा था। चाय आ गई थी। लेकिन दोनों के बीच आज चुप्पी आ बैठी थी। आनंद ने कई बार राम लाल को पढ़ने का प्रयत्न किया था। लेकिन वह चुप ही बना रहा था।
“मुझे संन्यासी बन कर क्या मिलेगा?” आनंद ने ही चुप्पी तोड़ी थी।
राम लाल ने चाय की चुस्की ली थी। वह आनंद के प्रश्न को सुन कर तनिक मुसकुराया था, जैसे उसे इस प्रश्न की प्रतीक्षा थी। और उसके पास उत्तर भी था।
“जो किसी को नहीं मिलता – वो मिलेगा।” राम लाल की आवाज ऊंची थी। “लगेगा जरूर कि आप दे रहे हैं। लेकिन असल में तो आप ले रहे होंगे आनंद बाबू।” राम लाल ने सीधा आनंद की आंखों में देखा था। “आप के चरण छूते हजारों हजार लोग .. और ..” फिर से प्रसंग लाया था राम लाल।
“लेकिन .. लेकिन ये सब ..?” आनंद का अंतर विद्रोह पर उतर आया था।
“स्वामी विवेकानंद को मरे कित्ते साल बीते?” राम लाल ने राम बाण छोड़ा था। “तो क्या वो मर गए? आप तो आज भी उनका लिखा बांच रहे हैं आनंद बाबू।”
“पर मैं झूठ कैसे बोलूंगा?” आनंद का चेहरा तमक आया था। आंखों में आक्रोश था।
“किसने कहा – झूठ बोलने को?” राम लाल ने ढाल की तरह प्रश्न तान दिया था – आनंद के सामने। “चिड़िया झूठ बोलती है क्या?” राम लाल का प्रश्न आया था। “आप के सामने कितने लोगों के पौ बारह होते हैं। लॉटरी निकलती है – लाखों की – करोड़ों की।” राम लाल तैश में था। “आप को जो ठीक लगे – चिड़िया की तरह कार्ड निकाल कर फेंक दो। फिर जो हो सो हो आप की कोई गारंटी नहीं। सब होता जाता रहता है आनंद बाबू।” राम लाल ने सीधा आनंद की आंखों में देखा था। “भला बुरा सब होता है। हम सब का होता है। फिर डरना क्या?” राम लाल हंस गया था।
“लेकिन मैं मांगूंगा कुछ नहीं।”
“मैंने कब कहा?” राम लाल ने सत्ते पे सत्ता दे मारा था। “मोती तो बिन मांगे मिलते हैं, आनंद बाबू। मांगने पर तो सच में भीख भी नहीं मिलती।” ठठा कर हंसा था राम लाल।
दोनों की छिड़ी गरमा गरम बहस ने घर की शांति भंग कर दी थी।
बर्फी ने ओट से झांक कर उन दोनों को लड़ते झगड़ते देखा था। उसने पहली बार आनंद को खुली आंखों देखा था। उड़ती-उड़ती आनंद की निगाहें भी बर्फी से जा टकराई थीं। बड़ी ही चुस्त दुरुस्त महिला लगी थी आनंद को।
राम लाल तटस्थ बना रहा था। और दिनों की तरह उसे आज बर्फी से डर न लगा था। वह आज फिर से आजाद था – मस्त था।
रिक्शा आ गया था। राम लाल और आनंद काम पर जा रहे थे। बर्फी ने आज पहली बार आनंद को नजर भर कर देखा था। एक शक को साथ लिए-लिए उसने बंगले का दरवाजा बंद कर लिया था।
स्कूल में पहुंचते ही आनंद को याद हो आया था कि आज उसने फ्रांसिस को याद की स्वामी विवेकानंद की स्पीच बोल कर सुनानी थी।
“डरने और झिझकने की जरूरत नहीं है, आनंद बाबू।” नीलू उसे समझाने में लगी थी। “एक-एक शब्द को जोर दे कर ठीक से बोलना है और जल्दी बिल्कुल नहीं करनी। पास हो जाओगे।” हंस कर नीलू ने उसे उत्साहित किया था।
फिर न जाने कैसे आनंद ने महसूसा था कि वह स्वयं भी विवेकानंद ही था।
“ब्रदर्स एंड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका।” आनंद ने उंगली उठा कर सामन बैठे फ्रांसिस को संबोधित किया था। उसे महसूस हुआ था कि सामने बैठे लोग उठ कर तालियां बजा रहे थे। शिकागो में विश्व धर्म संसद के हॉल में बैठे सभी लोग उसकी स्पीच को कान देकर सुन रहे थे।
फ्रांसिस सकते में आ गया था। वो देसी लहजे में अंग्रेजी बोलने वाला आनंद तो आज स्वामी विवेकानंद बना स्टाइल में अंग्रेजी बोल रहा था – विशुद्ध अंग्रेजी। एक-एक शब्द को आनंद उठा-उठा कर जैसे लोगों के सामने रख रहा था और पूरे विश्व को मानवता का संदेश दे रहा था।
“वैल डन आनंद।” फ्रांसिस ने प्रसन्न हो कर आनंद से हाथ मिलाया था। “मुझे उम्मीद न थी लेकिन तुम्हारी लगन ..”
“और नीलू की मेहनत।” आनंद ने हंस कर नीलू को धन्यवाद कहा था। “बिना आप के ये संभव न होता मैडम।” आनंद ने स्वीकार किया था।
“अब आखिरी मोर्चा रह जाता है।” फ्रांसिस कहने लगा था। “ये जो आपके पास आज तक आया है – उधार की भाषा है। ये आपकी भाषा नहीं है।” फ्रांसिस ने सीधा आनंद की आंखों में देखा था। “आपको अपनी भाषा सीखने के लिए अब ये पढ़िए।” फ्रांसिस ने आनंद को एक किताब दी थी। “ये उपन्यास है – डेविड कॉपरफील्ड।” फ्रांसिस ने आनंद को किताब दी थी। “इसे पढ़िए। देखिए कि किस तरह के संवाद हैं, किस तरह की घटनाएं हैं और किस तरह के करैक्टर्स हैं। ये घटनाएं, उनके करैक्टर्स और उनके संवाद पढ़ने के बाद स्वत: ही आप की भाषा गढ़ना आरंभ कर देंगे। अब मैंने देख लिया है कि आनंद बाबू आप ..”
“कोशिश करता हूँ।” आनंद ने मुसकुराते हुए कहा था।
“चार्ल्स डिकिन्स का उपन्यास है ये। लेखक की जीवनी जरूर पढ़िए। तब आपकी समझ में उपन्यास भी आ जाएगा और लेखक भी।” फ्रांसिस ने आखिरी रास्ता दिखाया था आनंद को।
स्कूल से लौट कर आए आनंद पर कदम झपटा था।
“क्या हुआ?” कदम ने पूछा था तो आनंद को एहसास हुआ था कि वो देर से लौट रहा था।
“आज मेरा इम्तिहान था भाई।” प्रसन्न मन से आनंद ने बताया था।
“पास हो गए?” कदम का अगला प्रश्न था।
अंग्रेजी पढ़ना, सीखना और बोलना कोई हंसी ठट्टा खेल न था – ये तो अब कदम भी जानता था।
“हां। पास हो गया।” आनंद ने हंसते-हंसते उत्तर दिया था।
“फिर तो निकल जाएगी आपकी लॉटरी।” कदम भी प्रसन्न था। “भाई का दो बार फोन आ गया है। बहुत बिजी रहता है। निकलते हैं।” कदम ने तुरंत रिक्शा बुलाया था।
कदम का भाई छदम आनंद को देखते ही दंग रह गया था।
“भाई। काम तो जास्ती है।” उसने कहा था। “लेकिन एक बार फिनिश पर देखना। हंगामा होगा भाई।” हंस रहा था छदम। “आओ बाबू। नाप जोख अभी कर लेते हैं। काम करेंगे कल सुबह। एक दम पहले।”
पहली बार आनंद ने अपने घुंघराले काले बाल, मर्दानी मूंछें और अनमोल दाड़ी का मोल जाना था।
आनंद ने महसूसा था कि चिड़िया सच बोलती है। इस बार उसकी लॉटरी अवश्य निकलेगी।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

